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गर्मी में हड्डियाँ क्यों दर्द करती हैं? Mineral Loss के 5 कारण

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by
  • category-iconPublished on 18 May, 2026
  • category-iconUpdated on 10 Jun, 2026
  • category-iconJoint Health
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जैसे ही गर्मियों का मौसम दस्तक देता है, वैसे ही ज्यादातर लोगों के मुंह से बस हर वक्त थकान होने और शरीर में पानी की कमी की शिकायतें सुनने को मिलने लगती हैं। लोग इससे काफी परेशान भी रहते हैं। पर सच मानिए तो यह मौसम सिर्फ यहीं तक नहीं रुकता है। कई बार यह हमारे शरीर के पूरे ढांचे, यानी हमारी हड्डियों पर भी बहुत गहरा और बुरा असर डाल देता है।

इस कड़कती धूप और दिनभर बहने वाले पसीने के बीच अक्सर लोगों को अचानक से एक नई परेशानी झेलनी पड़ जाती है। उन्हें अपने शरीर के जोड़ों में बहुत ज्यादा भारीपन महसूस होने लगता है। और सिर्फ इतना ही नहीं, हड्डियों के बिल्कुल अंदर एक अजीब सा दर्द भी बैठ जाता है। जो इंसान को अंदर ही अंदर हर वक्त परेशान करने लगता है।

यह दर्द केवल सामान्य थकान का नतीजा नहीं है, बल्कि यह शरीर से आवश्यक खनिजों (Minerals) के तेज़ी से बाहर निकलने का एक स्पष्ट संकेत है। जब पसीने के साथ शरीर का कैल्शियम और मैग्नीशियम बह जाता है, तो हमारी हड्डियाँ अंदर से खोखली और कमज़ोर होने लगती हैं, जिसे समझना एक स्वस्थ शरीर के लिए बेहद ज़रूरी है।

मिनरल लॉस (Mineral Loss) के 5 मुख्य कारण

जब पारा चढ़ता है, तो शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए कई प्रक्रियाएं अपनाता है, जिसका सीधा असर हड्डियों के पोषण पर पड़ता है। इन पांच मुख्य कारणों से शरीर में मिनरल्स की भारी कमी हो जाती है:

  • पसीने के ज़रिए कैल्शियम का बहना: गर्मियों में पसीना आना स्वाभाविक है, लेकिन अत्यधिक पसीने के साथ शरीर से सोडियम, पोटैशियम और कैल्शियम जैसे महत्वपूर्ण इलेक्ट्रोलाइट्स तेज़ी से बह जाते हैं, जिससे हड्डियाँ कमज़ोर हो जाती हैं।
  • कोल्ड ड्रिंक्स और सोडे का अधिक सेवन: गर्मी से राहत पाने के लिए लोग कार्बोनेटेड ड्रिंक्स पीते हैं। इनमें मौजूद फॉस्फोरिक एसिड (Phosphoric Acid) शरीर के कैल्शियम को सोख लेता है और उसे पेशाब के रास्ते बाहर निकाल देता है।
  • कमज़ोर पाचन (Agni Decline): गर्मियों में शरीर की जठराग्नि सुस्त पड़ जाती है। ऐसे में जो भी पौष्टिक पाचन तंत्र में जाता है, वह ठीक से पच नहीं पाता, और हड्डियों को नया कैल्शियम नहीं मिल पाता।
  • धूप से दूरी और विटामिन डी की कमी: चिलचिलाती धूप से बचने के लिए लोग दिन भर एसी (AC) कमरों में बैठे रहते हैं। सूरज की रोशनी न मिलने से विटामिन डी कम हो जाता है, जो कैल्शियम को हड्डियों में बांधने (Absorb) के लिए ज़रूरी है।
  • ज़रूरत से ज़्यादा सादा पानी पीना: पसीने की भरपाई के लिए लोग बिना नमक-नींबू डाले गैलन भर सादा पानी पी लेते हैं। इससे ब्लड में मिनरल्स का घनत्व (Density) पतला (Dilute) हो जाता है और जोड़ों में दर्द शुरू हो जाता है।

गर्मियों में हड्डियों और मांसपेशियों के दर्द के क्या प्रकार हो सकते हैं?

यह दर्द सिर्फ एक जैसा नहीं होता, बल्कि मिनरल्स की कमी के अनुसार यह शरीर के अलग-अलग हिस्सों में अलग तरीके से वार करता है। इसे इन श्रेणियों में समझा जा सकता है:

  • मांसपेशियों और पिंडलियों में ऐंठन (Muscle Cramps): मैग्नीशियम और पोटैशियम की कमी से पिंडलियों और जांघों की मांसपेशियों में अचानक भयंकर ऐंठन (Spasm) उठती है, खासकर रात को सोते समय।
  • जोड़ों का कड़ापन और दर्द (Joint Stiffness): इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी से जोड़ों के बीच मौजूद तरल पदार्थ (Synovial Fluid) सूखने लगता है, जिससे जोड़ों की बीमारियों की शुरुआत होती है और घुटने मुड़ने में दर्द करते हैं।
  • गर्दन और कंधों का जकड़ना: एसी की ठंडी हवा और मिनरल्स की कमी मिलकर गर्दन और कंधे की जकड़न पैदा करते हैं, जो सर्वाइकल जैसा महसूस होता है।

मिनरल लॉस और हड्डियों के कमज़ोर होने के क्या लक्षण महसूस होते हैं?

हड्डियाँ कमज़ोर होने पर शरीर कई तरह के अलार्म बजाता है। अगर आपको गर्मियों में ये संकेत दिखें, तो यह केवल थकान नहीं, बल्कि मिनरल लॉस हो सकता है:

  • लगातार सुस्ती और कमज़ोरी: रात भर सोने के बाद भी शरीर में ऊर्जा महसूस न होना और दिन भर अत्यधिक थकान और कमज़ोरी का बना रहना।
  • हाथ-पैरों में झुनझुनी आना: कैल्शियम की कमी का सीधा असर नर्वस सिस्टम पर पड़ता है, जिससे बैठे-बैठे हाथ-पैरों में झुनझुनी या सुन्नपन होने लगता है।
  • उठते-बैठते कट-कट की आवाज़: घुटनों या कोहनियों को मोड़ते समय अचानक हड्डियों से कट-कट या चटकने की आवाज़ें आना हड्डियों के रूखेपन का संकेत है।
  • हल्का दबाव पड़ने पर भी दर्द: अगर उंगलियों या कलाई पर थोड़ा सा भी वज़न डालने से भयंकर दर्द उठे, तो यह कमज़ोर अस्थि धातु (Bone density) की निशानी है।

इस मौसम में लोग क्या गलतियाँ करते हैं और इसकी क्या जटिलताएँ होती हैं?

गर्मियों की बेचैनी से बचने के लिए लोग अक्सर अनजाने में ऐसे शॉर्टकट्स अपना लेते हैं, जो हड्डियों को हमेशा के लिए अपाहिज कर देते हैं:

  • बर्फ का पानी और ठंडी चीज़ों पर निर्भरता: फ्रिज का ठंडा पानी जठराग्नि को पूरी तरह बुझा देता है, जिससे भोजन से मिनरल्स का अवशोषण (Absorption) पूरी तरह रुक जाता है।
  • लगातार कुर्सी पर बैठे रहना: गर्मी के कारण बाहर न निकलना और लंबे समय तक कुर्सी पर बैठने से नसों का डैमेज और हड्डियों का सिकुड़ना शुरू हो जाता है।
  • व्यायाम पूरी तरह छोड़ देना: पसीने के डर से बिल्कुल भी एक्टिव न रहना हड्डियों को कमज़ोर (Brittle) कर देता है।
  • ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा: इस लगातार कैल्शियम लॉस को अगर नज़रअंदाज़ किया गया, तो भविष्य में यह गंभीर ऑस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis) का रूप ले लेता है, जहाँ हल्की सी चोट से भी हड्डॶ टूट सकती है।
  • क्रोनिक दर्द: मिनरल लॉस और खराब पोश्चर मिलकर कमर दर्द और स्पॉन्डिलाइटिस जैसी स्थायी बीमारियाँ पैदा कर देते हैं।

गर्मी में हड्डियों के दर्द को लेकर आयुर्वेद का क्या नज़रिया है?

आधुनिक विज्ञान जिसे इलेक्ट्रोलाइट इंबैलेंस (Electrolyte Imbalance) कहता है, आयुर्वेद उसे शरीर के धातु क्षय और वात दोष की भयंकर विकृति के रूप में समझता है:

  • वात दोष का बढ़ना: गर्मियों में शरीर से नमी (पसीना) खत्म होने पर रूखापन बढ़ता है। जब सही वात दोष को कम करने के उपाय नहीं किए जाते, तो यह बढ़ा हुआ वात जोड़ों में जाकर दर्द और कड़ापन पैदा करता है।
  • अस्थि धातु (Bone Tissue) का क्षय: आयुर्वेद के अनुसार, जब जठराग्नि सुस्त होती है, तो शरीर 'रस' धातु से लेकर 'अस्थि' धातु तक का पोषण नहीं कर पाता। इससे हड्डियाँ खोखली और हल्की हो जाती हैं।
  • मज्जा (Marrow) का सूखना: वात के रूखेपन के कारण हड्डियों के बीच की मज्जा (Bone Marrow) और ग्रीस सूखने लगती हैं, जिससे हड्डियाँ आपस में रगड़ खाने लगती हैं।

हड्डियों को मज़बूत बनाने वाला आयुर्वेदिक डाइट चार्ट

गर्मियों में आपको ऐसा भोजन चाहिए जो शरीर को ठंडा रखे, लेकिन साथ ही हड्डियों को भरपूर मिनरल्स (कैल्शियम, मैग्नीशियम) भी दे। इस डाइट चार्ट का पालन करें:

आहार की श्रेणी क्या खाएं (फायदेमंद - अस्थि धातु बढ़ाने वाले) क्या न खाएं (नुकसानदायक - कैल्शियम सोखने वाले)
अनाज (Grains) रागी (कैल्शियम का बेहतरीन स्रोत), पुराना चावल, जौ, ओट्स। मैदा से बनी चीज़ें, वाइट ब्रेड, पैकेटबंद नूडल्स।
मेवे और बीज (Nuts & Seeds) रात भर भीगे हुए बादाम, अखरोट, सफेद तिल, और सूरजमुखी के बीज। बिना भिगोए और ज़्यादा नमक वाले सूखे मेवे।
सब्ज़ियाँ (Vegetables) लौकी, तरोई, पालक, मोरिंगा (सहजन/Drumsticks - हड्डियों के लिए अमृत)। कच्ची पत्ता गोभी, बहुत ज़्यादा भारी और बासी सब्ज़ियाँ।
डेयरी और पेय गुनगुना दूध (हल्दी के साथ), ताज़ा नारियल पानी, बेल का शर्बत। कैफीनयुक्त चाय/कॉफी, बर्फ वाला पानी, कोल्ड ड्रिंक्स।
वसा (Fats) शुद्ध देसी गाय का घी (हड्डियों की ग्रीस बढ़ाने के लिए)। रिफाइंड ऑयल, डीप फ्राई की हुई गरिष्ठ चीज़ें।

हड्डियों में जान फूंकने वाली आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

सच तो यह है कि हमारी इस प्रकृति ने हमें कुछ ऐसे अनमोल तत्व और औषधियाँ दी हैं जो बिना किसी भी तरह का नुकसान या साइड-इफेक्ट पहुँचाए हमारी कमज़ोर नसों में फिर से जान फूंक देती हैं:

  • अश्वगंधा (Ashwagandha): यह हड्डियों और नसों के लिए सबसे जादुई टॉनिक है। अश्वगंधा (Ashwagandha) मांसपेशियों को ताकत देता है और कैल्शियम के अवशोषण (Absorption) को कई गुना बढ़ा देता है।
  • हड़जोड़ (Hadjod): आयुर्वेद में इसे हड्डियों को जोड़ने वाला कहा गया है। यह कमज़ोर और खोखली हो चुकी हड्डियों में खनिज (Minerals) भरकर उन्हें फिर से फौलादी बनाता है।
  • शतावरी (Shatavari): पित्त की गर्मी को शांत करने और शरीर को पोषण देने के लिए शतावरी (Shatavari) एक बेहतरीन रसायन है, जो जोड़ों के रूखेपन को खत्म करती है।
  • गिलोय (Giloy): यह इम्युनिटी को मज़बूत करती है और वात के कारण होने वाले दर्द को खत्म करती है। गिलोय (Giloy) जोड़ों में आई किसी भी तरह की सूजन को प्राकृतिक रूप से शांत करती है।

मिनरल लॉस को रोकने के लिए बेहतरीन आयुर्वेदिक थेरेपीज़

जब वात और हड्डियों का दर्द बहुत पुराना हो जाता है, तो औषधियों के साथ पंचकर्म की ये बाहरी थेरेपीज़ शरीर को तुरंत नई ऊर्जा देती हैं:

  • अभ्यंग मालिश (Abhyanga): महानारायण या क्षीरबला जैसे औषधीय तेलों से की जाने वाली अभ्यंग मालिश (Abhyanga Massage) शरीर की नसों को रिलैक्स करती है और जोड़ों को प्राकृतिक चिकनाई (Lubrication) देती है।
  • स्वेदन थेरेपी (Swedana): औषधीय भाप के ज़रिए शरीर की जकड़न को दूर किया जाता है। स्वेदन थेरेपी (Swedana Therapy) मांसपेशियों की ऐंठन को खोलती है और दर्द को तुरंत खींच लेती है।
  • कटी बस्ती (Kati Basti): अगर मिनरल लॉस के कारण कमर में भयंकर दर्द है, तो कटी बस्ती (Kati Basti) के ज़रिए उड़द दाल का घेरा बनाकर उसमें गुनगुना तेल भरा जाता है, जो रीढ़ की हड्डॶ को गहरा पोषण देता है।
  • जानु बस्ती (Janu Basti): घुटनों के दर्द और कमज़ोरी के लिए यह घुटनों पर की जाने वाली विशेष तेल की बस्ती है, जो सूख चुकी कार्टिलेज को दोबारा चिकनाई प्रदान करती है।

हड्डियों के प्राकृतिक रूप से मज़बूत होने में कितना समय लगता है?

बरसों से खाली हो रही हड्डियों को दोबारा मिनरल्स से भरने और नसों को ताकत देने में एक अनुशासित समय लगता है:

  • शुरुआती 1-2 महीने: सही जठराग्नि और प्राकृतिक औषधियों (जैसे अश्वगंधा) के सेवन से शरीर में सुबह कमर में जकड़न और क्रैम्प्स (ऐंठन) काफी हद तक कम हो जाएंगे।
  • 3-4 महीने: पंचकर्म (अभ्यंग और बस्ती) और रसायनों के प्रभाव से जोड़ों का रूखापन खत्म होने लगेगा और हाथों में सुन्नपन और सर्वाइकल दर्द से आज़ादी मिलेगी।
  • 5-6 महीने: आपकी अस्थि धातु पूरी तरह पोषित हो जाएगी। आप बिना किसी बाहरी सपोर्ट या दर्द की गोली के एक लचीले और ताकतवर शरीर का अनुभव करेंगे।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

हड्डियों के दर्द और मिनरल लॉस के इलाज को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है:

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा (Symptomatic care) आयुर्वेद (Holistic care)
इलाज का मुख्य लक्ष्य दर्द कम करने के लिए पेनकिलर्स देना और सिंथेटिक कैल्शियम या विटामिन डी के सप्लीमेंट्स (Supplements) खिलाना। बढ़ा हुआ वात शांत करना, जठराग्नि को प्रबल करना और शरीर की 'अस्थि धातु' (Bones) को प्राकृतिक रूप से पोषण देना।
बीमारी को देखने का नज़रिया इसे केवल एक विशिष्ट मिनरल (कैल्शियम/विटामिन) की कमी की स्थानीय समस्या मानना। इसे कमज़ोर पाचन, बिगड़े हुए वात और रूखे आहार का एक संपूर्ण सिंड्रोम (धातु क्षय) मानना।
डाइट और लाइफस्टाइल अक्सर केवल दूध पीने या सप्लीमेंट्स पर निर्भर रहने की आम सलाह दी जाती है। खाने में 'स्नेहन' (घी/तेल), रागी, तिल, और सही जीवनशैली पर बहुत गहरा ज़ोर दिया जाता है।
लंबा असर गोलियाँ छोड़ने पर और शरीर के आदी हो जाने पर दर्द वापस आ जाता है, क्योंकि शरीर प्राकृतिक कैल्शियम बनाना भूल जाता है। शरीर की जठराग्नि और हड्डियाँ अंदर से इतनी मज़बूत हो जाती हैं कि वे प्राकृतिक रूप से मिनरल्स को रोकना सीख जाती हैं।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

हालांकि आयुर्वेद इस वात और हड्डियों की कमज़ोरी को पूरी तरह रिवर्स कर सकता है, लेकिन अगर आपको अपने शरीर में ये कुछ गंभीर और अचानक होने वाले बदलाव दिखें, तो तुरंत मेडिकल जाँच ज़रूरी हो जाती है:

  • अचानक हड्डॶ टूटना (Fracture): अगर किसी बहुत मामूली सी चोट या सिर्फ झुकने भर से हड्डॶ में फ्रैक्चर हो जाए (यह गंभीर ऑस्टियोपोरोसिस का संकेत है)।
  • जोड़ों का पूरी तरह लॉक हो जाना: अगर आपका घुटना या कोई जोड़ अचानक एक ही स्थिति में जाम हो जाए और उसे सीधा करने में असहनीय दर्द हो।
  • पैरों में सुन्नपन और लकवे जैसी स्थिति: अगर कमर दर्द के साथ-साथ आपके पैरों में कोई भी सेंसेशन (Sensation) महसूस न हो और यूरिन पर नियंत्रण खत्म हो जाए।
  • जोड़ों में अचानक भयंकर लालिमा और सूजन: अगर किसी जोड़ में बहुत तेज़ दर्द के साथ सूजन आ जाए और वह हिस्सा छूने पर बहुत गर्म महसूस हो (यह गंभीर इन्फेक्शन हो सकता है)।

निष्कर्ष

अपनी हड्डियों और जोड़ों को एक ऐसी स्थायी संपत्ति मानें जो आपके पूरे शरीर का भार उठाती हैं। गर्मियों के पसीने में केवल पानी नहीं बहता, बल्कि आपकी हड्डियों का प्राकृतिक पोषण भी बाहर निकल जाता है। जब आप कोल्ड ड्रिंक्स और ठंडे एसी के बीच अपनी लाइफस्टाइल को समेट लेते हैं, तो आप अनजाने में ही अपनी अस्थि धातु को खोखला कर रहे होते हैं। सिंथेटिक कैल्शियम और तेज़ पेनकिलर्स के इस चक्रव्यूह से बाहर निकलें, जो लंबे समय में आपकी किडनी और पेट को डैमेज कर सकते हैं।

अपनी डाइट में रागी, सफेद तिल और शुद्ध गाय के घी को शामिल करें, जो हड्डियों के लिए असली अमृत हैं। अश्वगंधा और हड़जोड़ जैसी जादुई जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करें, और पंचकर्म की अभ्यंग व बस्ती थेरेपी से अपने सूखे हुए जोड़ों को प्राकृतिक चिकनाई देकर नया जीवन दें। इस दर्द और कमज़ोरी को अपनी लाइफस्टाइल का हिस्सा न बनने दें, और अपनी हड्डियों व नर्वस सिस्टम को स्थायी रूप से फौलादी बनाने तथा इससे राहत पाने के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Դ doctor.

FAQs

हाँ, बिल्कुल। जब हम बहुत ज़्यादा पसीना बहाते हैं, तो शरीर के पानी के साथ-साथ इलेक्ट्रोलाइट्स जैसे सोडियम, पोटैशियम और थोड़ी मात्रा में कैल्शियम भी रोमछिद्रों से बाहर निकल जाता है। अगर डाइट में इनकी भरपाई न हो, तो हड्डियाँ कमज़ोर होने लगती हैं।

इसे मसल क्रैम्प्स (Muscle Cramps) कहते हैं। यह मुख्य रूप से डिहाइड्रेशन और मैग्नीशियम व पोटैशियम की भारी कमी के कारण होता है। जब मांसपेशियाँ सूख जाती हैं, तो वे अचानक सिकुड़ जाती हैं और भयंकर दर्द होता है।

शत-प्रतिशत। कार्बोनेटेड कोल्ड ड्रिंक्स में फॉस्फोरिक एसिड (Phosphoric Acid) बहुत अधिक मात्रा में होता है। यह एसिड शरीर के अंदर जाते ही हड्डियों से कैल्शियम को सोखना शुरू कर देता है और उसे यूरिन के ज़रिए बाहर निकाल देता है।

हाँ, एसी की ठंडी और रूखी हवा शरीर में वात दोष को भड़काती है। लगातार एसी में रहने से जोड़ों के बीच का प्राकृतिक तरल (Lubrication) सूखने लगता है, जिससे जकड़न (Stiffness) और दर्द पैदा होता है।

गर्मियों में रागी (Finger Millet) कैल्शियम का सबसे बेहतरीन और प्राकृतिक स्रोत है। इसके अलावा रात भर भीगे हुए सफेद तिल, मोरिंगा (सहजन) और दूध के साथ थोड़ा सा शुद्ध घी हड्डियों को ज़बरदस्त ताकत देता है।

जी हाँ, अगर आप पसीना बहने पर बिना इलेक्ट्रोलाइट्स (जैसे नींबू या चुटकी भर सेंधा नमक) डाले गैलन भर सादा पानी पी लेते हैं, तो यह खून में मौजूद मिनरल्स को पतला (Dilute) कर देता है। इसे ओवर-हाइड्रेशन कहते हैं, जो कमज़ोरी लाता है।

आयुर्वेद में वात का मुख्य स्थान अस्थि (हड्डियाँ) बताया गया है। वात का गुण रूखा और ठंडा होता है। जब शरीर में नमी कम होती है, तो बढ़ा हुआ वात हड्डियों को सुखा देता है, जिससे उनमें भयंकर दर्द और कट-कट की आवाज़ें आने लगती हैं।

अश्वगंधा केवल मेध्य (दिमागी) रसायन नहीं है, बल्कि यह एक बेहतरीन बल्य (ताकत देने वाली) औषधि है। यह शरीर की मांसपेशियों और अस्थि धातु को सीधा पोषण देता है, जिससे हड्डियों और जोड़ों की कमज़ोरी दूर होती है।

बिल्कुल। गर्मियों में वात और रूखेपन से बचने के लिए हफ्ते में कम से कम दो बार अभ्यंग (मालिश) ज़रूर करनी चाहिए। आप ठंडी तासीर वाले तेल (जैसे नारियल या चंदन का तेल) या महानारायण तेल का इस्तेमाल कर सकते हैं, जो जोड़ों को चिकनाई देता है।

जानु बस्ती घुटनों के लिए एक चमत्कारिक आयुर्वेदिक थेरेपी है। इसमें घुटनों के ऊपर उड़द दाल का घेरा बनाकर गुनगुना औषधीय तेल भरा जाता है। यह तेल त्वचा के अंदर तक जाकर सूखी हुई कार्टिलेज को रिपेयर करता है और दर्द को प्राकृतिक रूप से मिटाता है।

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