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Surgery के बाद भी Piles वापस — क्यों?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by

आजकल पाइल्स (बवासॶर) से छुटकारा पाने के लिए लेज़र सर्जरी या ऑपरेशन बहुत आम हो गया है। सर्जरी से सूजी हुई नसों और मस्सों को काटकर बाहर निकाल दिया जाता है, जिससे मरीज़ को तुरंत आराम मिल जाता है। लेकिन कई बार सर्जरी के कुछ महीनों या सालों बाद पाइल्स दोबारा वापस आ जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सर्जरी सिर्फ बाहरी मस्सों को हटाती है, लेकिन पेट की खराबी, पुरानी कब्ज़ और बिगड़े हुए वात दोष को ठीक नहीं करती। आयुर्वेद के अनुसार, जब तक मल कड़ा रहेगा, बवासॶर लौटकर आती रहेगी। आइए इसका स्थायी समाधान जानें।

Surgery के बाद Piles (बवासॶर) का वापस आना क्या है?

पाइल्स या बवासॶर मलद्वार (गुदा) और मलाशय (Rectum) के निचले हिस्से में सूजी हुई नसें होती हैं। एक सामान्य इंसान में मल त्याग एक सहज प्रक्रिया है, लेकिन जब पुरानी कब्ज़ के कारण मल कड़ा हो जाता है, तो नसों पर भारी दबाव पड़ता है और वे सूजकर मस्सों का रूप ले लेती हैं। आधुनिक चिकित्सा में सर्जरी (Hemorrhoidectomy या Laser Surgery) करके इन सूजी हुई नसों को काट दिया जाता है या जला दिया जाता है। लेकिन शरीर के अंदर मौजूद पाचन की खराबी और अपान वात (नीचे की ओर जाने वाली वायु) का असंतुलन वैसा का वैसा ही रहता है। इसलिए, जब सर्जरी के बाद व्यक्ति दोबारा गलत खान-पान शुरू करता है और कब्ज़ का शिकार होता है, तो मलद्वार की दूसरी नसें सूज जाती हैं और बीमारी वापस आ जाती है (Recurrence)।

Piles मुख्य रूप से कितने प्रकार के होते हैं?

मलद्वार की नसों की स्थिति के आधार पर पाइल्स मुख्य रूप से दो तरह के होते हैं:

  • खूनी बवासॶर (Internal Hemorrhoids): इसमें मलद्वार के अंदरूनी हिस्से की नसें सूजती हैं। मल त्यागते समय बिना दर्द के ताज़ा खून आता है।
  • बादी बवासॶर (External Hemorrhoids): इसमें मलद्वार के बाहर की नसों में सूजन आ जाती है, जिससे वहाँ गाँठ या मस्सा बन जाता है। इसमें भयंकर दर्द, खुजली और जलन होती है।

Surgery के बाद Piles वापस आने के लक्षण और संकेत

अगर सर्जरी के बाद आपको ये संकेत दिखें, तो इसका मतलब है कि आपकी बीमारी लौट रही है:

  • मल त्याग में भयंकर दर्द: टॉयलेट जाते समय मलद्वार में सुइयाँ चुभने जैसा या कटने जैसा तेज़ दर्द होना।
  • खून का आना: मल के साथ या टॉयलेट पेपर पर ताज़ा लाल खून का दिखाई देना।
  • नई गाँठ या सूजन: मलद्वार के आसपास दोबारा नई गाँठ या उभरा हुआ मस्सा महसूस होना।
  • लगातार खुजली और जलन: मल त्याग के बाद भी घंटों तक गुदा मार्ग में तेज़ जलन और खुजली रहना।
  • मल पूरी तरह खाली न होना: ऐसा महसूस होना कि पेट पूरी तरह साफ नहीं हुआ है और टॉयलेट में ज़्यादा देर तक बैठे रहना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

Surgery के बाद भी Piles वापस आने के मुख्य कारण क्या हैं?

सर्जरी के बाद पाइल्स लौटने के पीछे सिर्फ बाहरी कारण नहीं, बल्कि आपके लाइफस्टाइल और पेट से जुड़े कई गहरे अंदरूनी कारण होते हैं:

  • पुरानी कब्ज़ और कड़ा मल: यह सबसे बड़ा कारण है। पेट साफ न होने पर जब टॉयलेट में ज़ोर (Straining) लगाया जाता है, तो नई नसों पर दबाव पड़ता है और वे सूज जाती हैं।
  • अपान वात का बिगड़ना (Ayurvedic Cause): आयुर्वेद के अनुसार शरीर में मल-मूत्र को बाहर निकालने का काम 'अपान वायु' करती है। गलत खान-पान से यह वायु बिगड़ जाती है और मल को सुखाकर कड़ा कर देती है।
  • फाइबर और पानी की कमी: खाने में हरी सब्ज़ियों की कमी और पानी कम पीने से आँतों में रूखापन आ जाता है।
  • लगातार बैठे रहना: घंटों तक कुर्सी पर बैठे रहने या भारी वज़न उठाने से पेल्विक हिस्से (Pelvic area) की नसों पर दबाव बढ़ता है।
  • मसालेदार और फास्ट फूड: बहुत ज़्यादा लाल मिर्च, गरम मसाले और मैदा खाने से मलद्वार में गर्मी और सूजन बढ़ती है।

Piles के जोखिम और जटिलताएँ क्या हैं?

पाइल्स की वापसी को अगर अनदेखा किया जाए, तो यह कई गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है:

  • एनीमिया (खून की कमी): रोज़ाना मल के साथ खून बहने से शरीर में भयंकर कमज़ोरी और खून की कमी हो सकती है।
  • फिशर (Anal Fissure): कड़े मल के कारण गुदा मार्ग की त्वचा फट सकती है, जिससे असहनीय दर्द होता है।
  • फिस्टुला (भगंदर): इन्फेक्शन अंदर तक फैलने पर मलद्वार के पास एक नई नली या सुराख बन जाता है जिसमें से मवाद आता है।
  • मानसिक तनाव: टॉयलेट जाने के डर और लगातार दर्द से इंसान चिड़चिड़ा हो जाता है और डिप्रेशन का शिकार हो सकता है।

Surgery के बाद Piles वापसी पर आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?

आयुर्वेद के हिसाब से पाइल्स या बवासॶर को 'अर्श' कहा जाता है। आयुर्वेद मानता है कि इस बीमारी की शुरुआत मलद्वार से नहीं, बल्कि आपके पेट (आमाशय) से होती है। जब जठराग्नि (पाचन तंत्र) कमज़ोर हो जाती है (अग्निमांद्य), तो खाना ठीक से पचता नहीं है और शरीर में 'आम' (टॉक्सिन्स) बनता है। यह गंदगी आँतों में जमा होकर अपान वात को बिगाड़ देती है। बिगड़ा हुआ वात मल को पत्थर जैसा कड़ा कर देता है, जो बाहर निकलते समय नसों को चीरता है और सूजन पैदा करता है। आधुनिक सर्जरी सिर्फ उस सूजी हुई नस को काटती है, लेकिन आपकी जठराग्नि और बिगड़े हुए वात को ठीक नहीं करती। इसीलिए आयुर्वेद में बस मस्से को काटना मकसद नहीं है, वो चाहते हैं कि जठराग्नि तेज़ हो, कब्ज़ हमेशा के लिए मिटे और बीमारी जड़ से ठीक हो।

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण क्या है?

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण पूरी तरह से व्यक्तिगत है। इलाज शुरू करने से पहले आयुर्वेद एक्सपर्ट इन मुख्य बातों पर बारीकी से ध्यान देते हैं:

  • कस्टमाइज़्ड इलाज: हर व्यक्ति का पाचन और शरीर अलग होता है, इसलिए इलाज पूरी तरह से उनके शरीर के अनुकूल ही तय किया जाता है।
  • लक्षणों की पहचान: पाइल्स खूनी है या बादी, दर्द कैसा है और मस्से का आकार क्या है, इसकी बारीकी से जाँच की जाती है।
  • पुरानी मेडिकल हिस्ट्री: मरीज़ की पिछली सर्जरी, इस्तेमाल की गई क्रीम और पेनकिलर का पूरा रिकॉर्ड देखा जाता है।
  • जीवनशैली का विश्लेषण: मरीज़ के रोज़ाना के खान-पान, बैठे रहने की आदत और पानी पीने की मात्रा को परखा जाता है।
  • सटीक इलाज की रूपरेखा: इन सभी बातों का अच्छे से विश्लेषण करने और बिगड़े हुए वात को पकड़ने के बाद ही मरीज़ के लिए पेट की गर्मी शांत करने और मल को मुलायम बनाने का सबसे सटीक आयुर्वेदिक इलाज शुरू किया जाता है।

Piles के लिए महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में कब्ज़ मिटाने, नसों की सूजन कम करने और जठराग्नि बढ़ाने के लिए ये 4 जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं:

  • हरीतकी (Haritaki): आयुर्वेद में इसे मल को मुलायम करने और आँतों की सफाई के लिए सबसे बेहतरीन औषधि माना गया है।
  • सूरन या जिमीकंद (Elephant Foot Yam): इसे 'अर्शोघ्न' (पाइल्स को खत्म करने वाला) कहा जाता है। यह सूजे हुए मस्सों को प्राकृतिक रूप से सिकोड़ देता है।
  • त्रिफला (Triphala): यह पाचन को दुरुस्त करता है और पुरानी से पुरानी कब्ज़ को बिना आँतों को नुकसान पहुँचाए साफ करता है।
  • मुलेठी (Licorice): यह मलद्वार की जलन, खुजली और घाव को तेज़ी से भरती है।

आयुर्वेदिक पंचकर्म: शरीर की अंदरूनी सफाई और क्षारसूत्र

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, जमे हुए टॉक्सिन्स को बाहर निकालकर बीमारी को जड़ से खत्म करने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया:

  • बस्ती (Enema Therapy): जब वात दोष बहुत ज़्यादा बिगड़ा हो, तो जीवा आयुर्वेद में बस्ती चिकित्सा की जाती है। इसमें औषधीय तेल का काढ़ा गुदा मार्ग से आँतों में डाला जाता है, जो रूखेपन को खत्म कर पुरानी कब्ज़ तोड़ता है।
  • क्षारसूत्र (Ksharsutra): अगर मस्से बहुत बड़े हो गए हैं और सर्जरी के बाद भी लौट आए हैं, तो आयुर्वेद में क्षारसूत्र किया जाता है। यह एक विशेष औषधीय धागा होता है जिसे मस्से की जड़ में बाँध दिया जाता है। कुछ ही दिनों में मस्सा सूखकर अपने आप गिर जाता है और इसमें दोबारा पाइल्स लौटने का खतरा (Recurrence) न के बराबर होता है।

Piles के रोगी के लिए शुद्ध आहार

जीवा आयुर्वेद के अनुसार, बवासॶर की समस्या को दूर करने के लिए हल्का, फाइबर युक्त और वात शांत करने वाला आहार चुनना महत्वपूर्ण है:

क्या खाएँ?

  • फाइबर और पानी: पपीता, सेब, ओट्स और दलिया का भरपूर इस्तेमाल करें। दिन भर में कम से कम 3 से 4 लीटर पानी पिएँ।
  • छाछ (Buttermilk): दोपहर के खाने के बाद ताज़ा छाछ में भुना जीरा और काला नमक डालकर पिएँ, यह बवासॶर की अचूक दवा है।
  • हरी सब्ज़ियाँ: लौकी, तोरई, पालक और परवल खाएँ, यह पेट को हल्का रखती हैं।

क्या न खाएँ?

  • तीखा और मसालेदार खाना: लाल मिर्च, बहुत ज़्यादा गरम मसाले और बाहर का तला हुआ खाना बिल्कुल बंद कर दें।
  • मैदा और जंक फूड: पिज़्ज़ा, बर्गर, सफेद ब्रेड और बिस्कुट का सेवन बिल्कुल बंद कर दें, यह आँतों में चिपककर मल को कड़ा कर देते हैं।
  • चाय और कॉफी: बहुत ज़्यादा चाय या कॉफी पीने से शरीर में खुश्की (रूखापन) बढ़ती है जो कब्ज़ पैदा करती है।

जीवा आयुर्वेद में Piles के मरीज़ की जाँच कैसे होती है?

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच सिर्फ बाहरी लक्षणों को देखकर नहीं, बल्कि पूरी समझ के साथ की जाती है। यहाँ कोशिश होती है कि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जाए।

  • सबसे पहले आपकी परेशानी, दर्द के समय और खून आने के लक्षणों को आराम से सुना जाता है।
  • आपकी पुरानी सर्जरी और खायी गई दवाओं के बारे में पूछा जाता है।
  • आपके खाने-पीने और तीखी चीज़ें लेने की आदतों को समझा जाता है।
  • आपकी नींद, मानसिक तनाव और मल त्याग (पेट साफ होने) की स्थिति पर ध्यान दिया जाता है।
  • नाड़ी जाँच और शरीर की वात-पित्त प्रकृति को जाना जाता है।

इन सब चीज़ों को समझने के बाद आपके लिए एक ऐसा इलाज प्लान बनाया जाता है, जो आपके पाचन तंत्र को पूरी तरह मज़बूत करे।

जीवा आयुर्वेद से संपर्क कैसे करें?

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक समाधान मिल सके।

  • अपनी जानकारी साझा करें: इलाज की शुरुआत के लिए अपनी सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी दें। इसके लिए आप सीधे +919266714040 पर कॉल करके अपनी समस्या बता सकते हैं।
  • डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करें: आपकी सुविधा के अनुसार डॉक्टर से बात करने का समय तय किया जाता है, आप क्लिनिक विजिट या ₹49 में वीडियो कंसल्टेशन के जरिए घर बैठे भी जुड़ सकते हैं।
  • बीमारी को समझना: डॉक्टर आपसे विस्तार से बात करके आपकी तकलीफ, लाइफस्टाइल और शरीर की प्रकृति (Prakriti) को समझते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जा सके।
  • कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान: पूरी जांच के बाद आपके लिए एक पर्सनलाइज्ड इलाज योजना बनाई जाती है, जिसमें आयुर्वेदिक दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल सुधार शामिल होते हैं, ताकि आपको अंदर से स्थायी राहत मिल सके।

Piles ठीक होने में कितना समय लगता है?

जीवा आयुर्वेद में पाइल्स की समस्या का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है:

  • बीमारी की स्थिति: ठीक होने का वक्त इस बात पर निर्भर करता है कि बीमारी कितनी पुरानी है और सर्जरी के बाद नसों को कितना नुकसान पहुँचा है।
  • हल्की समस्या में सुधार: अगर कब्ज़ और दर्द की शुरुआत है, तो आमतौर पर 2 से 4 हफ्तों में ही सूजन कम होने लगती है और पेट साफ होने लगता है।
  • पुरानी बीमारी का समय: अगर मस्से बड़े हैं और सालों पुरानी कब्ज़ है, तो जठराग्नि को सेट होने और मस्सों को पूरी तरह सूखने में 3 से 6 महीने का समय लग सकता है।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएँ शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताज़ा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • बेहतर परिणाम: 90%+ मरीजों में धीरे-धीरे स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है।

आधुनिक उपचार (Surgery) और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

पहलू आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
इलाज का मुख्य लक्ष्य लेज़र या सर्जरी से सूजे हुए मस्से हटाना जठराग्नि सुधारकर कब्ज़ और मूल कारण को खत्म करना
नज़रिया बवासॶर को केवल सूजी हुई नसों की समस्या मानना खराब पाचन, कड़ा मल और वात असंतुलन को मूल कारण मानना
उपचार तरीका Laser surgery, कटिंग और त्वरित राहत पर फोकस हरीतकी, त्रिफला और प्राकृतिक चिकित्सा से पाचन व मल को संतुलित करना
डाइट और लाइफस्टाइल सर्जरी के बाद सीमित खान-पान सलाह रेशेदार आहार, गर्म पानी और नियमित दिनचर्या पर ज़ोर
लंबा असर कुछ समय बाद नसों में फिर सूजन और बीमारी लौटने का खतरा पेट साफ रहना और मलद्वार पर दबाव कम होने से दीर्घकालिक आराम मिलना

Piles के लिए डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए?

बवासॶर की समस्या होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि:

  • मल के साथ बहुत ज़्यादा मात्रा में लाल खून आने लगे।
  • मलद्वार में असहनीय दर्द हो जो पेनकिलर से भी कम न हो।
  • लगातार खून बहने से चक्कर आने लगें या भयंकर कमज़ोरी महसूस हो।
  • मस्सा मलद्वार के बाहर आ जाए और उँगली से भी अंदर न जाए।
  • मल त्याग के अलावा भी कपड़ों पर खून के दाग दिखें।

समय पर सलाह लेने से रोग का सही निदान होता है और बड़ी सर्जरी से बचा जा सकता है।

निष्कर्ष

आयुर्वेद के अनुसार सर्जरी के बाद पाइल्स का वापस आना बिगड़े हुए अपान वात, खराब पाचन और पुरानी कब्ज़ का परिणाम है। सर्जरी सिर्फ उभरे हुए मस्सों को हटाती है, बीमारी की जड़ यानी मल के कड़ेपन को खत्म नहीं करती। जब तक पेट साफ नहीं होगा और पाचन अग्नि ठीक नहीं होगी, नसों पर दबाव पड़ता रहेगा और पाइल्स लौटते रहेंगे। इसका स्थायी समाधान सिर्फ पेट की शुद्धि में है। त्रिफला, हरीतकी जैसी जड़ी-बूटियों, सही खानपान और आयुर्वेदिक जीवनशैली अपनाकर आप इस दर्दनाक बीमारी को जड़ से हमेशा के लिए खत्म कर सकते हैं।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Դ doctor.

FAQs

सर्जरी सिर्फ उभरे हुए मस्सों को हटाती है लेकिन पेट की पुरानी कब्ज़ और खराब पाचन को ठीक नहीं करती इसलिए मल कड़ा होने पर नसें दोबारा सूज जाती हैं।

हाँ कब्ज़ ही पाइल्स का सबसे बड़ा कारण है। मल कड़ा होने पर जब टॉयलेट में ज़ोर लगाया जाता है तो मलद्वार की नसें फिर से छिल जाती हैं और सूज जाती हैं।

बिल्कुल अगर आयुर्वेद की मदद से जठराग्नि को ठीक कर लिया जाए और सही डाइट ली जाए तो पाइल्स की वापसी को हमेशा के लिए रोका जा सकता है।

पाइल्स के मरीज़ों को दिन भर में कम से कम तीन से चार लीटर पानी पीना चाहिए ताकि आँतों में नमी बनी रहे और मल आसानी से बाहर निकल सके।

हाँ क्षारसूत्र एक बहुत ही सुरक्षित आयुर्वेदिक तरीका है जिसमें औषधीय धागे से मस्से को सुखाया जाता है और इसके बाद पाइल्स वापस लौटने का खतरा न के बराबर होता है।

हाँ लाल मिर्च और गरम मसाले मलद्वार में भयंकर गर्मी और जलन पैदा करते हैं जिससे नसों की सूजन और खून आने की समस्या तुरंत बढ़ जाती है।

रात को सोते समय हल्का गर्म दूध पीना फायदेमंद हो सकता है लेकिन अगर कब्ज़ बहुत ज़्यादा है तो दूध की जगह ताज़ी छाछ का इस्तेमाल करना बेहतर होता है।

हाँ लगातार एक ही जगह पर घंटों बैठे रहने से शरीर के निचले हिस्से की नसों पर भारी दबाव पड़ता है जो पाइल्स की सूजन और दर्द को बढ़ा देता है।

पपीते में फाइबर और खास एंजाइम्स होते हैं जो पाचन तंत्र को साफ करते हैं और मल को मुलायम बनाते हैं जिससे टॉयलेट जाते समय दर्द नहीं होता।

दोपहर के भोजन के बाद भुना हुआ जीरा और काला नमक डालकर छाछ पीना आयुर्वेद में अर्श यानी पाइल्स की सबसे बेहतरीन और ठंडी दवा मानी जाती है।

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