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सोरायसिस को बस Cream से दबाते रहे — जानें अंदर क्या बनता रहा

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

ज़्यादातर लोग सोरायसिस को बस स्किन के मामूली दाग-धब्बे मानकर अनदेखा कर देते हैं। होता क्या है कि शरीर पर लाल चकत्ते, खुजली या रूखी पपड़ी दिखी, तो हम तुरंत बाजार से कोई क्रीम या मलहम ले आते हैं। हमें लगता है कि इससे फौरन आराम मिल जाएगा। कुछ दिन के लिए सच में सब ठीक भी लगने लगता है। लेकिन असली परेशानी तब शुरू होती है, जब कुछ ही दिनों में यह बीमारी फिर से लौट आती है। बार-बार इसका वापस आना और कभी जड़ से खत्म न होना ही इंसान को सबसे ज़्यादा थका देता है।

सच कहूं तो यह सिर्फ शरीर की नहीं, बल्कि मन की भी बीमारी बन जाती है। हर वक्त रहने वाली खुजली, जलन और स्किन के खिंचाव से इंसान का कॉन्फिडेंस एकदम टूट जाता है। कई बार लोग दूसरों के सामने जाने में बहुत असहज महसूस करने लगते हैं। पब्लिक में अपने ही शरीर को छिपाने की कोशिश करते हैं। और धीरे-धीरे यह अनचाही झिझक उनकी पूरी दिनचर्या को बुरी तरह डिस्टर्ब कर देती है।

सोरायसिस क्या है और यह कैसे दिखाई देता है?

सोरायसिस कोई आम दाद-खाज नहीं है। हमारे शरीर में नई त्वचा बनने की एक अपनी सामान्य गति होती है। लेकिन इस बीमारी में होता यह है कि नई स्किन की कोशिकाएं बहुत ही ज़्यादा तेजी से बनने लगती हैं। नतीजा यह निकलता है कि पुरानी स्किन हट नहीं पाती और त्वचा पर बहुत मोटी, रूखी और छिलके जैसी परतें जमने लगती हैं।

ये निशान अक्सर उभरे हुए लाल चकत्तों की तरह दिखते हैं। इनके ठीक ऊपर आपको सफेद या बिल्कुल चांदी के रंग जैसी एक पपड़ी जमी हुई नज़र आएगी। इसके साथ ही अजीब सी बेचैनी, खुजली और जलन महसूस होती है। कई बार ऐसा लगता है कि बीमारी कुछ दिनों के लिए शांत हो गई है। लेकिन फिर अचानक से यह भयानक रूप में वापस आ जाती है। यह बार-बार उभरने वाला खेल मरीज को बुरी तरह परेशान कर देता है।

सोरायसिस के लक्षण क्या हैं?

इस बीमारी को सिर्फ स्किन की ऊपरी परेशानी समझना गलत होगा। यह धीरे-धीरे आपके शरीर को बहुत ज़्यादा सेंसिटिव और बेचैन कर देती है। शुरू-शुरू में तो इसके लक्षण बहुत हल्के और मामूली लगते हैं। लेकिन जैसे-जैसे वक्त बीतता है, ये संकेत एकदम साफ और लगातार महसूस होने लगते हैं:

  • उभरे हुए लाल चकत्ते: स्किन पर जगह-जगह लाल रंग के निशान उभर आते हैं।
  • चांदी जैसी पपड़ी (स्केलिंग): इन लाल निशानों के ऊपर सफेद या चांदी जैसी दिखने वाली रूखी परत जमने लगती है।
  • तेज खुजली और जलन: हर वक्त ऐसी खुजली और जलन रहती है, जो कई बार बर्दाश्त के बाहर हो जाती है।
  • स्किन का फटना: त्वचा इतनी ज़्यादा सूख जाती है कि उसमें दरारें पड़ जाती हैं और कई बार खून भी रिसने लगता है।
  • सूखापन और खिंचाव: स्किन में हर वक्त एक अजीब सा रूखापन और भारी खिंचाव बना रहता है।
  • जोड़ों का दर्द: कई बार बात सिर्फ स्किन तक ही नहीं रुकती, शरीर के जोड़ों में भी तेज दर्द और जकड़न शुरू हो जाती है।

सोरायसिस क्यों होता है? (इसके मुख्य कारण)

सोरायसिस किसी एक वजह से रातों-रात नहीं हो जाता। असल में यह शरीर के अंदर और बाहर चल रही कई तरह की गड़बड़ियों का मिला-जुला नतीजा होता है। जब शरीर का अंदरूनी बैलेंस बिगड़ता है, तो उसका असर धीरे-धीरे स्किन पर दिखने लगता है। इसके पीछे ये मुख्य कारण हो सकते हैं:

  • कमज़ोर हाजमा: जब पेट में खाना ठीक से पचता नहीं है, तो वह सड़कर शरीर में गंदगी (Toxins) बना देता है, जो सीधा स्किन को नुकसान पहुंचाती है।
  • इम्यून सिस्टम का बिगड़ना: शरीर का डिफेन्स सिस्टम कन्फ्यूज़ हो जाता है और स्किन की कोशिकाएं बहुत तेज़ी से बनाने लगता है।
  • मानसिक तनाव (स्ट्रेस): बहुत ज़्यादा टेंशन या चिंता करने से यह बीमारी तेज़ी से भड़कती है।
  • गलत खानपान: रोज़-रोज़ ज़्यादा तला-भुना, मसालेदार या पैकेटबंद खाना शरीर के अंदर सूजन (Inflammation) बढ़ा देता है।
  • जेनेटिक कारण (आनुवंशिकता): अगर परिवार में पहले से किसी को सोरायसिस रहा है, तो इसके होने के चांस बढ़ जाते हैं।
  • मौसम की मार: सर्दियों का ठंडा और सूखा मौसम स्किन की इस परेशानी को और भी ज़्यादा बढ़ा देता है।

क्या सिर्फ क्रीम लगाने से सोरायसिस खत्म हो जाता है?

ज़्यादातर लोगों को लगता है कि कोई अच्छी सी क्रीम या मलहम लगाने से सोरायसिस हमेशा के लिए ठीक हो जाएगा। लेकिन सच तो यह है कि क्रीम सिर्फ ऊपर-ऊपर से काम करती है। यह बस कुछ वक्त के लिए आपकी खुजली, रूखेपन और चकत्तों को दबा देती है।

पर सोरायसिस की असली जड़ तो शरीर के अंदर बैठी होती है, जहाँ कोई क्रीम नहीं पहुंच सकती। इसीलिए जैसे ही आप क्रीम लगाना बंद करते हैं, बीमारी फिर से लौट आती है। अगर आप हमेशा के लिए ठीक होना चाहते हैं, तो सिर्फ बाहरी लीपापोती (क्रीम) से काम नहीं चलने वाला।

त्वचा की समस्याएँ: शरीर के अंदरूनी असंतुलन का संकेत

स्किन पर बार-बार होने वाली खुजली, दाने या चकत्ते सिर्फ बाहरी धूल-मिट्टी का नतीजा नहीं होते। ये असल में आपके शरीर का अलार्म होते हैं, जो बताते हैं कि अंदर कुछ गड़बड़ चल रही है। जब हाजमा खराब होता है, खून में गंदगी बढ़ती है या शरीर खुद को साफ नहीं कर पाता, तो ये सारी परेशानियां स्किन के रास्ते बाहर आने लगती हैं:

  • स्किन शरीर का आइना है: शरीर के अंदर जो भी खराबी चल रही होती है, वह सबसे पहले आपकी स्किन पर ही दिखाई देती है।
  • कमज़ोर पाचन: जब पेट में खाना नहीं पचता, तो शरीर के अंदर ज़हरीला कचरा (Toxins) जमा होने लगता है।
  • गंदा खून: जब खून में अशुद्धियां मिल जाती हैं, तो वह स्किन तक पहुंचकर लाल चकत्ते और सूजन पैदा कर देता है।
  • पाचन और स्किन का कनेक्शन: हाजमा खराब होने से शरीर को सही पोषण नहीं मिल पाता, जिससे स्किन कमज़ोर और सेंसिटिव हो जाती है।
  • बीमारी का लौटकर आना: जब तक शरीर के अंदर की यह गंदगी साफ नहीं होती, तब तक स्किन की बीमारी बार-बार लौटकर आती ही रहती है।

आयुर्वेद में सोरायसिस को कैसे समझा जाता है

आयुर्वेद की मानें तो सोरायसिस कोई ऐसी बीमारी नहीं है जो सिर्फ आपकी स्किन के ऊपर-ऊपर पैदा हो गई हो। असल में यह आपके शरीर के अंदरूनी सिस्टम के पूरी तरह से बिगड़ जाने का एक बड़ा इशारा है। जब हमारा हाजमा खराब होता है, खून साफ़ नहीं रहता और शरीर के दोषों का बैलेंस बिगड़ जाता है, तो उसका सीधा असर हमारी त्वचा पर दिखने लगता है। यही वजह है कि इसे सिर्फ चमड़ी का रोग कहना गलत होगा; यह असल में पूरे शरीर की अंदरूनी गड़बड़ी से जुड़ी हुई एक बड़ी स्थिति है। 

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण के मुख्य बिंदु:

  • दोष असंतुलन: मुख्य रूप से वात और कफ दोष के बिगड़ने से त्वचा पर सूखापन, परत और खुजली बढ़ती हैं।
  • रक्त अशुद्धि: अशुद्ध रक्त त्वचा तक पहुंचकर चकत्ते और सूजन पैदा करता है।
  • ऊतक असंतुलन: शरीर के ऊतकों में असंतुलन त्वचा की सामान्य संरचना को प्रभावित करता है।
  • जीवनशैली का प्रभाव: गलत खानपान, तनाव और अनियमित दिनचर्या समस्या को बढ़ा सकते हैं।

इस दृष्टिकोण में उपचार केवल त्वचा तक सीमित नहीं होता, बल्कि शरीर के अंदर संतुलन को पुनः स्थापित करने पर ध्यान दिया जाता है।

सोरायसिस के लिए आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण

आयुर्वेद में सोरायसिस के इलाज का मतलब सिर्फ ऊपरी चकत्तों को गायब करना या खुजली शांत करना बिल्कुल नहीं है। यहाँ असली मकसद बीमारी की उस मुख्य जड़ को पकड़ना और उसे ठीक करना है जहाँ से यह सब शुरू हुआ है।

  • असली जड़ पर वार: ऊपर-ऊपर दिखने वाले लक्षणों के पीछे भागने के बजाय शरीर के भीतर चल रहे असली असंतुलन को सुधारा जाता है।
  • पाचन की मशीनरी दुरुस्त करना: कमज़ोर हो चुके हाजमे को फिर से इतना मज़बूत बनाया जाता है कि पेट में ज़हरीला कचरा (आम) बनना ही हमेशा के लिए बंद हो जाए।
  • खून को अंदर से साफ़ करना: पूरे शरीर के खून को गहराई से साफ़ करने पर काम किया जाता है ताकि गंदे तत्व स्किन तक पहुँचकर नुकसान न पहुँचा सकें।
  • दोषों को शांत करना: वात और कफ दोष को वापस अपनी जगह पर लाने के लिए इंसान के शरीर की खास प्रकृति के हिसाब से इलाज तय किया जाता है।
  • खानपान और रूटीन में बदलाव: सही समय पर सादा खाना खाना, एक अनुशासित दिनचर्या अपनाना और दिमाग के तनाव को काबू में रखना इस इलाज का एक बेहद ज़रूरी हिस्सा है।
  • पूरी बॉडी की देखभाल: दवाइयों के साथ-साथ इंसान के शरीर, मन और पेट तीनों को एक साथ संभाला जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि यह बीमारी भविष्य में दोबारा कभी भी पलटकर न आ सके।

सोरायसिस को शांत करने वाली मुख्य आयुर्वेदिक औषधियां

आयुर्वेद में इस बीमारी के लिए जिन दवाओं को चुना जाता है, वे सिर्फ स्किन के ऊपर असर नहीं करतीं। वे शरीर के अंदर जाकर खून साफ़ करती हैं और हाजमे को पटरी पर लाती हैं। इन दवाओं का एकमात्र लक्ष्य बीमारी की जड़ को काटना होता है:

  • नीम: इसे कुदरत का सबसे बेहतरीन और नेचुरल ब्लड प्यूरीफायर कहा गया है। यह खून की गंदगी को साफ़ करके त्वचा को फिर से हेल्दी बनाने में बहुत मदद करता है।
  • गुडूची (गिलोय): यह जड़ी-बूटी हमारे शरीर के बिगड़े हुए इम्यून सिस्टम (रोग प्रतिरोधक क्षमता) को वापस बैलेंस में लाती है और स्किन की सूजन को तेज़ी से कम करती है।
  • कांचनार गुग्गुलु: शरीर के कोने-कोने में जमे हुए ज़हरीले तत्वों और अंदरूनी असंतुलन को खींचकर बाहर निकालने के लिए इस औषधि का इस्तेमाल बहुत फायदेमंद माना जाता है।

सोरायसिस को जड़ से मिटाने वाली आयुर्वेदिक थेरेपी

आयुर्वेद में सोरायसिस को सिर्फ खाने वाली गोलियों के भरोसे नहीं छोड़ा जाता। इसके लिए कुछ खास और गहरी थेरेपी का भी सहारा लिया जाता है। इन थेरेपी का असली काम शरीर में जमा पुराने ज़हरीले कचरे को बाहर धकेलना, दोषों को शांत करना और स्किन को अपनी पुरानी नेचुरल हालत में वापस लाना है:

  • विरेचन (डीप-क्लीनिंग क्रिया): इस प्रक्रिया के ज़रिए शरीर के अंदर जमे हुए फालतू पित्त और ज़हरीले टॉक्सिन्स को बाहर निकाल दिया जाता है। पेट साफ़ होने से स्किन की भयंकर सूजन और जलन में तुरंत आराम मिलता है।
  • अभ्यंग (औषधीय तेल मालिश): जड़ी-बूटियों से पके हुए खास तेलों से जब पूरे शरीर की मालिश की जाती है, तो रूखी हो चुकी स्किन को पूरा पोषण मिलता है। इससे त्वचा का सूखापन और खुजली बहुत कम हो जाती हैं।
  • स्वेदन (भाप से सिकाई): इसमें शरीर को जड़ी-बूटियों वाली हल्की भाप दी जाती है। इससे शरीर की पूरी जकड़न दूर होती है और त्वचा के बंद रोमछिद्रों के रास्ते सारा कचरा पसीने के रूप में बाहर बह जाता है।
  • शिरोधारा: इस थेरेपी में माथे पर लगातार एक लय में तेल गिराया जाता है। यह दिमाग के भारी तनाव और चिंता को पूरी तरह शांत कर देती है, क्योंकि मानसिक स्ट्रेस ही सोरायसिस को अचानक भड़काने का सबसे बड़ा कारण माना जाता है।

सोरायसिस के लिए आहार: क्या खाएं/क्या न खाएं 

श्रेणी क्या खाएं (शामिल करें) क्या न खाएं (परहेज करें)
अनाज और दालें पुराने चावल, मूंग दाल, दलिया, ओट्स और रागी। मैदा, सफेद ब्रेड, नूडल्स और भारी उड़द की दाल।
सब्जियां लौकी, तोरई, कद्दू, परवल और मौसमी हरी सब्जियां। कच्ची सब्जियां (ज्यादा सलाद), फूलगोभी और भारी तली सब्जियां।
डेयरी और वसा शुद्ध A2 गाय का घी, गुनगुना दूध (हल्दी के साथ) और ताजा छाछ। ठंडा दूध, पनीर (रात में), और रिफाइंड तेल।
मसाले अदरक, हल्दी, जीरा, धनिया, सोंठ और अजवाइन। बहुत ज्यादा लाल मिर्च, गरम मसाला और अत्यधिक नमक।
पेय पदार्थ गुनगुना पानी, हर्बल टी और ताजे फलों का जूस (बिना चीनी)। कोल्ड ड्रिंक्स, ज्यादा चाय/कॉफी और शराब।
मीठा और स्नैक्स गुड़, खजूर, शहद और भुने हुए मखाने। सफेद चीनी, पेस्ट्री, चॉकलेट और डिब्बाबंद स्नैक्स।

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव 

मेरा नाम अमेय है। मुझे पीठ पर रैशेज के साथ स्किन से जुड़ी समस्याएँ हो गई थीं, जिनमें फंगल इंफेक्शन, खुजली और जलन की परेशानी शामिल थी। मैंने जीवा आयुर्वेद से संपर्क किया, जहाँ डॉक्टरों ने मेरी समस्या को समझकर मेरे लिए पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट पैक तैयार किया। साथ ही मुझे जीवा बेसिल सोप के उपयोग की सलाह दी गई। इसके अलावा एक कस्टमाइज्ड डाइट प्लान भी दिया गया, जिससे मेरी स्किन कंडीशन में काफी सुधार हुआ। परिणाम बहुत अच्छे रहे और मुझे काफी राहत मिली।

कब डॉक्टर से सलाह लें? 

सोरायसिस को अक्सर केवल त्वचा की समस्या मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, लेकिन कुछ स्थितियों में यह गंभीर रूप ले सकता है। ऐसे लक्षण दिखने पर विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है:

  • तेजी से फैलते चकत्ते: यदि त्वचा पर दाग तेजी से बढ़ रहे हों या नए हिस्सों में फैल रहे हों।
  • अत्यधिक खुजली और दर्द: जब खुजली इतनी ज्यादा हो कि नींद और दैनिक जीवन प्रभावित हो।
  • त्वचा में दरार और खून: सूखी त्वचा फटकर खून आने लगे या बहुत दर्द हो।
  • जोड़ों में दर्द या जकड़न: सोरायसिस के साथ जोड़ों में सूजन या stiffness महसूस होना।
  • लंबे समय तक सुधार न होना: यदि क्रीम या उपचार के बावजूद समस्या लगातार बनी रहे या बढ़ती जाए।

निष्कर्ष

सोरायसिस केवल त्वचा की बाहरी समस्या नहीं, बल्कि शरीर के अंदर चल रहे पाचन, रक्त शुद्धि और दोष असंतुलन का संकेत है। आधुनिक चिकित्सा जहां लक्षणों को नियंत्रित करने पर ध्यान देती है, वहीं आयुर्वेद इसका कारण समझकर शरीर के अंदर संतुलन स्थापित करने पर काम करता है।

असली समाधान केवल चकत्तों को दबाना नहीं, बल्कि शरीर के अंदरूनी सिस्टम पाचन, रक्त और जीवनशैली को संतुलित करना है। जब यह संतुलन ठीक होता है, तो त्वचा की स्थिति भी धीरे-धीरे स्थिर और स्वस्थ होने लगती है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Դ doctor.

FAQs

नहीं, सोरायसिस किसी संक्रमण की तरह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलता। यह शरीर के अंदरूनी असंतुलन और इम्यून सिस्टम की प्रतिक्रिया से जुड़ी स्थिति है। इसलिए इसे छूने या संपर्क में आने से फैलने वाली बीमारी नहीं माना जाता।

सोरायसिस को लंबे समय तक नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन यह एक क्रॉनिक स्थिति हो सकती है। सही उपचार, जीवनशैली और पाचन सुधार के साथ इसके लक्षणों को काफी हद तक कम किया जा सकता है और लंबे समय तक नियंत्रण में रखा जा सकता है।

हाँ, तनाव सोरायसिस को ट्रिगर करने वाले प्रमुख कारणों में से एक है। लगातार मानसिक दबाव शरीर के इम्यून सिस्टम और हार्मोनल संतुलन को प्रभावित करता है, जिससे लक्षण बढ़ सकते हैं।

हाँ, गलत खानपान जैसे तला-भुना, प्रोसेस्ड फूड और अधिक मसालेदार भोजन शरीर में सूजन और विषैले तत्व बढ़ा सकते हैं, जिससे सोरायसिस के लक्षण और बढ़ सकते हैं।

 हाँ, ठंडा और सूखा मौसम त्वचा को अधिक ड्राई बना सकता है, जिससे खुजली और पपड़ीदार परतें बढ़ सकती हैं।

क्रीम केवल बाहरी लक्षणों को अस्थायी रूप से कम करती है। लेकिन अंदरूनी कारणों को ठीक किए बिना समस्या बार-बार वापस आ सकती है।

हाँ, कुछ मामलों में सोरायसिस के साथ psoriatic arthritis हो सकता है, जिसमें जोड़ों में दर्द, सूजन और जकड़न महसूस होती है।

नहीं, लेकिन बहुत गर्म पानी या कठोर साबुन त्वचा को और ड्राई कर सकता है। हल्के गुनगुने पानी का उपयोग बेहतर माना जाता है।

 हाँ, यह किसी भी उम्र में हो सकता है, हालांकि इसके कारण और गंभीरता व्यक्ति से व्यक्ति अलग हो सकती है।

संतुलित आहार, तनाव नियंत्रण, सही दिनचर्या और शरीर के अंदरूनी असंतुलन को समझना सबसे जरूरी है, क्योंकि यही इसके मूल कारण को प्रभावित करते हैं।

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