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Lumbar Spondylosis में Permanent Cure संभव है या Lifelong Management?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 09 May, 2026
  • category-iconUpdated on 09 Jun, 2026
  • category-iconJoint Health
  • blog-view-icon5044

सुबह उठते ही कमर में एक अजीब सी जकड़न महसूस होना, कुर्सी पर लगातार 8-9 घंटे बैठकर काम करने के बाद उठने पर रीढ़ की हड्डी का सीधा न होना, और फिर यह दर्द धीरे-धीरे कमर से खिसक कर पैरों की उँगलियों तक सुन्नपन के रूप में उतर आना। जब कमर का यह दर्द हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन जाता है, तो डॉक्टर हमें एक भारी-भरकम शब्द थमा देते है "लम्बर स्पॉन्डिलोसिस" Lumbar Spondylosis। इसके साथ ही शुरू होता है एमआरआई MRI, पेनकिलर्स और बेल्ट्स का एक अंतहीन सिलसिला।

मरीज़ के मन में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है: "क्या मेरी कमर पहले की तरह पूरी तरह ठीक हो सकती है Permanent Cure, या अब मुझे ज़िंदगी भर इसी दर्द के साथ जीना पड़ेगा Lifelong Management?" आधुनिक चिकित्सा अक्सर इसे उम्र बढ़ने के साथ होने वाली घिसावट Wear and Tear बताकर आपको ज़िंदगी भर पेनकिलर्स या अंततः सर्जरी का रास्ता दिखाती है। लेकिन आयुर्वेद इसे शरीर में बढ़े हुए वात दोष और अस्थि-मज्जा धातु के क्षय के रूप में देखता है, जिसका अगर सही समय पर और जड़ से इलाज किया जाए, तो आप एक दर्द-मुक्त और पूरी तरह से सामान्य जीवन जी सकते हैं।

कमर के निचले हिस्से का यह दर्द शरीर में क्या संकेत देता है?

लम्बर स्पॉन्डिलोसिस दरअसल हमारी रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से Lumbar spine की हड्डियों Vertebrae और उनके बीच की गद्दी Intervertebral Discs के सूखने और घिसने की स्थिति है।

  • डिस्क का सूखना Disc Degeneration: हमारी रीढ़ की हड्डी के मनकों के बीच एक जेली जैसी गद्दी होती है जो शॉक-एब्जॉर्बर का काम करती है। लगातार गलत पोश्चर में बैठने या भारी वज़न उठाने से यह गद्दी सूखने लगती है।
  • हड्डियों का बढ़ना Osteophytes: जब डिस्क घिस जाती है, तो हड्डियाँ आपस में रगड़ खाने लगती हैं। इस रगड़न से शरीर अपने बचाव के लिए वहां अतिरिक्त हड्डी Bone spurs बनाने लगता है।
  • नसों का दबना Nerve Compression: यही बढ़ी हुई हड्डियाँ और खिसकी हुई डिस्क Bulging disc वहां से गुज़रने वाली नसों विशेषकर Sciatic nerve को दबाने लगती है। यही कारण है कि कमर का दर्द पैरों में झुनझुनी और सुन्नपन के रूप में उतरने लगता है।

Lumbar Spondylosis और नसों का डैमेज किन प्रकारों में सामने आता है?

आयुर्वेद के अनुसार, हर व्यक्ति की प्रकृति अलग होती है। लम्बर स्पॉन्डिलोसिस में रीढ़ की हड्डी पर पड़ने वाला प्रभाव शरीर के दोषों के आधार पर मुख्य रूप से तीन प्रकारों में देखा जा सकता है:

  • वात-प्रधान कटी शूल Vata: इस स्थिति में रीढ़ की हड्डी और नसों में भयंकर रूखापन आ जाता है। दर्द एक जगह नहीं टिकता, बल्कि कमर से कूल्हों और पैरों तक करंट की तरह दौड़ता है जिसे सायटिका कहते हैं। पैर की उँगलियों में सुन्नपन आ जाता है और ठंडे मौसम में दर्द असहनीय हो जाता है।
  • पित्त-प्रधान कटी शूल Pitta: इसमें नसों के दबने के साथ-साथ कमर के निचले हिस्से में आग लगने जैसी जलन Burning sensation और भारी सूजन Inflammation होती है। मरीज़ को कमर के हिस्से में गर्माहट महसूस होती है और खड़े होने पर यह जलन और बढ़ जाती है।
  • कफ-प्रधान कटी शूल Kapha: लगातार बैठे रहने और धीमे मेटाबॉलिज़्म के कारण यह स्थिति पैदा होती है। इसमें कमर में दर्द से ज़्यादा भारीपन और जकड़न Stiffness महसूस होती है, विशेषकर सुबह उठने पर। मरीज़ को हिलने-डुलने में बहुत भारीपन लगता है।

क्या आपके शरीर में भी Lumbar Spondylosis के ये शुरुआती लक्षण दिख रहे हैं?

लम्बर स्पॉन्डिलोसिस रातों-रात नहीं होता। यह शरीर में बहुत पहले से अलार्म बजाता है, जिसे हम अक्सर काम की थकावट मानकर टाल देते हैं। अगर आपको रोज़ाना ये संकेत दिख रहे हैं, तो तुरंत सतर्क हो जाएँ:

  • सुबह की भयानक जकड़न Morning Stiffness: सुबह बिस्तर से उठते समय कमर का पूरी तरह अकड़ जाना और 15-20 मिनट चलने-फिरने के बाद ही थोड़ा आराम मिलना।
  • पैरों में झुनझुनी और भारीपन: कमर से लेकर जांघों और पिंडलियों तक सुन्नपन महसूस होना, या ऐसा लगना जैसे पैरों में जान ही नहीं है।
  • ज़्यादा देर खड़े या बैठे रहने में असमर्थता: लगातार 15 मिनट से ज़्यादा एक ही पोज़िशन में खड़े रहने या कुर्सी पर बैठने में कमर में मीठा-मीठा या तेज़ दर्द उठना।
  • झुकने पर करंट जैसा दर्द: आगे की तरफ झुककर मोज़े पहनने या ज़मीन से कोई चीज़ उठाने पर कमर में एकदम से टीस या बिजली जैसा तेज़ दर्द दौड़ना।

इस दर्द को नज़रअंदाज़ करने में लोग क्या गलतियाँ करते हैं और उनकी जटिलताएँ?

कमर के दर्द से तुरंत राहत पाने और अपना काम चालू रखने की जल्दबाज़ी में, मरीज़ अक्सर ऐसे शॉर्टकट्स अपना लेते हैं जो उनकी रीढ़ की हड्डी को स्थायी रूप से डैमेज कर देते हैं:

  • पेनकिलर्स का रोज़ाना सेवन: दर्द को दबाने के लिए रोज़ाना दर्द निवारक गोलियाँ खाना आपकी किडनी और पेट की परत को डैमेज कर देता है, लेकिन जहाँ डिस्क घिस रही है, वहां यह कोई रिपेयरिंग नहीं करता।
  • कटी बेल्ट Lumbar Belt का गलत और लगातार इस्तेमाल: दर्द से बचने के लिए 24 घंटे लम्बर सपोर्ट बेल्ट बांधे रखना आपकी कमर की मांसपेशियों Core muscles को कमज़ोर और अपाहिज बना देता है।
  • गलत एक्सरसाइज़ करना: बिना डॉक्टर की सलाह के इंटरनेट देखकर भारी वज़न उठाना या आगे झुकने वाले योगासन करना, जो स्लिप्ड डिस्क Slipped Disc का खतरा बढ़ा देते हैं।
  • भविष्य की गंभीर जटिलताएँ: अगर इसे नज़रअंदाज़ किया गया, तो दबी हुई नसें पैरों का स्थायी लकवा Paralysis, चलने-फिरने में पूरी तरह अक्षमता और कॉडा इक्विना सिंड्रोम Cauda Equina Syndrome - मल-मूत्र पर नियंत्रण खोना जैसी भयंकर जटिलताएँ पैदा कर सकती हैं।

आयुर्वेद Lumbar Spondylosis और डिस्क के घिसने को कैसे समझता है?

आधुनिक विज्ञान जिसे लम्बर स्पॉन्डिलोसिस कहता है, आयुर्वेद उसे कटी ग्रह, गृध्रसी Sciatica और अस्थि-मज्जा धातु के क्षय के विज्ञान से बहुत गहराई से समझता है।

  • वात का प्रकोप और श्लेषक कफ का सूखना: रीढ़ की हड्डी के जोड़ों के बीच एक प्राकृतिक चिकनाई श्लेषक कफ होती है। गलत पोश्चर, रूखा भोजन और तनाव से शरीर में वात हवा/रूखापन बढ़ जाता है, जो इस चिकनाई को सुखा देता है।
  • अस्थि और मज्जा धातु क्षय Bone and Nerve Degeneration: जठराग्नि पाचन के कमज़ोर होने से शरीर को सही पोषण नहीं मिलता। जब पोषण हड्डियों अस्थि और नसों मज्जा तक नहीं पहुँचता, तो हड्डियाँ भुरभुरी होने लगती हैं और नसें कमज़ोर पड़ जाती हैं।
  • स्रोतस Channels में रुकावट: खराब पाचन से शरीर में बनने वाला टॉक्सिन आम रक्त के साथ मिलकर रीढ़ की हड्डी के हिस्सों में जमा हो जाता है और वात के रास्तों को ब्लॉक कर देता है, जिससे भयंकर दर्द होता है।

नसों की खुश्की मिटाने और वात शांत करने वाली आयुर्वेदिक डाइट

लम्बर स्पॉन्डिलोसिस में आपका भोजन ही आपकी रीढ़ की हड्डी को सुखा भी सकता है और उसे दोबारा हरा-भरा भी कर सकता है। दर्द से बचने और नसों को शांत करने के लिए इस आयुर्वेदिक डाइट को अपनी रूटीन में शामिल करें।

आहार की श्रेणी क्या खाएं फायदेमंद - हड्डियों को चिकनाई देने वाले और वात शामक क्या न खाएं ट्रिगर फूड्स - रूखापन और गैस बढ़ाने वाले
अनाज Grains पुराना चावल, दलिया, ओट्स, मूंग दाल की खिचड़ी, रागी कैल्शियम से भरपूर। वाइट ब्रेड, मैदा, पैकेटबंद नूडल्स, पिज़्ज़ा, रूखे बिस्कुट।
वसा Fats देसी गाय का शुद्ध घी हड्डियों और नसों के लिए अमृत, तिल का तेल, ऑलिव ऑयल। किसी भी प्रकार का रिफाइंड तेल, बहुत अधिक मक्खन, डालडा।
सब्ज़ियाँ Vegetables लौकी, तरोई, कद्दू, पालक, शकरकंद सभी अच्छी तरह पकी और घी में छौंकी हुई। कच्चा सलाद, अत्यधिक गोभी, शिमला मिर्च, राजमा, छोले गैस बनाते हैं।
फल और मेवे Fruits & Nuts रात भर भीगे हुए बादाम, अखरोट, चिया सीड्स, पपीता, सेब। डिब्बाबंद और बिना मौसम के फल, बाज़ार के रोस्टेड नमकीन नट्स।
पेय पदार्थ Beverages हल्दी, अश्वगंधा और शिलाजीत वाला दूध रात में, ताज़ा मट्ठा, अजवाइन का पानी। बहुत ज़्यादा कैफीन कॉफी नसों को सुखाती है, कोल्ड ड्रिंक्स।

कमर और रीढ़ की हड्डी को फौलादी ताक़त देने वाली चमत्कारी जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में प्रकृति ने हमें ऐसे दिव्य रसायन दिए हैं, जो बिना किसी साइड-इफेक्ट के कमर दर्द को खींच लेते हैं और डैमेज हो चुकी डिस्क व नसों को रिपेयर करने में मदद करते हैं:

  • निर्गुंडॶ Nirgundi: यह आयुर्वेद में दर्द और सूजन को दूर करने की सबसे शक्तिशाली जड़ी-बूटी है। यह स्पॉन्डिलोसिस के कारण होने वाली जकड़न को जादुई रूप से खत्म करती है।
  • शल्लकी Shallaki: रीढ़ की हड्डी की सूजन Inflammation को प्राकृतिक रूप से घटाने और डिस्क के आसपास ब्लड सर्कुलेशन बढ़ाने में शल्लकी अचूक मानी जाती है।
  • अश्वगंधा Ashwagandha: नर्वस सिस्टम की कमज़ोरी दूर करने और मज्जा धातु को ताकत देने के लिए यह एक अद्भुत रसायन है। यह दबी हुई नसों में भारी ताकत और ऊर्जा भर देता है।
  • रास्ना Rasna: यह जड़ी-बूटी वात दोष का शमन करने और रीढ़ की हड्डी के जोड़ों के दर्द को जड़ से मिटाने के लिए आयुर्वेद में बहुत प्रसिद्ध है।
  • योगराज गुग्गुलु Yograj Guggulu: जोड़ों के बीच से आम Toxins निकालने और वात को शरीर से बाहर धकेलने में इसका उपयोग स्पॉन्डिलोसिस के मरीज़ों के लिए वरदान है।

नसों को खोलने और कमर का दर्द मिटाने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक थेरेपीज़

जब वात और जकड़न बहुत गहराई तक लम्बर स्पाइन में जम चुकी हो, तो केवल मौखिक दवाइयाँ काफी नहीं होतीं। पंचकर्म की ये बाहरी थेरेपीज़ शरीर को तुरंत रीबूट कर देती हैं:

  • कटी बस्ती Kati Basti: कमर के निचले हिस्से पर उड़द की दाल का रिंग बनाकर उसमें गर्म औषधीय तेल जैसे सहचरादि या महानारायण तेल रोककर रखा जाता है। यह सूखी हुई डिस्क को भारी चिकनाई देता है और नसों का दर्द तुरंत रोकता है।
  • पत्र पोटली स्वेद Patra Potali Sweda: ताज़ा औषधीय पत्तों जैसे निर्गुंडॶ, अर्क को तेल में भूनकर एक पोटली बनाई जाती है और इससे कमर की सिकाई की जाती है। यह सूजन और जकड़न को छूमंतर कर देता है।
  • बस्ती कर्म Basti Karma: आयुर्वेद में इसे अर्ध-चिकित्सा कहा गया है। मलद्वार के ज़रिए औषधीय तेलों और काढ़े का एनिमा दिया जाता है, जो वात दोष के मुख्य स्थान पक्वाशय से वात को जड़ से उखाड़ फेंकता है।
  • अभ्यंग और स्वेदन Abhyanga & Swedana: गुनगुने वात-शामक तेलों से संपूर्ण शरीर की मालिश और उसके बाद हर्बल भाप Steam पसीने के ज़रिए टॉक्सिन्स को बाहर निकालती है और कमर की मांसपेशियों को लचीला बनाती है।

रीढ़ की हड्डी के रिपेयर होने और दर्द खत्म होने में कितना समय लगता है?

बरसों के गलत पोश्चर के कारण खराब हुई रीढ़ की हड्डी को दोबारा प्राकृतिक अवस्था में लाने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है:

  • शुरुआती 1-2 महीने: औषधियों और पेट साफ होने से जकड़न व दर्द में भारी कमी आएगी। सुबह उठने पर होने वाली स्टिफनेस कम होगी।
  • 3-4 महीने: पंचकर्म और रसायनों के प्रभाव से नसों का रूखापन खत्म होने लगेगा। पैरों की झुनझुनी Tingling और सुन्नपन लगभग खत्म हो जाएगा।
  • 5-6 महीने: अस्थि और मज्जा धातु पूरी तरह पोषित हो जाएगी और कमर की मांसपेशियां फौलादी बन जाएंगी। आप बिना किसी पेनकिलर के एक सामान्य, ऊर्जावान और दर्द-मुक्त जीवन जी सकेंगे।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

लम्बर स्पॉन्डिलोसिस के इलाज को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है।

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा Symptomatic care आयुर्वेद Holistic care
इलाज का मुख्य लक्ष्य दर्द के सिग्नल्स को ब्लॉक करने के लिए पेनकिलर्स, स्टेरॉयड इंजेक्शन Epidural और अंततः सर्जरी। वात को शांत करना, पाचन सुधारना और मज्जा व अस्थि धातु को प्राकृतिक रूप से पोषण देना।
बीमारी को देखने का नज़रिया इसे उम्र के साथ होने वाली 'घिसावट' Wear & Tear मानकर केवल मैनेजमेंट पर ज़ोर देना। इसे शरीर में वात और रूखेपन के असंतुलन के रूप में देखना, जिसे रिवर्स Reverse किया जा सकता है।
डाइट और लाइफस्टाइल कैल्शियम सप्लीमेंट्स और फिजियोथेरेपी की सलाह, लेकिन वात-शामक आहार या जठराग्नि पर कोई ज़ोर नहीं। वात-शामक डाइट, सही पोश्चर, कब्ज़ दूर करना और औषधीय तेलों की बस्ती को ही इलाज का आधार माना जाता है।
लंबा असर दवाइयाँ छोड़ने पर दर्द वापस आ जाता है Lifelong Management और सर्जरी का रिस्क बना रहता है। शरीर अंदर से मज़बूत होता है, जिससे इंसान स्थायी रूप से दर्द-मुक्त रहता है Permanent Cure की ओर बढ़ता है।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

हालांकि आयुर्वेद लम्बर स्पॉन्डिलोसिस के दर्द और डैमेज को पूरी तरह हील कर सकता है, लेकिन अगर आपको अपने शरीर में ये कुछ गंभीर लक्षण दिखें, तो यह एक मेडिकल इमरजेंसी Cauda Equina Syndrome हो सकती है:

  • मल-मूत्र पर नियंत्रण खोना Bowel/Bladder Incontinence: अगर आपको यूरिन पास करने में दिक्कत हो रही है या उस पर आपका बिल्कुल भी कंट्रोल नहीं रहा है।
  • सैंडल एरिया Saddle Area में सुन्नपन: कूल्हों और जांघों के बीच के हिस्से जहाँ हम बैठते हैं में पूरी तरह से महसूस होना बंद हो जाना।
  • पैरों का लकवाग्रस्त होना Foot Drop: अगर पैर का पंजा उठाने में पूरी तरह असमर्थता हो और चलते समय पैर ज़मीन पर घिसटने लगे।
  • असहनीय दर्द: ऐसा दर्द जो लेटने पर भी किसी भी करवट में शांत न हो और आपको सोने न दे।

निष्कर्ष

लम्बर स्पॉन्डिलोसिस का नाम सुनते ही यह मान लेना कि अब आपको ज़िंदगी भर दर्द निवारक गोलियों के सहारे या सर्जरी के डर में जीना होगा, एक बहुत बड़ी भूल है। भले ही हम बढ़ती उम्र को रोक नहीं सकते, लेकिन हम आयुर्वेद की मदद से उस वात और रूखेपन को ज़रूर रोक सकते हैं जिसने हमारी रीढ़ की हड्डी को समय से पहले कमज़ोर कर दिया है। यह बीमारी Lifelong Management का श्राप नहीं है, बल्कि आपके शरीर की एक पुकार है अपनी जीवनशैली और आहार में बदलाव लाने की। जब आप शुद्ध आयुर्वेदिक औषधियों, कटी बस्ती और सही लाइफस्टाइल के माध्यम से अपनी रीढ़ की हड्डी को दोबारा पोषण देते हैं, तो आप न केवल दर्द से आज़ाद होते हैं, बल्कि एक स्थायी Permanent समाधान की ओर बढ़ते हैं। पेनकिलर्स के दुष्चक्र से बाहर निकलें और अपनी रीढ़ को फौलादी बनाने के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद से जुड़कर अपने स्वस्थ जीवन की शुरुआत करें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Դ doctor.

FAQs

स्ट्रक्चरल डैमेज (जैसे बढ़ी हुई हड्डी) को पूरी तरह गायब नहीं किया जा सकता, लेकिन आयुर्वेद नसों की सूजन को खत्म करके, मांसपेशियों को ताकत देकर और वात को शांत करके आपको 100% दर्द-मुक्त और सामान्य जीवन दे सकता है, जिसे व्यवहारिक रूप से एक Permanent Cure ही माना जाता है क्योंकि आप बिना दवाओं के ज़िंदगी जीते हैं।

लम्बर स्पॉन्डिलोसिस रीढ़ की हड्डी की हड्डियों और डिस्क के घिसने की बीमारी है। जब इसी घिसावट के कारण कमर की नस (Sciatic Nerve) दब जाती है और दर्द पैरों तक जाने लगता है, तो उस लक्षण को सायटिका कहते हैं।

हाँ। जब डिस्क कमज़ोर होती है, तो आगे की तरफ झुकने (जैसे ज़मीन से सामान उठाना) से डिस्क पर पीछे की तरफ भारी दबाव पड़ता है, जिससे वह फट सकती है या नस को और ज़्यादा दबा सकती है। हमेशा घुटनों के बल बैठकर चीज़ें उठानी चाहिए।

मरीज़ को बहुत ज़्यादा नर्म (फोम वाला) या बिल्कुल कड़क (ज़मीन जैसा) गद्दा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। मीडियम-फर्म (Medium-firm) गद्दा सबसे अच्छा होता है जो कमर को सीधा सहारा दे।

आयुर्वेद के अनुसार, बिल्कुल! मलाशय वात का मुख्य स्थान है। जब कब्ज़ होता है, तो अपान वात उल्टी दिशा में बहने लगता है और रीढ़ की हड्डी में दबाव व रूखापन बढ़ाकर कमर दर्द को भयंकर रूप से ट्रिगर कर देता है।

नहीं। 95% से ज़्यादा मामलों में बिना सर्जरी के केवल आयुर्वेद, पंचकर्म और सही व्यायाम से ही पूरी तरह रिकवरी हो जाती है। सर्जरी की ज़रूरत केवल इमरजेंसी स्थितियों (जैसे कॉडा इक्विना सिंड्रोम) में ही पड़ती है।

लम्बर बेल्ट केवल कुछ समय के लिए सपोर्ट देती है, यह कोई इलाज नहीं है। इसे लगातार पहनने से कमर की मांसपेशियां काम करना बंद कर देती हैं और कमज़ोर हो जाती हैं, जिससे बीमारी आगे चलकर और बिगड़ जाती है।

केवल कैल्शियम खाने से अस्थि धातु मज़बूत नहीं होती। अगर आपकी जठराग्नि (पाचन) कमज़ोर है, तो शरीर उस कैल्शियम को सोख ही नहीं पाएगा। आयुर्वेद पहले पाचन सुधारता है ताकि प्राकृतिक आहार से कैल्शियम मिल सके

हल्के हाथों से औषधीय तेलों (वात-शामक तेल) का लेप या अभ्यंग बहुत फायदेमंद होता है। लेकिन किसी अनट्रेंड व्यक्ति से ज़ोर लगाकर मालिश या रीढ़ की हड्डी को चटकवाने (Bone cracking) से नसें हमेशा के लिए डैमेज हो सकती हैं।

एक सेशन में लगभग 40-45 मिनट लगते हैं। बीमारी की गंभीरता के आधार पर डॉक्टर आमतौर पर 7 से 14 दिनों के लगातार सेशन की सलाह देते हैं, जिससे नसों की खुश्की गहराई से दूर हो जाती है

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