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Subclinical Hypothyroidism — दवा ज़रूरी है या जीवनशैली काफ़ी?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by

आजकल एक परेशानी बहुत आम हो गई है। आप सुबह उठते हैं, लेकिन फिर भी शरीर में भारीपन लगता है। दिनभर बिना वजह की सुस्ती रहती है और वज़न धीरे-धीरे बढ़ता ही जा रहा है। हम अक्सर क्या करते हैं? इसे अपनी बिजी लाइफस्टाइल या स्ट्रेस का नाम देकर नज़रअंदाज कर देते हैं।

लेकिन जरा ध्यान दीजिए—क्या आपको बाकियों से ज़्यादा ठंड लगती है? क्या काम पर फोकस करना मुश्किल हो रहा है या मूड बार-बार स्विंग होता है? अगर हां, तो ये छोटे-छोटे इशारे बता रहे हैं कि आपके शरीर के अंदर कहीं न कहीं कोई हार्मोनल गड़बड़ी चल रही है, जो धीरे-धीरे आपकी सारी एनर्जी निचोड़ रही है।

क्या होता है ये 'Subclinical Hypothyroidism'?

'Subclinical Hypothyroidism' एक ऐसी हालत है जहां आपका थायरॉइड अंदर ही अंदर धीमा पड़ना शुरू हो गया है, लेकिन इसके लक्षण अभी खुलकर सामने नहीं आए हैं।

इसे अक्सर "छुपी हुई बीमारी" कहा जाता है क्योंकि बाहर से आप बिल्कुल ठीक लगते हैं, पर अंदर ही अंदर शरीर बदलाव महसूस कर रहा होता है। अगर शुरुआत में ही इस हल्के सुस्तपन और थकान पर ध्यान न दिया जाए, तो आगे चलकर ये आपके एनर्जी लेवल और मूड को पूरी तरह बिगाड़ सकता है।

थायरॉइड हमारे शरीर में काम कैसे करता है?

थायरॉइड शरीर की स्पीड तय करता है। यह आपके मेटाबॉलिज्म को कंट्रोल करता है। जब यह एकदम बैलेंस में होता है, तो आप खुद को एनर्जी से भरा हुआ महसूस करते हैं, आपका दिमाग तेज़ चलता है और रोज़मर्रा के काम आसानी से निबट जाते हैं।

लेकिन जब यह बॉस (थायरॉइड) सुस्त पड़ जाता है, तो शरीर की रफ्तार भी कम हो जाती है। आप हर वक्त थका हुआ और भारी महसूस करते हैं, वज़न बढ़ता है और सोचने-समझने में एक अजीब सा भारीपन (Brain fog) लगता है।

रिपोर्ट की भाषा को आसानी से समझें: Subclinical Hypothyroidism का क्या मतलब है?

जब डॉक्टर कहते हैं कि आपको 'Subclinical' थायरॉइड है, तो उनके कहने का मतलब है कि शरीर में असंतुलन बस शुरू हुआ है। बाहर से सब नॉर्मल है, पर अंदर का सिस्टम थोड़ा डगमगा रहा है। आइए इसे बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं:

  • 'Subclinical' का सीधा मतलब: बीमारी अभी अपनी बिल्कुल शुरुआती स्टेज में है। इसके लक्षण इतने हल्के होते हैं कि हम उन्हें अपनी रोज़मर्रा की थकान मान लेते हैं।
  • बढ़ा हुआ TSH: TSH वो हार्मोन है जो आपके दिमाग से निकलता है और थायरॉइड को काम करने का ऑर्डर देता है। जब आपका थायरॉइड सुस्त पड़ने लगता है, तो दिमाग ज़्यादा मात्रा में TSH भेजता है ताकि थायरॉइड जाग जाए और काम करे। यही वजह है कि आपकी ब्लड रिपोर्ट में TSH का लेवल बढ़ा हुआ आता है।
  • T3 और T4 का नॉर्मल रहना: ये दोनों आपके असली एनर्जी हार्मोन्स हैं। 'Subclinical' स्टेज में ये अभी भी नॉर्मल लेवल पर होते हैं, यानी आपका मुख्य सिस्टम अभी पूरी तरह से नहीं बिगड़ा है।
  • TSH एक 'अलार्म' की तरह है: मान लीजिए किसी कंपनी में काम धीमा हो रहा है, तो बॉस जोर-जोर से चिल्लाकर काम तेज़ करने को कहता है। शरीर में TSH भी बिल्कुल वही बॉस है, जो थायरॉइड पर जोर डाल रहा है।
  • अंदरूनी दबाव की शुरुआत: भले ही रिपोर्ट में T3 और T4 नॉर्मल दिख रहे हों, लेकिन इस नॉर्मल लेवल को बनाए रखने के लिए आपके शरीर को बहुत एक्स्ट्रा मेहनत करनी पड़ रही है। यह एक शुरुआती दबाव है, और अगर अभी ध्यान न दिया गया, तो आगे चलकर ये पूरी तरह से हाइपोथायरॉइडिज्म में बदल सकता है।

इसलिए, शरीर के इन छोटे इशारों को समझें और समय रहते सही लाइफस्टाइल और खान-पान से इस अंदरूनी दबाव को कम करने की कोशिश करें।

इसके मुख्य कारण क्या होते हैं?

Subclinical Hypothyroidism के पीछे कोई एक कारण नहीं होता, बल्कि कई छोटे-छोटे कारण मिलकर शरीर के थायरॉइड संतुलन को धीरे-धीरे प्रभावित करते हैं। शुरुआत में यह बदलाव बहुत धीमे होते हैं, इसलिए तुरंत पता नहीं चलता।

मुख्य कारण:

  • ऑटोइम्यून बदलाव (जैसे Hashimoto): इसमें शरीर की इम्यून सिस्टम गलती से थायरॉइड ग्रंथि पर असर डालने लगती है, जिससे उसकी कार्यक्षमता धीरे-धीरे कम हो सकती है।
  • आयोडीन का असंतुलन: शरीर में आयोडीन की कमी या अधिकता दोनों ही थायरॉइड के काम को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे हार्मोन का संतुलन बिगड़ सकता है।
  • जेनेटिक कारण: कुछ लोगों में यह समस्या परिवार से जुड़ी हो सकती है, यानी अनुवांशिक रूप से थायरॉइड की प्रवृत्ति मिल सकती है।
  • लंबे समय तक तनाव: लगातार तनाव शरीर के हार्मोन सिस्टम को प्रभावित करता है और धीरे-धीरे थायरॉइड की कार्यक्षमता पर असर डाल सकता है।
  • कुछ दवाइयों का असर: कुछ दवाइयों के लंबे समय तक उपयोग से भी थायरॉइड हार्मोन के संतुलन में बदलाव आ सकता है।

धीरे-धीरे शरीर का यह असंतुलन बिना किसी तेज़ संकेत के बढ़ता रहता है, इसलिए इसे अक्सर शुरुआत में पहचानना मुश्किल होता है।

शुरुआती लक्षण जो अक्सर नज़रअंदाज हो जाते हैं

Subclinical Hypothyroidism में शरीर धीरे-धीरे संकेत देने लगता है, लेकिन ये संकेत इतने हल्के होते हैं कि अक्सर लोग इन्हें सामान्य थकान या लाइफस्टाइल की वजह मानकर नज़रअंदाज कर देते हैं।

मुख्य शुरुआती लक्षण:

  • लगातार थकान महसूस होना: आराम करने के बाद भी शरीर में एनर्जी नहीं आती और हमेशा थकावट महसूस होती रहती है।
  • वज़न का धीरे-धीरे बढ़ना: बिना ज़्यादा बदलाव के भी शरीर का वज़न धीरे-धीरे बढ़ने लगता है, जिसे अक्सर लोग समझ नहीं पाते।
  • मूड में हल्की उदासी: मन हल्का भारी या उदास सा महसूस हो सकता है, जिससे काम में रुचि भी कम लगने लगती है।
  • ठंड ज़्यादा लगना: सामान्य मौसम में भी शरीर को ज़्यादा ठंड महसूस होती है, क्योंकि मेटाबॉलिज्म धीमा होने लगता है।

ये सभी लक्षण इतने हल्के होते हैं कि अक्सर लोग इन्हें सिर्फ रोज़मर्रा की थकान या बदलती लाइफस्टाइल समझकर छोड़ देते हैं।

Subclinical Hypothyroidism की संभावित जटिलताएँ (Complications)

अगर Subclinical Hypothyroidism को लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया जाए, तो धीरे-धीरे शरीर के कई सिस्टम पर असर पड़ सकता है। शुरुआत में यह हल्का होता है, लेकिन समय के साथ समस्या बढ़ सकती है।

मुख्य जटिलताएँ:

  • स्पष्ट हाइपोथायरॉइडिज्म में बदलना: समय के साथ TSH और बढ़ सकता है और T3, T4 भी कम होने लगते हैं, जिससे पूरी तरह थायरॉइड की समस्या विकसित हो सकती है।
  • लगातार थकान और कमज़ोरी: शरीर की ऊर्जा लगातार कम होने लगती है, जिससे रोज़मर्रा के काम करना भी मुश्किल लग सकता है।
  • वज़न बढ़ने की समस्या: मेटाबॉलिज्म धीमा होने से वज़न नियंत्रित करना कठिन हो सकता है।
  • दिल और कोलेस्ट्रॉल पर असर: लंबे समय में कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है, जिससे हार्ट हेल्थ पर भी असर पड़ने की संभावना रहती है।
  • मूड और मानसिक स्वास्थ्य पर असर: उदासी, चिड़चिड़ापन या फोकस की कमी जैसी समस्याएँ बढ़ सकती हैं।

अगर इसे समय पर समझकर ध्यान दिया जाए, तो आगे होने वाली जटिलताओं को काफी हद तक रोका जा सकता है।

आयुर्वेद की नज़र में थायरॉइड: कोई बीमारी नहीं, बस बिगड़ा हुआ बैलेंस है

थायरॉइड को किसी खास 'बीमारी' का नाम नहीं देते। हम इसे इस तरह से देखते हैं कि आपके शरीर का अंदरूनी तालमेल बिगड़ गया है। इसकी सबसे बड़ी वजह होती है हमारी 'अग्नि' (पाचन तंत्र) का सुस्त पड़ जाना और 'धातुओं' का कमज़ोर होना।

जब पेट की आग (जठराग्नि) और शरीर के अंदरूनी हिस्सों की आग (धात्वाग्नि) कमज़ोर पड़ जाती है, तो आप जो भी खाते हैं, वो ठीक से पचकर एनर्जी में नहीं बदल पाता। बस यही वो जगह है जहां से शुरुआत होती है लगातार थकान की, वज़न बढ़ने की और पूरे हार्मोनल सिस्टम के डगमगाने की।

दोषों (कफ-वात) का खेल समझें:

  • बढ़ा हुआ कफ: जब शरीर में कफ ज़्यादा बढ़ जाता है, तो शरीर में भारीपन, सुस्ती और हर काम में धीमापन आने लगता है। हाइपोथायरॉइड में जो आपको हर वक्त थकान महसूस होती है न, वो इसी कफ का असर है।
  • बढ़ा हुआ वात: जब वात बिगड़ता है, तो शरीर के अंदरूनी सिग्नल (हार्मोनल मैसेज) सही जगह नहीं पहुंच पाते।

थायरॉइड एक ऐसा असंतुलन है जहाँ शरीर की एनर्जी, काम करने की स्पीड और बैलेंस तीनों हिल जाते हैं।

इलाज का आयुर्वेदिक तरीका: जड़ से ठीक करने की कोशिश

आयुर्वेद में 'Subclinical Hypothyroidism' का इलाज सिर्फ ब्लड रिपोर्ट में नंबर्स को ठीक करना नहीं है। हम पूरे शरीर को अंदर से वापस उसकी कुदरती लय (रिफ्रेश) में लाने पर काम करते हैं।

  • कफ और वात को शांत करना: सबसे पहला काम है उस सुस्ती (कफ) को बाहर निकालना और बेकाबू वात को शांत करना ताकि शरीर में फिर से एनर्जी आ सके।
  • अग्नि (पाचन) को सुलगाना: आपकी बुझती हुई पाचन अग्नि को फिर से तेज़ किया जाता है ताकि जो भी आप खाएं, वो एनर्जी बने, न कि वज़न बढ़ाए (मेटाबॉलिज्म एक्टिव करना)।
  • जड़ी-बूटियों का सहारा: अश्वगंधा और गुग्गुल जैसी कुछ खास जड़ी-बूटियां दी जाती हैं जो हार्मोन्स को नेचुरली बैलेंस करती हैं।
  • पंचकर्म (शरीर की सफाई): शरीर के अंदर जमे हुए सालों के कचरे (टॉक्सिन्स) को बाहर निकालकर अंदरूनी सिस्टम को एकदम साफ किया जाता है।
  • लाइफस्टाइल में बदलाव: सिर्फ दवा से काम नहीं चलता, इसलिए सही खाना, अच्छी नींद, थोड़ा व्यायाम और स्ट्रेस कम करने के तरीके भी बताए जाते हैं।

थायरॉइड को बैलेंस करने वाली कुछ बेहतरीन आयुर्वेदिक औषधियां

हम सिर्फ थायरॉइड ग्रंथि के लिए नहीं, बल्कि पूरे शरीर को ध्यान में रखकर कुछ खास जड़ी-बूटियां देते हैं:

  • अश्वगंधा: यह कमाल की चीज है। यह स्ट्रेस को खत्म करती है, शरीर में फौलादी ताकत भरती है और हार्मोन्स को बैलेंस में लाती है।
  • कांचनार गुग्गुल: थायरॉइड से जुड़ी किसी भी समस्या में यह मेटाबॉलिज्म को तेज़ करने और ग्रंथियों को सही से काम करने में बहुत मदद करता है।
  • त्रिफला: यह शरीर की अंदर से गहरी सफाई करता है। पेट साफ रहेगा तो हार्मोन्स भी खुश रहेंगे।
  • शिलाजीत: अगर आपको हर वक्त थकान और सुस्ती लगती है, तो यह आपकी एनर्जी और स्टैमिना को रॉकेट की तरह बढ़ा देता है।

शरीर को रिलैक्स और एक्टिव करने वाली पंचकर्म थेरेपीज़

दवाइयों के साथ-साथ, हम कुछ खास बाहरी थेरेपीज़ का भी इस्तेमाल करते हैं जो शरीर में जमी सुस्ती को दूर करती हैं:

  • अभ्यंग (तेल मालिश): खास जड़ी-बूटियों वाले तेल से मालिश करने पर ब्लड सर्कुलेशन दौड़ने लगता है और शरीर का सारा भारीपन छूमंतर हो जाता है।
  • स्वेदन (हर्बल भाप): हल्की भाप लेने से रोमछिद्र खुलते हैं और पसीने के जरिए सारे टॉक्सिन्स बाहर आ जाते हैं। आप एकदम हल्का महसूस करते हैं।
  • उद्वर्तन (पाउडर मसाज): सूखे हर्बल पाउडर से की जाने वाली यह मालिश कफ (सुस्ती) को काटने और मेटाबॉलिज्म को एक्टिव करने का सबसे बेहतरीन तरीका है।
  • शिरोधारा: जब माथे पर औषधीय तेल की धार लगातार गिरती है, तो दिमाग का सारा बोझ उतर जाता है। यह अच्छी नींद लाने और हार्मोन्स की सेटिंग सुधारने में बहुत कारगर है।
  • बस्तॶ: वात दोष को जड़ से खत्म करने और शरीर को अंदर से मज़बूत बनाने के लिए बस्ती को एक अचूक थेरेपी माना जाता है।

Subclinical Hypothyroidism में आयुर्वेदिक आहार (Aahar)

इस स्थिति में सही आहार बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि यही शरीर के मेटाबॉलिज्म और हार्मोनल संतुलन को सपोर्ट करता है। आयुर्वेद में ऐसा भोजन लेने की सलाह दी जाती है जो अग्नि को मज़बूत करे और कफ को बढ़ने न दे।

मुख्य आहार सुझाव:

  • हल्का और गर्म भोजन: ताजा, गरम और आसानी से पचने वाला खाना अग्नि को मज़बूत करता है और सुस्ती कम करता है।
  • हरी सब्जियाँ और मौसमी फल: शरीर को जरूरी पोषण देते हैं और मेटाबॉलिज्म को सपोर्ट करते हैं।
  • मसालों का संतुलित उपयोग: अदरक, दालचीनी और हल्दी जैसे मसाले पाचन सुधारने और शरीर को एक्टिव रखने में मदद करते हैं।
  • प्रोटीन युक्त भोजन: दालें, मूंग, पनीर जैसे हल्के प्रोटीन शरीर की ताकत बनाए रखने में मदद करते हैं।
  • गुनगुना पानी और हर्बल ड्रिंक्स: यह पाचन को बेहतर रखते हैं और शरीर में जमा टॉक्सिन्स को बाहर निकालने में सहायक होते हैं।
  • किन चीजों से बचें: ज़्यादा तला-भुना, ठंडा, पैकेज्ड और बहुत भारी भोजन कफ बढ़ा सकता है, जिससे सुस्ती बढ़ सकती है।

सही आहार के साथ शरीर धीरे-धीरे संतुलन में आने लगता है और थायरॉइड फंक्शन को बेहतर सपोर्ट मिलता है।

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

मेरा नाम सुनील सिंह है और मैं फरीदाबाद का रहने वाला हूँ। कुछ समय पहले मेरा वजन अचानक बढ़ने लगा, जिसके बाद जांच कराने पर पता चला कि मुझे थायरॉइड की समस्या है। मैंने एलोपैथिक दवाइयाँ लीं, लेकिन मेरे वजन में कोई खास सुधार नहीं हुआ। बाद में दोबारा जांच कराने पर पता चला कि मुझे फैटी लिवर (ग्रेड 3) और किडनी से जुड़ी कुछ समस्याएँ भी हैं। इस दौरान मैं बहुत परेशान रहने लगा और कई रातें नींद नहीं आती थी। फिर मैंने आयुर्वेद का सहारा लेने का फैसला किया और जीवा क्लिनिक से संपर्क किया। यहाँ डॉक्टरों ने मेरी पूरी जांच करके मेरी समस्या के मूल कारण को समझा और उसी के अनुसार उपचार शुरू किया। मुझे थायरॉइड के लिए पर्सनलाइज्ड डाइट के साथ आयुर्वेदिक दवाइयाँ दी गईं। धीरे-धीरे मेरी सेहत में सुधार हुआ और मेरा फैटी लिवर ग्रेड 3 से घटकर ग्रेड 1 हो गया। आज मैं पहले से काफी बेहतर महसूस करता हूँ और आयुर्वेदिक जीवनशैली की सभी को सलाह देता हूँ।

कब डॉक्टर से सलाह लें?

थायरॉइड की समस्या को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए, खासकर जब लक्षण लगातार बने रहें या बढ़ने लगें। ऐसे में विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी होता है:

  • लगातार थकान और सुस्ती: अगर आराम के बाद भी थकान खत्म नहीं हो रही हो और एनर्जी बहुत कम महसूस हो।
  • वज़न में अचानक बदलाव: बिना वजह वज़न बढ़ना या कम होना, जिसे नियंत्रित करना मुश्किल हो रहा हो।
  • ठंड या गर्मी ज़्यादा लगना: सामान्य मौसम में भी शरीर का तापमान असामान्य महसूस होना।
  • बाल झड़ना और त्वचा में बदलाव: बालों का पतला होना, ड्राई स्किन या चेहरे की चमक कम होना।
  • रिपोर्ट में असंतुलन: TSH, T3, T4 में लगातार बदलाव दिखना या लेवल बढ़ना।

निष्कर्ष

थायरॉइड सिर्फ एक हार्मोनल समस्या नहीं, बल्कि शरीर के अंदरूनी संतुलन का संकेत है। आधुनिक चिकित्सा जहां हार्मोन लेवल को जल्दी नियंत्रित करने पर ध्यान देती है, वहीं आयुर्वेद शरीर की जड़ समस्या को समझकर उसे धीरे-धीरे संतुलित करने का प्रयास करता है।

असल में दोनों दृष्टिकोण अपने-अपने तरीके से महत्वपूर्ण हैं। जहां तुरंत राहत और नियंत्रण की जरूरत हो, वहां मॉडर्न इलाज मदद करता है, वहीं लंबे समय तक संतुलन बनाए रखने के लिए जीवनशैली, आहार और शरीर की अंदरूनी सेहत पर काम करना जरूरी हो जाता है।

अगर सही समय पर ध्यान दिया जाए, तो थायरॉइड को बेहतर तरीके से मैनेज किया जा सकता है। संतुलित खानपान, सही दिनचर्या, तनाव का नियंत्रण और शरीर की जरूरतों को समझना ही असली कुंजी है। जब शरीर अंदर से संतुलित होता है, तो न सिर्फ थायरॉइड बल्कि पूरी सेहत बेहतर महसूस होने लगती है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Դ doctor.

FAQs

हर केस में ऐसा नहीं होता। कई लोगों में यह लंबे समय तक हल्का ही बना रहता है। लेकिन कुछ मामलों में धीरे-धीरे बढ़कर पूरा हाइपोथायरॉइडिज्म बन सकता है। यह व्यक्ति की बॉडी, लाइफस्टाइल और कारणों पर निर्भर करता है। इसलिए नियमित जांच जरूरी रहती है।

अक्सर इसमें लक्षण बहुत हल्के होते हैं या बिल्कुल महसूस नहीं होते। कई लोग सिर्फ टेस्ट में ही इसका पता लगाते हैं। यही वजह है कि इसे नजरअंदाज कर दिया जाता है। लेकिन अंदर ही अंदर असर शुरू हो सकता है।

हर व्यक्ति को तुरंत दवा की जरूरत नहीं होती। अगर TSH बहुत ज्यादा नहीं है और लक्षण हल्के हैं, तो डॉक्टर पहले निगरानी और जीवनशैली सुधार की सलाह दे सकते हैं। लेकिन कुछ मामलों में दवा जरूरी हो सकती है। सही फैसला रिपोर्ट और स्थिति देखकर लिया जाता है।

कुछ मामलों में हल्का असंतुलन अपने आप सामान्य हो सकता है। खासकर अगर कारण अस्थायी हो जैसे तनाव या बीमारी। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता, इसलिए इसे नजरअंदाज करना सही नहीं है। नियमित फॉलोअप जरूरी है।

कुछ लोगों में मेटाबॉलिज्म थोड़ा धीमा हो सकता है, जिससे वजन बढ़ने की संभावना रहती है। लेकिन यह हर व्यक्ति में एक जैसा नहीं होता। सही खानपान और एक्टिव लाइफस्टाइल से इसे कंट्रोल किया जा सकता है।

लंबे समय तक अनदेखा करने पर यह कोलेस्ट्रॉल लेवल को प्रभावित कर सकता है। इससे दिल की सेहत पर भी असर पड़ने का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए समय पर ध्यान देना जरूरी है।

हाँ, यह हार्मोनल संतुलन को प्रभावित कर सकता है, जिससे प्रेग्नेंसी प्लानिंग पर असर पड़ सकता है। इसलिए जो महिलाएं गर्भधारण की सोच रही हैं, उनके लिए इसका संतुलन जरूरी है।

 जी हाँ, डाइट और लाइफस्टाइल बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सही खानपान, पर्याप्त नींद और तनाव नियंत्रण से शरीर को संतुलन में लाने में मदद मिलती है। यह स्थिति को बिगड़ने से रोक सकता है।

 हाँ, क्योंकि यह स्थिति समय के साथ बदल सकती है। इसलिए समय-समय पर TSH, T3 और T4 की जांच करवाना जरूरी होता है। इससे स्थिति पर नजर बनी रहती है।

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