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IBS में हर बार खाने के बाद Problem? Matra Basti से Gut कैसे Heal होता है

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by

क्या आपके साथ भी ऐसा होता है कि जैसे ही आप खाना खाते हैं,आपको तुरंत टॉयलेट भागना पड़ता है? क्या आप दोस्तों के साथ बाहर खाना खाने से इसलिए डरते हैं क्योंकि आपको नहीं पता होता कि आपका पेट आपको कब धोखा दे दे? यदि हर भोजन के बाद पेट में ऐंठन, गैस और तुरंत शौच जाने की इच्छा होती है, तो आप अकेले नहीं हैं।

यह इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम IBS का एक सामान्य लक्षण हो सकता है,जो व्यक्ति के दैनिक जीवन को काफी प्रभावित करता है। IBS के मरीजों के लिए खाना खाना एक सामान्य आवश्यकता से अधिक चिंता का कारण बन जाता है। वे हमेशा इस दुविधा में रहते हैं कि क्या खाएं और क्या न खाएं, ताकि उनकी परेशानी न बढ़े।

आधुनिक चिकित्सा में इसके लिए अक्सर आंतों और नसों को शांत करने वाली दवाइयाँ या फाइबर सप्लीमेंट्स दिए जाते हैं। ये कुछ समय के लिए राहत तो प्रदान कर सकते हैं, लेकिन समस्या के मूल कारण को समाप्त नहीं कर पाते। वहीं, आयुर्वेद में इस समस्या का गहराई से विश्लेषण किया गया है और इसके मूल कारणों को समझकर उपचार पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

खाने के तुरंत बाद पेट में खलबली क्यों मचती है?

  • जब भी हम कुछ खाते हैं, तो हमारे शरीर में एक प्राकृतिक रिफ्लेक्स काम करता है जिसे विज्ञान की भाषा में 'गैस्ट्रोकोलिक रिफ्लेक्स' Gastrocolic Reflex कहा जाता है।
  • आसान भाषा में समझें तो: जब भोजन आपके पेट (Stomach) में पहुंचता है, तो पेट आपकी बड़ी आंत Colon को एक सिग्नल भेजता है कि "नया खाना आ रहा है, पुरानी चीजों को बाहर निकालकर जगह बनाओ। एक स्वस्थ इंसान में यह प्रक्रिया बहुत शांत तरीके से होती है और उसे शायद दिन में एक या दो बार ही मोशन फील होता है।

IBS के मरीजों में क्या होता है? 

IBS के मरीजों की आंतें 'हाइपरसेंसिटिव' अति संवेदनशील हो जाती हैं। उनका गट-ब्रेन एक्सिस (Gut-Brain Axis) यानी आंतों और दिमाग के बीच का कनेक्शन बिगड़ जाता है। जैसे ही पेट में अन्न का एक निवाला जाता है, आंतों की नसें पैनिक कर जाती हैं। गैस्ट्रोकोलिक रिफ्लेक्स जरूरत से ज्यादा तेज काम करने लगता है, जिससे आंतों में भयंकर ऐंठन  होती है और मरीज को तुरंत टॉयलेट भागना पड़ता है। आंतें भोजन से पानी और पोषण सोखे बिना ही उसे बाहर धकेल देती हैं। 

आयुर्वेद का नजरिया: IBS और 'ग्रहणी' रोग

आयुर्वेद में IBS को 'ग्रहणी' (Grahani) और आंतों की अति-सक्रियता को वात दोष के असंतुलन से जोड़कर देखा जाता है।

आयुर्वेद के अनुसार, हमारे पाचन तंत्र का मुख्य केंद्र 'अग्नि' (Digestive Fire) है। जब गलत खान-पान, तनाव ,और खराब जीवनशैली के कारण यह अग्नि मंद (कमजोर) हो जाती है, तो खाना ठीक से पच नहीं पाता और 'आम' बनने लगता है।

इसके साथ ही, बड़ी आंत (Pakvashaya) मुख्य रूप से 'वात दोष' का घर है। जब आंतों में वात कुपित (असंतुलित) हो जाता है, तो वह रुखापन (Dryness),अनियमित गति और नसों में कमजोरी पैदा करता है। कुपित वात के कारण ही आंतें कभी बहुत तेज काम करती हैं जिससे दस्त या IBS-D होता है और कभी बिल्कुल काम नहीं करतीं (जिससे कब्ज या IBS-C होता है)।

IBS को ठीक करने के लिए सिर्फ पेट का इलाज काफी नहीं है; हमें आंतों की नसों को शांत करना होगा, वात को संतुलित करना होगा और आंतों की अंदरूनी परत को पोषण देना होगा। यहीं पर 'मात्रा बस्ती' का रोल शुरू होता है।

मात्रा बस्ती क्या है? (What is Matra Basti?)

आयुर्वेद के पंचकर्म Panchakarma चिकित्सा में 5 मुख्य कर्म होते हैं, जिनमें से एक है 'बस्ती' (Basti/Enema)। बस्ती का मतलब है गुदा Anus के मार्ग से औषधीय काढ़ा या तेल शरीर के अंदर पहुंचाना।

बस्ती कई प्रकार की होती है, लेकिन 'मात्रा बस्ती' सबसे सौम्य Gentle और सुरक्षित बस्ती है।

  • 'मात्रा' का अर्थ है छोटी या मापी हुई खुराक।
  • इसमें किसी कठोर काढ़े का इस्तेमाल नहीं होता, बल्कि औषधीय सिद्ध तेल या घी (जैसे धनवंतरम तेल, क्षीरबला तेल, या नारायण तेल) की बहुत छोटी मात्रा (लगभग 30 से 60 ML) मलाशय (Rectum) के जरिए अंदर डाली जाती है।
  • इसे लेने के लिए खाली पेट होने की जरूरत नहीं होती और इसे रोजमर्रा के काम करते हुए भी लिया जा सकता है। यह शरीर में जाकर रुकती है और अंदरूनी अंगों को पोषण देती है

मात्रा बस्ती से गट (Gut) कैसे Heal होता है?

मात्रा बस्ती IBS के मरीजों के लिए एक गेम-चेंजर है। यह केवल लक्षणों को नहीं दबाती, बल्कि आंतों को जड़ से हील करने का काम करती है। आइए इसके वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक कारणों को समझते हैं:

वात दोष का सबसे अचूक इलाज

आयुर्वेद का एक स्पष्ट नियम है: वात को शांत करने की सबसे अच्छी दवा 'तेल' है। और चूंकि वात का मुख्य स्थान बड़ी आंत है, इसलिए आंतों में सीधे तेल पहुंचाना वात को तुरंत शांत करता है। जब औषधीय तेल आंतों में जाता है, तो यह वहां की रूखी और अति-संवेदनशील नसों को चिकनाई देता है। इससे आंतों की ऐंठन बंद हो जाती है और खाने के तुरंत बाद भागने की आदत कंट्रोल होने लगती है।

आंतों की म्यूकोसल लाइनिंग Gut Lining की मरम्मत

IBS और लीकी गट में आंतों की अंदरूनी परत Mucosal lining में सूजनआ जाती है। मात्रा बस्ती में इस्तेमाल होने वाले तेल जड़ी-बूटियों से पके होते हैं। जब यह तेल घंटों तक आंतों में रहता है, तो यह एक मलहम Ointment की तरह काम करता है। यह घावों को भरता है, सूजन को कम करता है और आंतों को ताकत देता है ताकि वे भोजन से सही मात्रा में पानी और न्यूट्रिएंट्स सोख सकें।

गट-ब्रेन एक्सिस Gut-Brain Axis को शांत करना

क्या आपने ध्यान दिया है कि जब आप तनाव में होते हैं, तो आपका IBS ज्यादा बिगड़ जाता है? ऐसा इसलिए क्योंकि आपका दिमाग और आपकी आंतें वे वेगस नर्व (Vagus Nerve) के जरिए आपस में जुड़े हुए हैं। मात्रा बस्ती केवल पेट को ही नहीं, बल्कि आपके पूरे नर्वस सिस्टम Nervous System को शांत करती है। यह आंतों की नसों को रिलैक्स करती है, जिससे दिमाग को सिग्नल मिलता है कि "सब सुरक्षित है, पैनिक करने की जरूरत नहीं है इससे एंग्जायटी और तनाव कम होता है।

आंतों के अच्छे बैक्टीरिया Gut Microbiome का पोषण

रसायनिक दवाइयां और एंटीबायोटिक्स आंतों के अच्छे बैक्टीरिया को खत्म कर देते हैं। मात्रा बस्ती एक प्राकृतिक प्री-बायोटिक की तरह काम कर सकती है। शुद्ध औषधीय घी या तेल गट के वातावरण को ऐसा बनाता है जिसमें अच्छे बैक्टीरिया पनप सकें और बुरे बैक्टीरिया नष्ट हो जाएं।

मात्रा बस्ती के अन्य अद्भुत फायदे

IBS को हील करने के अलावा, मात्रा बस्ती के कई अन्य फायदे भी हैं:

  1. क्रोनिक कब्ज (Chronic Constipation) से राहत: यह आंतों में जमे सूखे और कड़े मल को मुलायम बनाकर बिना किसी जोर के बाहर निकालती है।
  2. नींद की गुणवत्ता में सुधार: वात शांत होने से अनिद्रा (Insomnia) की समस्या दूर होती है और गहरी नींद आती है।
  3. कमर और जोड़ों का दर्द: क्योंकि यह पेल्विक रीजन में काम करती है, यह लोअर बैक पेन और सायटिका के दर्द में भी जबरदस्त आराम देती है।
  4. इम्यूनिटी बढ़ाती है: आंतें स्वस्थ होती हैं, तो शरीर का ओवरऑल इम्यून सिस्टम मजबूत होता है।

मात्रा बस्ती लेते समय ध्यान रखने योग्य बातें

मात्रा बस्ती सुरक्षित है, लेकिन इसके बेहतरीन परिणाम पाने के लिए कुछ नियमों का पालन करना जरूरी है:

  • एक्सपर्ट की देखरेख: इसे कभी भी इंटरनेट देखकर घर पर खुद से करने का प्रयास न करें। हमेशा एक योग्य आयुर्वेदिक पंचकर्म चिकित्सक से ही इसे कराएं।
  • सही तेल का चुनाव: हर मरीज की प्रकृति वात, पित्त, कफ अलग होती है। डॉक्टर आपकी नाड़ी और प्रकृति देखकर तय करते हैं कि आपको कौन सा तेल जैसे सहचरादि, शतपुष्पा, या पंचतिक्त घृत दिया जाना चाहिए।
  • भोजन का नियम: बस्ती के दौरान हल्का और सुपाच्य भोजन जैसे मूंग दाल की खिचड़ी करना चाहिए। बहुत ज्यादा तीखा, तला-भुना या जंक फूड नहीं खाना चाहिए।

IBS (इरिटेबल बाउल सिंड्रोम) के लिए विशेष आयुर्वेदिक डाइट चार्ट

IBS (आयुर्वेद में 'ग्रहणी' रोग) में हमारी आंतें अति-संवेदनशील (Hyper-sensitive) हो जाती हैं और जठराग्नि (पाचन शक्ति) बहुत कमजोर हो जाती है। इसलिए, IBS के मरीजों के लिए सबसे बड़ा नियम यह है कि खाना हल्का, सुपाच्य (आसानी से पचने वाला) और आंतों को शांत करने वाला होना चाहिए।

समय मील (Meal) क्या खाएं?
सुबह उठते ही (6:30 - 7:00 AM) गट-हीलिंग ड्रिंक 1 गिलास गुनगुने पानी में आधा चम्मच जीरा (Jeera) और आधा चम्मच सौंफ (Fennel) उबालकर छान लें और पिएं। (यह आंतों की ऐंठन और गैस को कम करता है)। चाय या कॉफी बिल्कुल न पिएं।
सुबह (8:00 - 9:00 AM) नाश्ता (Breakfast) मूंग दाल का चीला, सब्जियों वाला पोहा, उपमा या इडली। (नाश्ता हमेशा गर्म खाएं। दूध वाली चाय या कच्चा दूध बिल्कुल न लें)।
दोपहर (11:00 AM) मिड-मॉर्निंग स्नैक अनार (Pomegranate) IBS के लिए अमृत के समान है। यह मल को बांधने (Bind) में मदद करता है। इसके अलावा आप उबला हुआ सेब (Stewed Apple) भी खा सकते हैं। कच्चे और खट्टे फलों से बचें।
दोपहर (1:00 - 2:00 PM) लंच (Lunch) पुराने चावल का भात या पतली रोटी, छिलके वाली मूंग दाल का पानी, और लौकी, तोरई, या टिंडे की सब्जी।


IBS की सबसे बड़ी दवा: लंच के साथ एक गिलास ताजा छाछ (Buttermilk/Takra) जरूर पिएं। इसमें भुना हुआ जीरा और चुटकी भर काला नमक मिलाएं।
शाम (4:30 - 5:00 PM) इवनिंग स्नैक पुदीना, धनिया या सौंफ की हर्बल टी। साथ में 1 कटोरी बिना तेल के भुने हुए मखाने (Makhana) या मुरमुरे (Puffed rice)।
रात (7:30 - 8:00 PM) डिनर (Dinner) रात का खाना सबसे हल्का होना चाहिए। मूंग दाल की खिचड़ी (घी के तड़के के साथ), या लौकी का सूप। (ध्यान रखें: रात को रोटी खाने से बचें क्योंकि यह पचने में समय लेती है)।

IBS के मरीजों के लिए सख्त परहेज

अगर आप IBS को सच में ठीक करना चाहते हैं, तो इन चीजों से पूरी तरह दूरी बना लें:

  1. डेयरी उत्पाद: कच्चा दूध, पनीर, और क्रीम पचने में भारी होते हैं। (हालांकि ताजा छाछ और थोड़ा सा शुद्ध घी खाया जा सकता है)।
  2. कच्चा सलाद (Raw Salads): IBS के मरीजों की आंतें कच्चा खाना नहीं पचा पातीं। जो भी खाएं, उसे पकाकर या उबालकर ही खाएं।
  3. भारी दालें और सब्जियां: राजमा, छोले, उड़द की दाल, पत्तागोभी, फूलगोभी और शिमला मिर्च खाने से बचें। ये आंतों में भयंकर गैस और ब्लोटिंग पैदा करते हैं।
  4. कैफीन और मैदा: चाय, कॉफी, बिस्कुट, ब्रेड और बाहर का जंक फूड आंतों में सूजन (Inflammation) बढ़ाते हैं।

निष्कर्ष&Բ;

IBS एक ऐसी बीमारी है जो इंसान को शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से तोड़ देती है। हर बार खाने के बाद टॉयलेट भागने का डर आपकी सामाजिक जिंदगी को भी खत्म कर देता है। आधुनिक चिकित्सा इसे एक 'लाइफ टाइम बीमारी' मानती है जिसे सिर्फ मैनेज किया जा सकता है। लेकिन आयुर्वेद 'मात्रा बस्ती' जैसी गहरी और वैज्ञानिक चिकित्सा के जरिए आपकी आंतों को वापस हील करने का रास्ता दिखाता है। यह आंतों को पोषण देकर वात को शांत करती है और पाचन को वापस पटरी पर लाती है।

References

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Դ doctor.

FAQs

 IBS आंतों की एक बीमारी है जिसमें आंतें अति-संवेदनशील हो जाती हैं, जिससे पेट दर्द, ऐंठन, गैस और बार-बार दस्त या कब्ज होता है।

गैस्ट्रोकोलिक रिफ्लेक्स के अति-सक्रिय होने और वात दोष बिगड़ने के कारण आंतें तुरंत भोजन को बाहर धकेलने लगती हैं।

बिल्कुल नहीं। मात्रा बस्ती बहुत सौम्य और दर्द रहित प्रक्रिया है। इसमें तेल को बहुत धीरे-धीरे और सावधानी से अंदर डाला जाता है।

मरीज की प्रकृति के अनुसार धनवंतरम तेल, नारायण तेल, क्षीरबला तेल या औषधीय घी का इस्तेमाल किया जाता है

हाँ, सही आयुर्वेदिक दवाओं, पंचकर्म (जैसे मात्रा बस्ती), डाइट और स्ट्रेस मैनेजमेंट से IBS को पूरी तरह ठीक किया जा सकता है।

यह मरीज की स्थिति पर निर्भर करता है। आमतौर पर डॉक्टर 7 से 14 दिन का कोर्स लगातार या हफ्ते में कुछ दिन की सलाह देते हैं।

नहीं, इसे घर पर खुद करने से नुकसान हो सकता है। यह हमेशा अनुभवी आयुर्वेदिक डॉक्टर और थेरेपिस्ट की देखरेख में ही होनी चाहिए।

ज्यादा डेयरी प्रोडक्ट्स (दूध), कच्चा सलाद, तीखे-मसालेदार भोजन, कैफीन (कॉफी), मैदा और जंक फूड से सख्त परहेज करना चाहिए।

यह हमारे दिमाग और आंतों के बीच का कनेक्शन है। तनाव होने पर आंतें खराब होती हैं और आंतें खराब होने पर तनाव बढ़ता है।

 जीवा आयुर्वेद नाड़ी परीक्षण कर कस्टमाइज्ड दवाइयां, डाइट प्लान और पंचकर्म (मात्रा बस्ती) देकर बीमारी को जड़ से खत्म करने में मदद करता है।

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