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Physiotherapy के बाद भी Sciatica वापस क्यों? असली कारण जानें

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by
  • category-iconPublished on 12 May, 2026
  • category-iconUpdated on 15 Jun, 2026
  • category-iconJoint Health
  • blog-view-icon5033

फिजियोथेरेपी (Physiotherapy), ट्रैक्शन और भारी पेनकिलर का इस्तेमाल कमर दर्द और साइटिका (Sciatica) जैसी गंभीर बीमारियों में काफी आम है। ये तकनीकें और दवाएँ रीढ़ की हड्डी के आस-पास की माँसपेशियों को खींचकर कुछ समय के लिए आराम दे देती हैं या नसों पर पड़ रहे दबाव को कुछ समय के लिए कम कर देती हैं, जिससे मरीज़ को लगता है कि वह पूरी तरह ठीक हो गया है और उसकी परेशानी खत्म हो गई है। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि सर्दियों के मौसम में, भारी वज़न उठाने पर, या फिजियोथेरेपी के सेशन्स खत्म होने के कुछ ही हफ्तों बाद फिर से भयंकर दर्द, पैरों में झुनझुनी और सुन्नपन की समस्या होने लगती है और साइटिका पहले से भी भयंकर रूप में वापस आ जाता है। इसके कारण कई हो सकते हैं जैसे लगातार दर्द-निवारक दवाओं के इस्तेमाल से नसों का कमज़ोर होना, रीढ़ की हड्डी की गद्दी (Disc) का अंदर से सूख जाना, या सबसे महत्वपूर्ण शरीर के अंदर मौजूद अतिरिक्त वात दोष और टॉक्सिन्स जिसे आयुर्वेद में 'आम' कहते हैं। इस बात को समझना ज़रूरी है, ताकि वक्त रहते डॉक्टर से सलाह ली जा सके और रीढ़ की हड्डी व नसों की सेहत बनी रहे।

साइटिका (Sciatica) की समस्या क्या है?

साइटिका कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक लक्षण है जहाँ शरीर की सबसे लंबी नस (Sciatic Nerve) पर दबाव पड़ने के कारण भयंकर दर्द होता है। यह दर्द कमर के निचले हिस्से से शुरू होकर कूल्हे और जाँघ के पीछे से होता हुआ पैर के पंजों तक जाता है। एक सामान्य इंसान में उठना-बैठना और चलना एक सहज प्रक्रिया है, लेकिन साइटिका के मरीज़ में रीढ़ की हड्डी के बीच की गद्दी (Disc) खिसक जाने या वात दोष के बढ़ जाने से नस दब जाती है जिससे दर्द का रास्ता भयंकर पीड़ादायक हो जाता है। ठंड के मौसम में ठंडी और शुष्क हवा वात दोष को बढ़ाकर नस को और ज़्यादा सिकोड़ देती है। इसके कारण पैरों में जकड़न, करंट जैसा दर्द और सुन्नपन जैसी दिक्कतें होने लगती हैं। आमतौर पर लोग इसका शिकार कमज़ोर इम्युनिटी, गलत पोस्चर, भारी वज़न उठाने, आनुवांशिकी या गलत खानपान के कारण होते हैं। फिजियोथेरेपी कराने पर माँसपेशियों में खिंचाव आने से कुछ समय के लिए आराम मिल जाता है, लेकिन यह शरीर के अंदर मौजूद उस वात दोष और सूखेपन को ठीक नहीं करती जिसके कारण नस बार-बार दबती है। बीमारी का अंदरूनी इलाज न करने पर पैरों की ताकत हमेशा के लिए कम हो सकती है।

साइटिका और कमर दर्द की बीमारियाँ कितने प्रकार की होती हैं?

नसों और रीढ़ की हड्डी की तकलीफ से जुड़ी आधुनिक चिकित्सा में मुख्य रूप से ये बीमारियाँ देखी जाती हैं:

  • हर्नियेटेड डिस्क (Slipped Disc/Herniated Disc): यह साइटिका का सबसे आम कारण है। इसमें रीढ़ की हड्डी के बीच की गद्दी (डिस्क) अपनी जगह से खिसक कर साइटिक नस पर दबाव डालती है।
  • स्पाइनल स्टेनोसिस (Spinal Stenosis): इसमें उम्र के साथ या वात बढ़ने से रीढ़ की हड्डी का वह कैनाल (रास्ता) संकरा हो जाता है जहाँ से नसें गुज़रती हैं।
  • डीजेनरेटिव डिस्क डिज़ीज़ (Degenerative Disc Disease): इसमें हड्डियों के बीच की डिस्क सूखने लगती है और घिस जाती है, जिससे नसों के लिए जगह कम बचती है।
  • पिरिफोर्मिस सिंड्रोम (Piriformis Syndrome): कूल्हे के पास स्थित पिरिफोर्मिस माँसपेशी में ऐंठन आने से उसके ठीक नीचे से गुज़रने वाली साइटिक नस दब जाती है।

साइटिका की समस्या के लक्षण और संकेत

फिजियोथेरेपी या पेनकिलर से आराम मिलने के बाद दर्द का बार-बार लौट आना नसों की गहरी कमज़ोरी का संकेत हो सकता है। इसके मुख्य लक्षण और संकेत इस प्रकार हैं:

  • करंट जैसा दर्द: कमर से लेकर पैर के अँगूठे तक एक तेज़, चुभने वाला या बिजली के झटके जैसा दर्द दौड़ना।
  • पैर में सुन्नपन: दर्द वाले पैर या जाँघ में ऐसा महसूस होना जैसे वह सुन्न पड़ गया हो या उसमें जान न हो।
  • झुनझुनी या सुईयाँ चुभना: पैरों की उँगलियों और पंजों में लगातार सुईयाँ चुभने (Pins and needles) जैसी अनुभूति होना।
  • चलने या खड़े होने में दिक्कत: दर्द इतना भयंकर होना कि सीधा खड़ा होना, सीढ़ियाँ चढ़ना या कुछ कदम चलना भी मुश्किल हो जाए।
  • पैर की कमज़ोरी: प्रभावित पैर का कमज़ोर महसूस होना, जिससे कभी-कभी चलते हुए पैर का लड़खड़ा जाना।
  • थेरेपी का असर खत्म होते ही वापसी: फिजियोथेरेपी के सेशन्स या स्टेरॉयड का असर खत्म होते ही कुछ ही दिनों के भीतर दर्द का फिर से शुरू हो जाना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

बार-बार साइटिका की समस्या लौटने के मुख्य कारण क्या हैं?

सर्दियों में या थेरेपी के बाद बार-बार साइटिका का दर्द लौटने के पीछे सिर्फ बाहरी कारण नहीं, बल्कि कई गहरे अंदरूनी कारण हो सकते हैं। मुख्य कारण इस प्रकार हैं:

  • वात और आम का संचय: गलत खान-पान जैसे ठंडी, रूखी और बासी चीज़ें खाने से शरीर में 'आम' (टॉक्सिन्स) बनता है। यह वात दोष को बढ़ाकर रीढ़ की नसों (मज्जा वह स्रोतस) को ब्लॉक कर देता है।
  • नसों का सूखापन और कमज़ोरी: सिर्फ फिजियोथेरेपी माँसपेशियों को खींचती है, लेकिन अंदर से सूखी हुई नस और घिसी हुई डिस्क को पोषण (Nutrition) नहीं देती।
  • ग़लत पोस्चर और भारी वज़न: बिना सही तरीके से झुके भारी सामान उठाना या लगातार कई घंटों तक कुर्सी पर गलत तरीके से बैठे रहना।
  • खराब पाचन और कब्ज़: आयुर्वेद के अनुसार, पेट साफ न होना और कब्ज़ रहने से 'अपान वात' उल्टी दिशा में चलने लगता है, जो कमर और पैरों की नसों में भयंकर दर्द पैदा करता है।
  • ठंडी और शुष्क हवा: ठंड के मौसम में शरीर में वात प्राकृतिक रूप से बढ़ता है, जो नसों को सिकोड़ कर दर्द को तुरंत ट्रिगर कर देता है।

साइटिका की समस्या के जोखिम और जटिलताएँ क्या हैं?

साइटिका की बीमारी को अगर अनदेखा किया जाए या सही समय पर इसका अंदरूनी इलाज न मिले, तो यह कई गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है। मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • पैरों में स्थायी सुन्नपन: नस पर लगातार दबाव रहने से नस हमेशा के लिए डैमेज हो सकती है, जिससे पैर हमेशा के लिए सुन्न हो सकता है।
  • माँसपेशियों का सूखना (Muscle Atrophy): दर्द के कारण पैर का इस्तेमाल कम करने से उस पैर की माँसपेशियाँ सूखने और पतली होने लगती हैं।
  • फुट ड्रॉप (Foot Drop): नस के गंभीर डैमेज होने पर मरीज़ अपने पैर का पंजा ऊपर की तरफ उठाने में पूरी तरह असमर्थ हो जाता है।
  • मूत्राशय और आंतों पर नियंत्रण खोना: यह एक बहुत ही गंभीर स्थिति (Cauda Equina Syndrome) है जहाँ मल-मूत्र पर से इंसान का नियंत्रण खत्म हो जाता है।
  • मानसिक तनाव और डिप्रेशन: लगातार दर्द के डर से इंसान का घर से बाहर निकलना और सामान्य जीवन जीना मुश्किल हो जाता है।

समय पर डॉक्टर से परामर्श और उचित आयुर्वेदिक इलाज लेने से इन जोखिमों को कम किया जा सकता है।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?

आयुर्वेद के हिसाब से साइटिका सिर्फ नस दबने की दिक्कत नहीं है। आयुर्वेद में इसे 'गृध्रसी' (Gridhrasi) रोग की श्रेणी में रखा जाता है। गृध्र का अर्थ है 'गिद्ध' (Vulture), क्योंकि इस बीमारी में मरीज़ दर्द के कारण गिद्ध की तरह लंगड़ा कर चलने लगता है। यहाँ यह माना जाता है कि जब शरीर में वात दोष और कभी-कभी कफ बुरी तरह बिगड़ जाते हैं और नसों (नाड़ियों) में रुकावट पैदा करते हैं, तब ऐसी परेशानी आती है। डॉक्टर नाड़ी देखकर मर्ज़ को पकड़ते हैं। वे ढूँढते हैं कि कहीं पेट में कब्ज़ या 'आम' तो नहीं जमा हो गए हैं, जिसने वात को कुपित कर दिया है। जब तक यह कुपित वात और सूखापन रीढ़ की हड्डी में रहेगा, दर्द बार-बार लौटकर आता रहेगा। आयुर्वेद में बस माँसपेशियों को खींचना (Traction/Physiotherapy) मकसद नहीं है, वो चाहते हैं कि बीमारी जड़ से ठीक हो, नसों को अंदर से चिकनाई और ताकत मिले, पाचन सुधरे और रीढ़ की हड्डी प्राकृतिक रूप से मज़बूत बने।

साइटिका की समस्या के लिए महत्वपूर्ण जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में नसों की सूजन कम करने, वात शांत करने और रीढ़ की हड्डी को मज़बूती देने के लिए ये जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं:

  • निर्गुण्डी (Nirgundi): आयुर्वेद में इसे वात रोगों और दर्द के लिए सबसे बेहतरीन औषधि माना गया है। यह दबी हुई नस की सूजन को तुरंत कम करती है।
  • अश्वगंधा (Ashwagandha): यह नसों को अंदर से ताकत और पोषण देती है। यह माँसपेशियों की कमज़ोरी को दूर कर उन्हें मज़बूत बनाती है।
  • रास्ना (Rasna): यह जोड़ों और नसों के दर्द को काटने में अचूक है। इसका लेप या काढ़ा वात दोष को जड़ से खत्म करता है।
  • दशमूल (Dashmoola): यह दस जड़ी-बूटियों का समूह है जो शरीर के किसी भी हिस्से में बढ़े हुए वात दोष और दर्द को शांत करने का सबसे शक्तिशाली उपाय है।

आयुर्वेदिक पंचकर्म: शरीर की अंदरूनी सफाई

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, कुपित वात और दोषों को बाहर निकालकर संपूर्ण स्वास्थ्य और मज़बूत नसें पाने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया:

  • गहरी सफाई और वात शमन: जब साइटिका सालों पुराना हो, फिजियोथेरेपी से बार-बार लौट रहा हो और व्यक्ति पेनकिलर पर निर्भर हो चुका हो, तो जीवा आयुर्वेद में कटि बस्ती और बस्ती कर्म (एनिमा) जैसी पंचकर्म चिकित्सा की जाती है।
  • इलाज का समय: यह 7 से 21 दिनों तक चलने वाली शरीर के अंदरूनी अंगों और नसों की गहरी सफाई की प्राकृतिक प्रक्रिया है।
  • टॉक्सिन्स बाहर निकालना और वात कंट्रोल: 'बस्ती कर्म' में औषधीय काढ़े और तेल को एनिमा के ज़रिए आँतों में पहुँचाया जाता है। आयुर्वेद में इसे वात रोगों की 'आधी चिकित्सा' (Half Treatment) कहा गया है, जो सीधे जड़ पर वार करती है।
  • नसों को खोलने के लिए कटि बस्ती और स्वेदन: कमर के निचले हिस्से पर उड़द की दाल का घेरा बनाकर उसमें हल्का गर्म औषधीय तेल भरा जाता है (कटि बस्ती)। यह तेल त्वचा के ज़रिए अंदर सूखी हुई डिस्क और नसों तक पहुँचकर चिकनाई (Lubrication) देता है और दर्द खत्म करता है। इसके बाद भाप (स्वेदन) दी जाती है।

साइटिका के रोगी के लिए शुद्ध आहार

जीवा आयुर्वेद और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण के अनुसार, साइटिका की समस्या को दूर करने के लिए हल्का, गर्म और वात दोष को शांत करने वाला आहार चुनना महत्वपूर्ण है:

क्या खाएँ?

  • गर्म और वातनाशक भोजन: ताज़ा पका हुआ हल्का गर्म खाना खाएँ। शुद्ध देसी घी, लहसुन, अदरक और तिल के तेल का खाने में इस्तेमाल बढ़ाएँ।
  • गुनगुना पानी: दिन भर सिर्फ हल्का गुनगुना पानी पिएँ। यह आँतों को साफ रखता है और कब्ज़ नहीं होने देता।
  • पपीता और सेब: फलों में पपीता और पका हुआ सेब खाएँ, ये पाचन को दुरुस्त रखते हैं और पेट में गैस नहीं बनने देते।

क्या न खाएँ?

  • ठंडी और वात बढ़ाने वाली चीज़ें: आइसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक, फ्रिज का ठंडा पानी और बर्फ का सेवन बिल्कुल बंद कर दें।
  • रूखी और गैस बनाने वाली दालें: राजमा, छोले, मटर, उड़द की दाल और बेसन से बनी चीज़ें न खाएँ, ये पेट में भयंकर गैस (वात) बनाती हैं जो नसों का दर्द बढ़ाती है।
  • मैदा और बासी खाना: पिज़्ज़ा, बर्गर, और फ्रिज में रखा बासी खाना बिल्कुल न खाएँ, क्योंकि ये शरीर में 'आम' बढ़ाते हैं और मल को सुखाकर कब्ज़ पैदा करते हैं।

ठीक होने में कितना समय लगता है?

जीवा आयुर्वेद में साइटिका की समस्या का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है, इसलिए ठीक होने का समय मुख्य रूप से इन बातों पर निर्भर करता है:

  • बीमारी और शरीर की स्थिति: ठीक होने का वक्त कई बातों से तय होता है जैसे नस कितनी ज़्यादा दबी है, दर्द कितना पुराना है, और मरीज़ की पेनकिलर पर निर्भरता कितनी ज़्यादा है।
  • हल्की समस्या में सुधार: अगर साइटिका की शुरुआत है और डिस्क थोड़ा ही खिसकी है, तो आमतौर पर 4 से 6 हफ्तों में ही दर्द और सुन्नपन कम होने लगता है।
  • पुरानी बीमारी का समय: अगर बीमारी सालों पुरानी है, नस बुरी तरह दब चुकी है और व्यक्ति रोज़ दवाइयाँ लेता है, तो नसों को पूरी तरह पोषण मिलने और वात संतुलित होने में 6 महीने से 1 साल भी लग सकता है।
  • उपचार का तरीका: इस प्राकृतिक इलाज में मुख्य रूप से वातनाशक जड़ी-बूटियाँ, पंचकर्म (कटि बस्ती), सही खानपान और हल्के योगासन शामिल होते हैं।
  • स्थायी परिणाम: मरीज़ अगर अपनी डाइट और पोस्चर का कड़ाई से पालन करता है, तो नसें मज़बूत हो जाती हैं और भविष्य में फिजियोथेरेपी या दर्द की गोली के बिना भी साइटिका लौटने की संभावना खत्म हो जाती है।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

साइटिका की बीमारी में आधुनिक और आयुर्वेदिक इलाज का नज़रिया बिल्कुल अलग है:

  • आधुनिक चिकित्सा: यह लक्षणों को बाहर से दबाने, पेनकिलर देने और फिजियोथेरेपी के ज़रिए माँसपेशियों को सिर्फ बाहर से खींचने पर काम करती है। यह तुरंत चलना आसान कर देती है, जो कुछ समय के लिए अच्छा लगता है। लेकिन यह बीमारी की जड़ यानी वात दोष और सूखी हुई डिस्क को खत्म नहीं करता। थेरेपी छोड़ते ही नस फिर से दब जाती है और शरीर सर्जरी की तरफ बढ़ने लगता है।
  • आयुर्वेदिक चिकित्सा: आयुर्वेद बीमारी की असली वजह यानी वात का असंतुलन, पेट की खराबी (कब्ज़) और नसों के सूखेपन को खत्म करता है। इसमें जड़ी-बूटियों, बस्ती कर्म और सही डाइट के ज़रिए मज्जा वह स्रोतस को भीतर से पोषण दिया जाता है। इसमें थोड़ा समय लगता है, लेकिन डिस्क और नसों की ताकत प्राकृतिक रूप से ऐसी बन जाती है कि नस अपनी जगह आ जाती है और स्थायी आराम मिलता है।

डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए?

साइटिका की समस्या होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि:

  • दर्द बर्दाश्त से बाहर हो जाए और पैर में भयंकर करंट लगने जैसा महसूस हो।
  • पैर का पंजा उठाने में असमर्थता (Foot Drop) महसूस होने लगे।
  • जाँघों के बीच के हिस्से और पैरों में पूरी तरह सुन्नपन आ जाए।
  • मल और पेशाब पर नियंत्रण कम होने लगे या बिल्कुल खत्म हो जाए।
  • फिजियोथेरेपी और भारी पेनकिलर लेने के बाद भी दर्द में कोई कमी न आ रही हो।

समय पर सलाह लेने से रोग का सही निदान होता है और शरीर को सर्जरी जैसी बड़ी जटिलताओं से बचाया जा सकता है।

निष्कर्ष

आयुर्वेद के हिसाब से सर्दियों में या थेरेपी के बाद बार-बार लौटने वाली साइटिका की समस्या मुख्य रूप से वात दोष के बिगड़ने और मज्जा वह स्रोतस (नसों) में रुकावट व सूखापन आने से जुड़ी होती है। गलत खान-पान, कब्ज़, भारी वज़न उठाने, राजमा-छोले जैसी गैस बनाने वाली चीज़ें खाने से शरीर में टॉक्सिन्स ('आम') बनते हैं जो वात को कुपित कर देते हैं। यही वात रीढ़ की डिस्क को सुखाकर साइटिक नस को दबा देता है। सिर्फ बाहर से फिजियोथेरेपी करने से माँसपेशियां कुछ देर के लिए ढीली हो जाती हैं लेकिन बीमारी अंदर ही रहती है। इलाज में वात शमन और नसों को पोषण देना सबसे ज़्यादा आवश्यक है। इसमें दोषों को संतुलित करना, गर्म और हल्का खाना खाना, निर्गुण्डी और अश्वगंधा जैसी जड़ी-बूटियाँ इस्तेमाल करना, और पंचकर्म (कटि बस्ती और बस्ती) युक्त दिनचर्या अपनाना शामिल है जिससे बीमारी को जड़ से ठीक किया जा सके।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Դ doctor.

FAQs

हाँ, सर्दियों में हवा रूखी और ठंडी होती है जो शरीर में वात दोष को तुरंत बढ़ाती है और नसों को सिकोड़ देती है, जिससे साइटिका का दर्द तेज़ी से भड़कने लगता है।

हाँ, आयुर्वेद के अनुसार कब्ज़ होने से पेट की गैस और अपान वात  नीचे की ओर जाने के बजाय ऊपर और नसों की ओर मुड़ जाता है, जो कमर और पैरों में भयंकर दर्द पैदा करता है।

नहीं, आगे की तरफ झुकने (Forward Bending) से रीढ़ की हड्डी की डिस्क पर बहुत ज़्यादा दबाव पड़ता है, जो साइटिक नस को और बुरी तरह दबा सकता है।

नहीं, स्लिप्ड डिस्क रीढ़ की हड्डी की गद्दी खिसकने की स्थिति है, जबकि साइटिका उस खिसकी हुई गद्दी के कारण नस दबने से पैरों में होने वाला दर्द है।

हाँ, हल्का गुनगुना पानी शरीर में जमे हुए 'आम' (Toxins) को पचाता है और आँतों को साफ़ रखकर वात दोष को शांत करने में मदद करता है।

हाँ, दोनों को साथ लिया जा सकता है। फिजियोथेरेपी माँसपेशियों को बाहरी आराम देती है, जबकि आयुर्वेदिक दवाइयाँ अंदर से नस की सूजन और वात को जड़ से खत्म करती हैं।

रीढ़ की हड्डी की बनावट अनुवांशिक हो सकती है, लेकिन साइटिका मुख्य रूप से आपके उठने-बैठने के तरीके, खान-पान और बढ़े हुए वात दोष पर निर्भर करता है।

हल्की सैर करना नसों को एक्टिव रखता है, लेकिन दर्द बहुत ज़्यादा हो तो आराम करना चाहिए और ऊबड़-खाबड़ जगह पर चलने से बचना चाहिए।

नहीं, आयुर्वेद में पंचकर्म (कटि बस्ती, बस्ती कर्म) और जड़ी-बूटियों की मदद से ज़्यादातर साइटिका के केस बिना किसी सर्जरी के पूरी तरह ठीक किए जा सकते हैं।

नहीं, दर्द-निवारक दवाइयाँ (Painkillers) सिर्फ दिमाग तक दर्द का सिग्नल जाने से रोकती हैं। वो दबी हुई नस या सूखी हुई डिस्क का इलाज नहीं करतीं। असर खत्म होते ही दर्द वापस आ जाता है।

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