Դ में अक्सर ऐसे मरीज़ मिलते हैं जो लंबे समय से IBS (Irritable Bowel Syndrome) की समस्या से जूझ रहे होते हैं। कई लोग बताते हैं कि वे नियमित रूप से दवाएँ ले रहे हैं, फिर भी कभॶ दस्त (डायरिया) तो कभॶ कब्ज़ की समस्या बनी रहती है।
ऐसी स्थिति में मरीज़ों के मन में यह सवाल उठता है
जब दवा चल रही है, तो लक्षण बार-बार क्यों बदलते रहते हैं?
कुछ मरीज़ों को 2–3 दिन तक सब ठीक लगता है, लेकिन अचानक पेट में गड़बड़ी शुरू हो जाती है। कभॶ बार-बार मल त्याग की इच्छा होती है, तो कभॶ कई दिनों तक पेट ठीक से साफ नहीं होता। इसके साथ पेट दर्द, गैस, पेट फूलना और असहजता भी महसूस हो सकती है।
यह समझना ज़रूरी है कि IBS केवल एक पाचन समस्या नहीं है, बल्कि यह आंतों की कार्यप्रणाली, पाचन शक्ति, आहार, जीवनशैली और मानसिक स्थिति से जुड़ी एक जटिल स्थिति हो सकती है।
Դ में मरीज़ की प्रकृति, पाचन की स्थिति, आहार और जीवनशैली को समझकर व्यक्तिगत आयुर्वेदिक मार्गदर्शन दिया जाता है, ताकि समस्या के मूल कारणों को संतुलित करने की दिशा में काम किया जा सके।
IBS क्या है?
IBS (Irritable Bowel Syndrome) एक ऐसी स्थिति है जिसमें बड़ी आंत (Large Intestine) की कार्यप्रणाली प्रभावित हो जाती है, लेकिन अक्सर जाँचों में कोई स्पष्ट संरचनात्मक समस्या दिखाई नहीं देती।
इसके सामान्य संकेत हो सकते हैं:
- कभॶ दस्त और कभॶ कब्ज़
- पेट दर्द या मरोड़
- गैस और पेट फूलना
- मल त्याग के बाद भी पेट साफ न होने का एहसास
- तनाव के साथ लक्षणों का बढ़ना
IBS के प्रकार
हर मरीज़ में IBS एक जैसा नहीं होता। इसके कुछ प्रमुख प्रकार इस प्रकार हैं:
1. IBS-D (दस्त प्रमुख प्रकार)
इसमें मरीज़ को बार-बार दस्त की समस्या होती है।
2. IBS-C (कब्ज प्रमुख प्रकार)
इसमें कब्ज़ मुख्य समस्या होती है और मल त्याग कठिन हो सकता है।
3. IBS-M (मिश्रित प्रकार)
इस प्रकार में कभॶ दस्त तो कभॶ कब्ज़ की स्थिति बनी रहती है, जो सबसे अधिक भ्रम पैदा कर सकती है।
IBS के सामान्य लक्षण
- पेट में दर्द या मरोड़
- गैस और पेट फूलना
- मल त्याग की आदतों में बदलाव
- कभॶ दस्त, कभॶ कब्ज़
- अधूरा पेट साफ होने का एहसास
- थकान या असहजता
IBS के सामान्य कारण
- अनियमित आहार और भोजन का समय
- अधिक तला-भुना या प्रोसेस्ड भोजन
- तनाव और चिंता
- पाचन तंत्र की संवेदनशीलता
- आंतों की गति में असंतुलन
- नींद की कमी
लंबे समय तक IBS रहने के संभावित प्रभाव
- पाचन तंत्र की कमज़ोरी
- बार-बार असहजता
- भोजन से डर या परहेज़
- दवाओं पर निर्भरता
&Բ;की&Բ;जाँच कैसे की जाती है?
- लक्षणों का मूल्यांकन
- ब्लड टेस्ट
- स्टूल टेस्ट
- कोलोनोस्कोपी (यदि आवश्यक हो)
आयुर्वेद के अनुसार IBS क्यों होता है?
आयुर्वेद के अनुसार IBS केवल आंतों की समस्या नहीं है, बल्कि यह शरीर के दोष संतुलन और पाचन शक्ति से जुड़ा होता है।
का असंतुलन
वात दोष आंतों की गति को नियंत्रित करता है। इसके असंतुलन से कभॶ दस्त तो कभॶ कब्ज़ जैसी स्थिति हो सकती है।
पित्त दोष का प्रभाव
पित्त बढ़ने पर आंतों में जलन और दस्त की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
कमज़ोर अग्नि (पाचन शक्ति)
जब पाचन शक्तिकमज़ोर हो जाती है, तो भोजन सही तरीके से पच नहीं पाता, जिससे आंतों में असंतुलन पैदा हो सकता है।
Դ में उपचार का दृष्टिकोण
Դ में IBS (Irritable Bowel Syndrome) की स्थिति को केवल आंतों के लक्षणों तक सीमित नहीं देखा जाता, बल्कि पाचन तंत्र, आहार, जीवनशैली और मानसिक स्थिति से जुड़े असंतुलनों को समझकर उपचार की दिशा तय की जाती है। आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में उद्देश्य केवल दस्त या कब्ज़ को अस्थायी रूप से नियंत्रित करना नहीं बल्कि आंतों की कार्यप्रणाली को संतुलित करना होता है।
पाचन शक्ति (अग्नि) को संतुलित करना
आयुर्वेद के अनुसार पाचन शक्ति शरीर के समग्र स्वास्थ्य की नींव होती है। जब अग्नि असंतुलित होती है, तो भोजन का सही पाचन नहीं हो पाता, जिससे कभॶ दस्त तो कभॶ कब्ज़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसलिए उपचार के दौरान पाचन शक्ति को संतुलित और मजबूत बनाने पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
शरीर में जमा “आम” (टॉक्सिन्स) को कम करना
कमज़ोर पाचन के कारण शरीर में अपच से बनने वाले विषैले तत्व जमा हो सकते हैं, जिन्हें आयुर्वेद में “आम” कहा जाता है। ये तत्व आंतों की कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं। उपचार में आहार, आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों और जीवनशैली सुधार के माध्यम से इन तत्वों को कम करने की दिशा में काम किया जाता है।
दोष संतुलन पर ध्यान
IBS की स्थिति में वात दोष का असंतुलन प्रमुख भूमिका निभाता है, जबकि कई मामलों में पित्त भी प्रभावित हो सकता है। आयुर्वेदिक उपचार का उद्देश्य इन दोषों को संतुलित करना होता है, ताकि आंतों की प्राकृतिक गति और कार्यप्रणाली बेहतर हो सके।
आंतों की कार्यप्रणाली को समर्थन देना
आयुर्वेदिक उपचार में कुछ पारंपरिक जड़ी-बूटियाँ और प्राकृतिक उपाय आंतों की गति को संतुलित करने और मल त्याग को नियमित बनाने में सहायक माने जाते हैं। इनका उद्देश्य आंतों को प्राकृतिक रूप से कार्य करने में सहायता देना होता है।
जीवनशैली और तनाव प्रबंधन पर ध्यान
तनाव, अनियमित दिनचर्या और नींद की कमी IBS के लक्षणों को बढ़ा सकते हैं। इसलिए आयुर्वेदिक देखभाल में संतुलित आहार, नियमित दिनचर्या, योग, प्राणायाम और मानसिक संतुलन पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है।
IBS के लिए फायदेमंद आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ
- बेल – बेल आंतों को मजबूत बनाता है और दस्त व कब्ज दोनों स्थितियों में संतुलन बनाए रखने में मदद करता है।
- इसबगोल – यह प्राकृतिक फाइबर है, जो मल को सामान्य बनाता है और आंतों की सफाई में सहायक होता है।
- त्रिफला – तीन जड़ी-बूटियों का मिश्रण है, जो पाचन सुधारता है और आंतों की कार्यप्रणाली को संतुलित करता है।
- सौंफ – पेट की गैस, ऐंठन और जलन को कम करके आंतों को शांत रखने में मदद करती है।
- जीरा – पाचन को सक्रिय करता है और भोजन को सही तरीके से पचाने में सहायक होता है, जिससे IBS के लक्षण कम होते हैं।
आयुर्वेदिक थेरेपी
- पंचकर्म
- अभ्यंग
- स्वेदन
IBS मैं क्या खाएं और क्या न खाएं
क्या खाएं:
- हल्का और सुपाच्य भोजन – ऐसा खाना लें जो आसानी से पच जाए और आंतों पर ज्यादा दबाव न डाले।
- खिचड़ी, दाल – ये हल्के और पौष्टिक होते हैं, जो पाचन को संतुलित रखने में मदद करते हैं।
- गुनगुना पानी – यह पाचन को सक्रिय करता है और आंतों को शांत रखता है।
- फाइबर का संतुलित सेवन – सही मात्रा में फाइबर आंतों की गति को सामान्य बनाए रखता है (न ज्यादा, न कम)।
क्या न खाएं:
- बहुत तला-भुना और मसालेदार खाना – यह आंतों में जलन और असंतुलन बढ़ा सकता है।
- जंक फूड और प्रोसेस्ड फूड – ये पाचन को बिगाड़ते हैं और गैस व सूजन बढ़ाते हैं।
- बहुत ज्यादा चाय-कॉफी – कैफीन आंतों को उत्तेजित कर सकता है, जिससे दस्त या जलन बढ़ सकती है।
- ठंडी चीजें और कार्बोनेटेड ड्रिंक्स – ये पेट फूलना और गैस की समस्या को बढ़ाते हैं।
- अनियमित समय पर खाना – देर से या कभॶ भी खाना खाने से पाचन तंत्र असंतुलित हो जाता है।
Դ में मरीज़ों का मूल्यांकन कैसे किया जाता है?
Դ में IBS (Irritable Bowel Syndrome) की स्थिति को समझने के लिए उपचार शुरू करने से पहले मरीज़ का विस्तृत मूल्यांकन किया जाता है। इसका उद्देश्य आंतों की समस्या के पीछे मौजूद संभावित कारणों को पहचानना और उसी के अनुसार एक व्यक्तिगत आयुर्वेदिक उपचार योजना तैयार करना होता है। इसके लिए आमतौर पर निम्न पहलुओं का आकलन किया जाता है:
लक्षणों और मल त्याग की आदतों का मूल्यांकन
डॉक्टर यह समझने की कोशिश करते हैं कि मरीज़ को कब और किन परिस्थितियों में दस्त या कब्ज़ की समस्या होती है। साथ ही पेट दर्द, गैस, पेट फूलना और मल त्याग के बाद अधूरापन महसूस होने जैसे लक्षणों की भी जानकारी ली जाती है।
आहार और दिनचर्या का अध्ययन
दैनिक खानपान, भोजन का समय, तला-भुना या मसालेदार भोजन, पानी पीने की आदतें और शारीरिक गतिविधि का आकलन किया जाता है, क्योंकि ये सभी आंतों की कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं।
पाचन की स्थिति (अग्नि) का आकलन
आयुर्वेद के अनुसार पाचन शक्ति शरीर के संतुलन का आधार होती है। इसलिए यह समझा जाता है कि पाचन तंत्र किस प्रकार कार्य कर रहा है और क्या उसमें कोई असंतुलन मौजूद है, जो IBS के लक्षणों को बढ़ा सकता है।
तनाव, नींद और मानसिक स्थिति का मूल्यांकन
लंबे समय तक तनाव, चिंता और अनियमित नींद आंतों की कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए मरीज़ की मानसिक स्थिति, नींद की गुणवत्ता और दैनिक तनाव के स्तर को भी समझना उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।
इन सभी पहलुओं का मूल्यांकन करने के बाद आयुर्वेदिक डॉक्टर प्रत्येक मरीज़ के लिए एक व्यक्तिगत उपचार योजना तैयार करते हैं, जिसका उद्देश्य आंतों के संतुलन को बेहतर बनाना और समस्या के मूल कारणों को संबोधित करना होता है।
हमारी चरण-दर-चरण देखभाल प्रक्रिया
जीवा आयुर्वेद में, इलाज की हर प्रक्रिया को एक बहुत ही व्यवस्थित और सुचारू तरीके से किया जाता है ताकि आपको आयुर्वेदिक इलाज का पूरी तरह से व्यक्तिगत और प्रभावी अनुभव मिल सके।
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आयुर्वेदिक उपचार में सुधार का संभावित समय
IBS जैसी दीर्घकालिक आंतों की समस्या में सुधार व्यक्ति की पाचन शक्ति, जीवनशैली और समस्या की अवधि पर निर्भर करता है। आयुर्वेदिक देखभाल में सुधार आमतौर पर धीरे-धीरे दिखाई देता है, क्योंकि इसका उद्देश्य आंतों की कार्यप्रणाली को संतुलित करना होता है।
पहले 1–2 महीने
इस चरण में पाचन तंत्र को संतुलित करने पर ध्यान दिया जाता है। मरीज़ को पेट की असहजता, गैस और पाचन से जुड़ी समस्याओं में हल्का सुधार महसूस हो सकता है।
2–3 महीने
दस्त और कब्ज़ के पैटर्न में संतुलन के संकेत दिखाई देने लग सकते हैं। मल त्याग की आदतों में धीरे-धीरे सुधार महसूस हो सकता है।
3–6 महीने
इस अवधि में आंतों की कार्यप्रणाली बेहतर होने लगती है और समग्र संतुलन में सुधार महसूस हो सकता है।
उपचार से किस प्रकार के परिणाम की उम्मीद की जा सकती है?
IBS में आयुर्वेदिक देखभाल का उद्देश्य केवल लक्षणों को नियंत्रित करना नहीं बल्कि आंतों के संतुलन को बेहतर बनाना होता है। नियमित रूप से उपचार का पालन करने पर कुछ मरीज़ निम्न प्रकार के बदलाव महसूस कर सकते हैं:
- मल त्याग की आदतों में संतुलन — दस्त और कब्ज़ के बीच होने वाले बदलाव में कमी आ सकती है।
- पेट दर्द और गैस में कमी — आंतों की असहजता धीरे-धीरे कम हो सकती है।
- पाचन और दैनिक आराम में सुधार — दिनभर हल्कापन और बेहतर पाचन का अनुभव हो सकता है।
मरीज़ों के अनुभव
मैं दक्ष मलिक हूं और मुझे पिछले कुछ सालों से IBS (Irritable Bowel Syndrome) की गंभीर समस्या थी, जिससे मेरा पेट हमेशा खराब रहता था। मैंने एंडोस्कोपी और कोलोनोस्कोपी जैसे कई टेस्ट कराए, पर एलोपैथी दवाइयों से कोई खास आराम नहीं मिला।
फिर मैंने जीवा आयुर्वेद के बारे में जाना और वहां से पंचकर्मा ट्रीटमेंट लिया। शिरोधारा और एनिमा जैसी थेरेपी और सही डाइट प्लान की वजह से आज मैं 70% तक ठीक महसूस कर रहा हूं। आयुर्वेद और जीवा के डॉक्टर्स की वजह से ही मैं अब अपनी जिंदगी खुशी से बिता पा रहा हूं।
लोग Դ पर क्यों भरोसा करते हैं?
Դ वर्षों से ऐसे हज़ारों मरीज़ों की सहायता कर रहा है जो पाचन और आंतों से जुड़ी समस्याओं के लिए प्राकृतिक और व्यक्तिगत आयुर्वेदिक समाधान तलाशते हैं। यहाँ उपचार का उद्देश्य केवल लक्षणों को कम करना नहीं बल्कि शरीर के अंदर मौजूद असंतुलन को समझकर समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाना होता है।
कुछ प्रमुख कारण जिनकी वजह से लोग Դ पर भरोसा करते हैं:
मूल कारण पर आधारित उपचार
आयुर्वेद में केवल दस्त या कब्ज़ को नियंत्रित करने पर ही ध्यान नहीं दिया जाता, बल्कि उस मूल कारण को समझने की कोशिश की जाती है जिसके कारण यह समस्या बार-बार होती है।
अनुभवी आयुर्वेदिक चिकित्सकों की टीम
यहाँ अनुभवी डॉक्टर मरीज़ की स्थिति, पाचन, जीवनशैली और मानसिक स्थिति का विस्तृत मूल्यांकन करने के बाद ही उपचार की सलाह देते हैं।
व्यक्तिगत उपचार दृष्टिकोण
हर व्यक्ति की प्रकृति और स्वास्थ्य स्थिति अलग होती है, इसलिए उपचार योजना भी व्यक्तिगत रूप से तैयार की जाती है।
समग्र स्वास्थ्य दृष्टिकोण
आयुर्वेदिक देखभाल में आहार, जीवनशैली, योग, प्राणायाम और तनाव प्रबंधन को शामिल किया जाता है, ताकि शरीर और मन दोनों का संतुलन बेहतर हो सके।
देशभर में मरीज़ों का भरोसा
कई वर्षों से देशभर के लोग Դ की सेवाओं और उपचार योजनाओं पर भरोसा करते आ रहे हैं और समय के साथ अपने स्वास्थ्य में सकारात्मक बदलाव अनुभव कर चुके हैं।
पूरे भारत में मरीजों का भरोसा
कई वर्षों से देशभर के लोग Դ की उपचार योजनाओं और मार्गदर्शन पर भरोसा करते आ रहे हैं। नियमित रूप से दवाओं और सुझाए गए जीवनशैली बदलावों का पालन करने वाले कई मरीजों ने अपने स्वास्थ्य में सकारात्मक परिवर्तन अनुभव किए हैं।
- लगभग 95% मरीजों ने 3 महीनों के भीतर अपने स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण सुधार महसूस किया
- करॶब 88% मरीजों ने समय के साथ अन्य दवाओं की आवश्यकता कम होते हुए देखी
- प्रतिदिन हजारों लोग परामर्श के लिए Դ से जुड़ते हैं
जड़ से इलाज की योजना: बीमारी की पहचान के अनुसार, इलाज की एक योजना तैयार की जाती है, और प्राकृतिक जड़ी-बूटियों वाली दवाओं का उपयोग करके आपके लिए पूरी तरह से एक विशेष इलाज दिया जाता है।
सुधार पर नज़र रखना: नियमित रूप से संपर्क में रहने से आपके स्वास्थ्य में हो रहे सुधार को देखने में मदद मिलती है और ज़रूरत पड़ने पर इलाज में बदलाव भी किया जा सकता है।
उपचार का अनुमानित ख़र्च
जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं की लागत में पूरी पारदर्शिता सुनिश्चित करते हैं।
उपचार का ख़र्च: जो मरीज़ नियमित और मानक देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक ख़र्च आम तौर पर 3000 रुपये से 3500 रुपये के बीच होता है।
प्रोटोकॉल: अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रदान करते हैं। इसमें दवा, परामर्श, मानसिक स्वास्थ्य सत्र, योग और आहार शामिल हैं। 3 से 4 महीने की पूरी उपचार अवधि के लिए इसका एकमुश्त ख़र्च 15000 रुपये से 40000 रुपये तक होता है।
जीवाग्राम: गहन देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, जीवाग्राम में 7 दिनों के एक गहन स्वास्थ्य प्रवास का ख़र्च लगभग 1 लाख रुपये है, जिसमें प्रामाणिक पंचकर्म चिकित्सा और सात्विक भोजन शामिल है।
आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर
उपचार का दृष्टिकोण
- आधुनिक उपचार (Allopathy): बीमारी के लक्षणों को जल्दी नियंत्रित करने पर फोकस करता है।
- आयुर्वेदिक उपचार: शरीर के मूल कारण (जड़) को समझकर संतुलन बनाने पर काम करता है।
उपचार की गति
- आधुनिक: तेजी से असर दिखाता है, तुरंत राहत मिल सकती है।
- आयुर्वेद: धीरे-धीरे लेकिन स्थायी सुधार लाने पर ध्यान देता है।
दवाइयों का स्वरूप
- आधुनिक: केमिकल-बेस्ड दवाइयाँ होती हैं।
- आयुर्वेद: प्राकृतिक जड़ी-बूटियों और तत्वों से बनी दवाइयाँ होती हैं।
साइड इफेक्ट्स
- आधुनिक: लंबे समय तक लेने पर साइड इफेक्ट्स की संभावना हो सकती है।
- आयुर्वेद: सही तरीके से लेने पर सामान्यतः कम साइड इफेक्ट्स होते हैं।
जीवनशैली पर फोकस
- आधुनिक: दवाइयों पर ज्यादा निर्भरता रहती है, जीवनशैली पर कमज़ोर होता है।
- आयुर्वेद: आहार (डाइट), दिनचर्या और जीवनशैली में बदलाव पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
व्यक्तिगत उपचार
- आधुनिक: सभी मरीजों के लिए एक जैसा ट्रीटमेंट हो सकता है।
- आयुर्वेद: हर व्यक्ति की प्रकृति (वात, पित्त, कफ) के अनुसार अलग-अलग उपचार दिया जाता है।
किन स्थितियों में डॉक्टर से मिलना ज़रूरी है?
- लगातार पेट दर्द या ऐंठन बढ़ती जाए
अगर दर्द बार-बार हो रहा है या पहले से ज्यादा तीव्र हो गया है, तो यह केवल सामान्य IBS नहीं भी हो सकता है। - वज़न बिना कारण कम होने लगे
अचानक वज़न घटना शरीर में किसी गहरे असंतुलन या पोषण की कमी का संकेत हो सकती है। - मल में खून या काला रंग दिखे
यह स्थिति गंभीर हो सकती है और तुरंत जांच की जरूरत होती है। - बार-बार दस्त या लंबे समय तककब्ज़बना रहे
अगर यह समस्या लगातार बनी रहती है और सामान्य उपायों से ठीक नहीं हो रही, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। - रात में बार-बार पेट दर्द या शौच के लिए उठना पड़े
यह IBS के अलावा किसी अन्य समस्या की ओर इशारा कर सकता है। - दवाइयों या घरेलू उपायों से राहत न मिले
अगर बार-बार इलाज करने के बाद भी समस्या लौट आती है, तो गहराई से जांच जरूरी है।
इन स्थितियों में देरी करना सही नहीं है। सही समय पर जांच और उपचार से IBS के साथ-साथ अन्य संभावित समस्याओं को भी नियंत्रित किया जा सकता है।
निष्कर्ष
यदि IBS में कभॶ दस्त तो कभॶ कब्ज़ की समस्या बनी रहती है, तो यह शरीर के अंदर मौजूद असंतुलन का संकेत हो सकता है। आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में पाचन तंत्र और आंतों के संतुलन को सुधारकर इस स्थिति में धीरे-धीरे सुधार की दिशा में काम किया जा सकता है।

