बच्चे को जन्म देने के बाद का समय वाकई अजीब होता है। एक तरफ तो घर में नन्हे मेहमान के आने की असीम खुशियां चहक रही होती हैं, वहीं दूसरी तरफ मां का अपना शरीर जैसे एक अलग ही जंग लड़ रहा होता है। इस नाजुक दौर में शरीर धीरे-धीरे अपनी पुरानी सामान्य स्थिति में लौटने की जद्दोजहद करता है। मगर इसी बीच कुछ ऐसी अनजानी शारीरिक तकलीफें आकर घेर लेती हैं जो किसी भी नई मां को अंदर से परेशान और चिंतित कर सकती हैं।
ऐसी ही एक बेहद आम और बेहद परेशान करने वाली आफत का नाम है सायटिका। यह कोई साधारण पीठ का दर्द नहीं होता जो थोड़ा आराम करने से ठीक हो जाए। इसमें दर्द सीधे आपकी कमर से शुरू होकर पूरे पैर तक नीचे की तरफ दौड़ता है। कभी-कभी तो यह दर्द इतना अचानक और तीखा होता है कि लगता है जैसे शरीर में बिजली का कोई तेज झटका लग गया हो।
साइटिका क्या है?
अगर सीधे और साफ शब्दों में कहें तो साइटिका कोई अलग से बीमारी नहीं है। यह असल में हमारी रीढ़ की हड्डी से जुड़ा एक ऐसा परेशान करने वाला लक्षण है जो इंसान का चैन-सुकून पूरी तरह छीन लेता है। जब यह शुरू होता है तो दर्द आपकी कमर के निचले हिस्से से उठता है और फिर कूल्हों व जांघों से रास्ता बनाता हुआ सीधे पैर की उंगलियों तक जा पहुँचता है। दरअसल हमारे शरीर में एक सबसे लंबी और मोटी नस होती है जिसे सायटिक नर्व कहते हैं। जब किसी वजह से इस नस पर दबाव पड़ता है या यह कहीं दब जाती है तो यह भयंकर दर्द शुरू होता है। कुछ लोग किस्मत वाले होते हैं जिन्हें सिर्फ हल्का सा मीठा दर्द महसूस होता है। मगर जब यह नस पूरी तरह दब जाती है तो हालत यह हो जाती है कि बिस्तर से उठना, सीधे बैठना या दो कदम चलना भी किसी महाभारत को जीतने जैसा लगने लगता है।
इस तकलीफ का रोना सिर्फ दर्द तक ही खत्म नहीं होता है। जब यह नस दबती है तो पैर में हर समय एक अजीब सी झनझनाहट होने लगती है। कभी लगता है जैसे पैर पर ढेर सारी चींटियां चल रही हों तो कभी जलन और सुन्नपन महसूस होता है। कई बार तो पैर की ताकत इतनी कम हो जाती है कि कमजोरी साफ पता चलने लगती है। हम अक्सर ऑफिस में लगातार घंटों एक ही जगह बैठे रहते हैं या गलत तरीके से झुककर काम निपटाने लगते हैं। कभी-कभार अचानक कोई भारी वजन उठा लेना या चलते-फिरते रीढ़ की हड्डी पर झटका लग जाना भी इस बेचारी नस को दबा देता है।
प्रेग्नेंसी के बाद Sciatica होने के मुख्य कारण
मां बनने का सफर बेहद खूबसूरत होता है मगर गर्भावस्था के नौ महीने और फिर बच्चे की डिलीवरी के बाद एक महिला का शरीर बहुत सारे भारी बदलावों से गुजरता है। इन बड़े शारीरिक बदलावों का सीधा असर आपकी कमर, रीढ़ की हड्डी और पैरों की नसों पर पड़ता है। यही कारण है कि बच्चे के जन्म के बाद कई महिलाओं को अचानक इस असहनीय दर्द से जूझना पड़ जाता है। चलिए समझते हैं कि इसके पीछे असल में कौन से मुख्य कारण छिपे होते हैं।
- शरीर का अचानक बढ़ा हुआ वजन: प्रेग्नेंसी के दिनों में जैसे-जैसे बच्चे का विकास होता है, मां का वजन भी तेजी से बढ़ता है। यह बढ़ा हुआ पूरा वजन सीधे तौर पर लोअर बैक और रीढ़ की हड्डी पर बहुत ज्यादा एक्स्ट्रा लोड डाल देता है जिसके कारण सायटिक नर्व पर दबाव बन जाता है।
- हार्मोनल बदलावों का लंबा असर: गर्भावस्था के दौरान शरीर में 'रिलैक्सिन' नाम का एक खास हार्मोन बनता है। इसका काम प्रसव को आसान बनाने के लिए मांसपेशियों और जोड़ों को ढीला करना होता है। मुसीबत यह है कि डिलीवरी होने के बाद भी इस हार्मोन का असर शरीर में कई महीनों तक बना रहता है जिससे कमर के जोड़ कमजोर रहते हैं और नसों पर दबाव आसानी से बढ़ जाता है।
- बच्चे की देखरेख में गलत पोस्चर: नई माताएं अक्सर अपने बच्चे को गोद में लेकर घंटों एक ही पोजीशन में बैठी रह जाती हैं। झुककर दूध पिलाना या स्तनपान कराते समय अपनी पीठ को मोड़कर रखने की आदत कमर की नसों को बुरी तरह निचोड़ देती है।
- डिलीवरी के बाद की अंदरूनी कमजोरी: बच्चे के जन्म के बाद शरीर अंदर से पूरी तरह थका हुआ और कमजोर महसूस करता है। इस समय हमारी पीठ की मांसपेशियां इतनी मजबूत नहीं होतीं कि वे रीढ़ की हड्डी को पूरा सपोर्ट दे सकें जिससे नसों पर दबाव और दर्द दोनों अचानक बढ़ जाते हैं।
प्रेग्नेंसी के बाद Sciatica के सामान्य लक्षण
डिलीवरी के बाद साइटिका की यह परेशानी हर महिला को एक ही तरह से तंग नहीं करती है। कुछ महिलाओं के लिए तो यह सिर्फ एक हल्का सा खिंचाव होता है जो कभी आता है और कभी चला जाता है। वहीं कुछ महिलाओं के लिए यह एक ऐसा परमानेंट टॉर्चर बन जाता है जो हर बीतते दिन के साथ गंभीर होता जाता है। इसके कुछ बहुत ही आम लक्षण इस तरह सामने आते हैं।
- कमर के निचले हिस्से में एक ऐसा दर्द रहने लगता है जो मानो जिद पकड़कर बैठ जाता है और लाख कोशिश के बाद भी हटने का नाम नहीं लेता।
- एक अजीब सा करंट जैसा दर्द महसूस होता है जो आपके कूल्हों से शुरू होकर जांघ और पिंडली से होता हुआ नीचे पैर के पंजे तक दौड़ता है।
- इस दर्द की सबसे बड़ी पहचान यह है कि यह कभी भी दोनों पैरों में एक साथ नहीं होता बल्कि शरीर के किसी एक ही तरफ के पैर को अपना निशाना बनाता है।
- पैरों की उंगलियों या तलवों में हर वक्त झनझनाहट बनी रहती है या पैर का वह हिस्सा बिल्कुल सुन्न पड़ जाता है जैसे कोई लगातार सुइयां चुभा रहा हो।
- सुबह सोकर उठने के बाद सीधे खड़े होने में या सोफे से अचानक उठने पर कमर में बिजली के झटके जैसी तेज टीस उठती है।
क्या यह दर्द वक़्त के साथ अपने आप रफ़ूचक्कर हो सकता है?
यह एक ऐसा सवाल है जो हर नई मां के दिमाग में बार-बार आता है। अगर सच कहें तो डिलीवरी के बाद जैसे-जैसे महिला का शरीर वापस अपने पुराने शेप में लौटने लगता है, गर्भाशय का साइज घटता जाता है और नसों पर से स्वाभाविक दबाव कम होने लगता है। ऐसे में पूरा आराम करने, बैठने-उठने का पोस्चर सही रखने और हल्की-फुल्की स्ट्रेचिंग करने से यह दर्द धीरे-धीरे अपने आप भी शांत हो सकता है। मगर ध्यान रहे कि यह हर बार अपने आप ठीक हो ही जाए, ऐसा बिल्कुल जरूरी नहीं है।
अगर आप डिलीवरी के तुरंत बाद से ही भारी काम निपटाने लगी हैं, आपके बैठने-उठने का तरीका अभी भी गलत है और शरीर को आराम का मौका नहीं मिल रहा है, तो यह दर्द जाने की बजाय जोड़ों में अपनी पक्की जगह बना लेता है। शुरुआत में जिसे आप एक साधारण सा खिंचाव समझकर टाल रही थीं, वह आगे चलकर एक बड़ी मुसीबत बन सकता है। खासकर अगर दर्द के साथ-साथ पैर में झनझनाहट और सुन्नपन का दायरा बढ़ता जा रहा हो तो किसी चमत्कार के भरोसे हाथ पर हाथ धरकर मत बैठिए।
रोज़मर्रा की कौन-सी आदतें दर्द बढ़ा सकती हैं?
कई बार हम बड़ी-बड़ी दवाइयां तो समय पर खा लेते हैं, लेकिन अपनी उन छोटी-छोटी खराब आदतों पर ध्यान देना भूल जाते हैं जो इस साइटिका के दर्द को अंदर ही अंदर हवा दे रही होती हैं। अगर आप भी रोज़ाना ये गलतियां कर रही हैं तो तुरंत संभल जाइए।
- बिना कोई ब्रेक लिए लगातार एक ही कुर्सी, स्टूल या सोफे पर घंटों तक जमी रहना।
- घुटने मोड़ने की बजाय सीधे अपनी कमर के बल झुककर जमीन से सामान उठाना या झाड़ू-पोछा करना।
- बिना किसी सहारे या सपोर्ट के अचानक झटके से कोई भारी चीज या पानी से भरी बाल्टी उठा लेना।
- बहुत ज्यादा सॉफ्ट, रुई वाले या धंसे हुए गद्दे पर सोने की आदत जो रीढ़ की हड्डी के नेचुरल शेप को पूरी तरह बिगाड़ देती है।
- रात की अधूरी नींद के बाद दिन में भी अपने शरीर को थोड़ा सा रिलैक्स होने का समय न देना।
- दिनभर में बार-बार बिना किसी सहारे के सीढ़ियां चढ़ना और उतरना।
साइटिका और आम कमर दर्द: दोनों के फ़र्क को समझना बेहद ज़रूरी है
साधारण कमर दर्द का दायरा बहुत छोटा होता है। यह सिर्फ आपकी पीठ या कमर के निचले हिस्से के आसपास ही सीमित रहता है। यह ज्यादातर मांसपेशियों में आए खिंचाव या बहुत ज्यादा थकान की वजह से पैदा होता है। इसमें सबसे अच्छी बात यह होती है कि अगर आप एक-दो दिन अच्छे से बेड रेस्ट कर लें या कोई दर्द निवारक बाम लगा लें तो यह पूरी तरह ठीक हो जाता है।
इसके उलट साइटिका का दर्द बहुत जिद्दी और लंबा होता है। यह सिर्फ कमर तक रुकता नहीं है बल्कि वहां से शुरू होकर एक पूरी लाइन की तरह आपके कूल्हों, जांघों और पैरों के नीचे तक दौड़ लगाता है। इसके साथ ही आपको प्रभावित पैर में सुन्नपन, जलन और करंट जैसी झनझनाहट का पूरा पैकेज मुफ्त मिलता है। यह दर्द सिर्फ आराम करने से आसानी से पीछा नहीं छोड़ता और आपके सामान्य चलने-फिरने में भी रुकावट पैदा करता है। इसलिए अपनी तकलीफ को सही तरीके से पहचानना सीखिए ताकि सही समय पर सही इलाज शुरू हो सके।
आयुर्वेद Sciatica को कैसे देखता है?
जब मॉडर्न मेडिकल साइंस साइटिका को सिर्फ़ एक दबी हुई नस मानकर पेनकिलर या सर्जरी की बात करता है, तब आयुर्वेद इस समस्या को शरीर के गहरे असंतुलन से जोड़कर देखता है। आयुर्वेद में साइटिका को 'गृध्रसी' कहा जाता है और इसे सीधे तौर पर बढ़े हुए 'वात दोष' यानी भड़की हुई हवा की आफ़त माना जाता है। जब शरीर में वात का बैलेंस बिगड़ता है, तो वह कमर के निचले हिस्से की नसों को सुखा देता है। इसी वज़ह से कमर में असहनीय दर्द शुरू होता है, जो करंट की तरह झनझनाहट, सुन्नपन और तीखे खिंचाव के रूप में पैरों तक दौड़ता है।
ख़ास तौर पर प्रेग्नेंसी और डिलीवरी के बाद महिलाओं का शरीर अंदर से बहुत कमज़ोर हो जाता है। बच्चे को जन्म देने के बाद होने वाली भारी थकान, रातों की अधूरी नींद और शरीर को पूरा आराम न मिलना—ये सारी स्थितियाँ आग में घी का काम करती हैं और शरीर में वात दोष को सातवें आसमान पर पहुँचा देती हैं। यही वज़ह है कि डिलीवरी के बाद साइटिका चुपके से हमला कर देता है। आयुर्वेद में इसका इलाज सिर्फ़ ऊपर-ऊपर से दर्द को दबाना नहीं है, बल्कि शरीर की अंदरूनी ताक़त को वापस लौटाना, भड़के हुए वात को शांत करना और कमज़ोर हो चुकी नसों को अंदर से लोहे जैसा मज़बूत बनाना है। इसके लिए सही खान-पान, एक शांत दिनचर्या और आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ बहुत काम आती हैं।
नसों को ताक़त देने वाली और वात को ढीला करने वाली आयुर्वेदिक औषधियाँ
आयुर्वेद में ऐसी कई कमाल की औषधियाँ और जड़ी-बूटियाँ हैं जो डिलीवरी के बाद न्यू मॉम्स की अंदरूनी कमज़ोरी को दूर करती हैं और सायटिक नर्व के दर्द को जड़ से सोख लेती हैं। आइए जानते हैं इन मुख्य बूटियों के बारे में:
- अश्वगंधा: यह शरीर की सुस्ती, थकान और कमज़ोरी को मिटाने की सबसे नंबर वन दवा है। यह डिलीवरी के बाद ढीली पड़ चुकी मांसपेशियों और कमज़ोर नसों को अंदर से गज़ब की ताक़त देती है।
- दशमूल: दस पवित्र जड़ों से बना यह कॉम्बिनेशन वात दोष का सबसे बड़ा दुश्मन है। यह कमर की सूजन को ख़त्म करता है और पैरों में दौड़ने वाले करंट जैसे दर्द को शांत कर देता है।
- गिलोय: यह शरीर की अंदरूनी रिकवरी की स्पीड को बढ़ाती है। डिलीवरी के बाद जो अंदरूनी कमज़ोरी रह जाती है, यह उसे दूर करके शरीर की नेचुरल रक्षा प्रणाली को मज़बूत बनाती है।
- त्रिफला: आंवला, बहेड़ा और हरड़ का यह चूर्ण पेट को साफ़ रखता है। आयुर्वेद मानता है कि अगर पेट में कब्ज़ होगी तो वात और भड़केगी, इसलिए त्रिफला पाचन को दुरुस्त रखकर वात को काबू में रखता है।
आयुर्वेदिक थेरेपी: जब नसों को चाहिए सुकून और आराम की गर्माहट
अगर डिलीवरी के बाद साइटिका की वज़ह से उठना-बैठना दूभर हो गया है, तो सिर्फ़ दवाइयाँ खाने से पूरी बात नहीं बनेगी। शरीर को बाहर से भी थोड़े लाड-प्यार, मालिश और सही देखभाल की सख़्त ज़रूरत होती है। ये थेरेपीज़ नई माताओं को धीरे-धीरे पुराने शेप में लौटने में मदद करती हैं:
- अभ्यंग (गर्म तेल की मालिश): औषधीय और वात-नाशक तेलों से जब कमर, कूल्हों और पैरों की हल्के हाथों से मालिश की जाती है, तो नसों का सूखापन ख़त्म होता है। इससे वहाँ की जकड़न टूटती है और पूरे शरीर को एक जादुई आराम मिलता है।
- स्वेदन (भाप थेरेपी): मालिश के तुरंत बाद जब शरीर को जड़ी-बूटियों की हल्की भाप दी जाती है, तो मांसपेशियों की अकड़न पसीने के रास्ते ढीली पड़ जाती है और पूरा शरीर एकदम हल्का महसूस करने लगता है।
- कटि बस्ती (कमर की ख़ास थेरेपी): यह साइटिका के लिए सबसे अचूक इलाज माना जाता है। इसमें रीढ़ के निचले हिस्से पर उड़द के आटे का एक घेरा बनाकर, उसमें गुनगुना औषधीय तेल कुछ समय के लिए रोककर रखा जाता है। यह तेल सीधे दबी हुई नस के अंदर तक समाकर उसे पोषण देता है और दर्द को गायब कर देता है।
सहायक आहार: क्या खाएं और क्या न खाएं
क्या खाएं?
- ताजा और हल्का भोजन
- हरी सब्जियां और मौसमी फल
- गुनगुना पानी
- मूंग दाल और सुपाच्य भोजन
- सीमित मात्रा में घी
- सूखे मेवे और पौष्टिक आहार
- फाइबर से भरपूर चीजें
क्या न खाएं?
- बहुत ज्यादा तला हुआ भोजन
- अत्यधिक ठंडी चीजें
- बहुत ज्यादा चाय और कॉफी
- पैकेट बंद और प्रोसेस्ड फूड
- ज्यादा मसालेदार भोजन
- लंबे समय तक खाली पेट रहना
- देर रात तक जागना
आख़िर कब समझें कि अब सीधे डॉक्टर के पास जाने का वक़्त आ गया है?
देखिए, डिलीवरी के बाद थोड़ा-बहुत बदन दर्द होना या थकान लगना एक अलग बात है। लेकिन अगर साइटिका का यह दर्द ज़िद पकड़ ले और आपकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का पहिया ही जाम करने लगे, तो इसे 'नॉर्मल डिलीवरी पेन' समझकर चुपचाप सहते रहने की भूल बिल्कुल मत कीजिए। कुछ ऐसे साफ़ इशारे हैं जिन्हें आपको भूलकर भी नज़रांदाज़ नहीं करना चाहिए, और तुरंत किसी अच्छे डॉक्टर या विशेषज्ञ की राय लेनी चाहिए:
- जब कमर से शुरू होकर पैरों की उंगलियों तक जाने वाला यह दर्द हर गुज़रते दिन के साथ और ज़्यादा ख़तरनाक होता जाए
- जब पैरों का सुन्न पड़ जाना या सुइयाँ चुभने जैसी झनझनाहट इतनी बढ़ जाए कि पैर बेजान महसूस होने लगे
- जब बिस्तर से उठकर टॉयलेट तक जाने या दो कदम चलने में भी आंसू निकल आएं
- जब सोफ़े या कुर्सी पर सीधे बैठना या अचानक खड़े होना एक भयानक टॉर्चर बन जाए
- जब चलते-चलते अचानक पैर मुड़ने लगे या ऐसा लगे कि पैरों में वज़न संभालने की ताक़त ही नहीं बची है
निष्कर्ष
तो पूरी कहानी का सार यह है कि प्रेग्नेंसी और डिलीवरी के बाद होने वाला साइटिका कोई मामूली कमर दर्द नहीं है जिसे आप बस एक गरम पानी की थैली से दबा दें। यह आपकी दबी हुई नसों का एक सीधा रोना है, जो शरीर की अंदरूनी कमज़ोरी, बच्चे को संभालने के चक्कर में बैठने-उठने के ग़लत तरीक़ों और शरीर में भड़के हुए वात दोष की वज़ह से और ज़्यादा परेशान कर रहा है। इसके कारण कमर, कूल्हों और पैरों में होने वाला यह दर्द धीरे-धीरे आपकी पूरी लाइफस्टाइल को अस्त-व्यस्त कर देता है।





























