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48 वर्ष की उम्र में HbA1c 8.5 से 5.5 कैसे हुआ? डायबिटॶज में आयुर्वेद का असर जानिए

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

कभी-कभी जिंदगी में एक ऐसा वक्त आता है जब शरीर खुद ही आपको रोकने लगता है। थकान जो सुबह उठते ही महसूस हो, प्यास जो बुझे ही नहीं, और एक अजीब सी बेचैनी जो दिन-रात पीछा न छोड़े। धीरे-धीरे ये सब मिलकर ज़िंदगी की रफ्तार को धीमा कर देते हैं और इंसान सोचने लगता है कि क्या अब यही मेरी जिंदगी है?

48 साल की उम्र में जब जिम्मेदारियां सबसे ज्यादा होती हैं, तब डायबिटॶज का पता चलना किसी झटके से कम नहीं होता। HbA1c का 8.5 तक पहुँचना सिर्फ एक नंबर नहीं था, बल्कि यह उस डर की शुरुआत थी जो हर मीठी चीज़ को देखकर, हर खाने की थाली को देखकर मन में उठने लगता है।

अभिषेक जी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। एक आम इंसान, जो एक असामान्य चुनौती से गुज़रा। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी, बल्कि एक ऐसा रास्ता चुना जो सदियों पुराना है, फिर भी आज भी उतना ही कारगर है। यह कहानी है आयुर्वेद पर भरोसे की, धैर्य की और उस बदलाव की जो HbA1c को 8.5 से 5.5 तक ले आई।

48 की उम्र और चुपचाप बढ़ता डायबिटॶज का तूफान

48 साल की उम्र में अभिषेक जी की ज़िंदगी बाहर से बिल्कुल सामान्य दिख रही थी। काम, घर, परिवार सब कुछ ठीकठाक चल रहा था। लेकिन शरीर के अंदर शर्करा (sugar) का स्तर धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था और उन्हें खबर तक नहीं थी। यही डायबिटॶज की सबसे बड़ी समस्या है। यह बीमारी शुरुआत में कोई बड़ा संकेत नहीं देती। बस छोटी-छोटी तकलीफें होती हैं जिन्हें हम आसानी से नज़रअंदाज़ कर देते हैं। और तब तक यह शरीर में अपनी जड़ें जमा लेती है। अभिषेक जी के साथ भी यही हुआ। जब तक रिपोर्ट आई तब तक डायबिटॶज काफी समय से शरीर में थी। 

जब शरीर ने पहली बार चेतावनी दी 

अभिषेक जी को शुरुआत में छोटी-छोटी तकलीफें होने लगी थीं जिन्हें वो गंभीरता से नहीं ले रहे थे। बार-बार प्यास लगना, पानी पीते रहो फिर भी प्यास न बुझे। सुबह उठो तो भी थकान, रात को सोओ तो भी थकान। और कभी-कभी नज़र थोड़ी धुंधली सी लगने लगी थी। इन सबको उन्होंने बस यही सोचकर टाल दिया कि काम का बोझ ज़्यादा है, मौसम बदल रहा है, आराम मिलेगा तो ठीक हो जाएगा। लेकिन हफ्ते गुज़रते गए और ये तकलीफें कम होने की बजाय और बढ़ती गईं। घर वालों ने भी नोटिस करना शुरू किया कि अभिषेक जी पहले जैसे एक्टिव नहीं रहे हैं। तब जाकर उन्होंने डॉक्टर को दिखाने का फैसला किया।

HbA1c 8.5 का सच जो डराता भी था और जगाता भी

रिपोर्ट में HbA1c 8.5 देखकर अभिषेक जी थोड़े घबरा गए। डॉक्टर ने समझाया कि यह नंबर बताता है कि पिछले तीन महीनों से शरीर में शर्करा का स्तर लगातार बढ़ा हुआ है। नॉर्मल HbA1c 5.7 से नीचे होनी चाहिए और 8.5 का मतलब था कि शरीर में शर्करा काफी ज़्यादा और काफी लंबे समय से बेकाबू थी। डॉक्टर ने यह भी बताया कि अगर इसे समय रहते काबू नहीं किया तो धीरे-धीरे आँखों की रोशनी, गुर्दों की कार्यक्षमता और दिल की सेहत पर भी बुरा असर पड़ सकता है। यह सुनकर अभिषेक जी के मन में हलचल सी हुई।

दवाइयाँ खाईं, परहेज़ किया, फिर भी राहत नहीं मिली

डॉक्टर की सलाह पर अभिषेक जी ने दवाएँ लेना शुरू कर दिया। मीठा बंद किया, बाहर का खाना छोड़ा, सुबह थोड़ा टहलने भी लगे। शुरुआत में लगा कि सब ठीक हो जाएगा।

लेकिन कुछ महीनों बाद जब दोबारा जाँच हुई तो शर्करा का स्तर उतना नहीं गिरा जितना गिरना चाहिए था। दवाओं की मात्रा बढ़ाई गई। फिर भी नतीजा संतोषजनक नहीं था। ऊपर से दवाओं के कुछ साइड इफेक्ट भी महसूस होने लगे थे जैसे पेट की गड़बड़ी, कभी-कभी कमज़ोरी और भूख का अजीब सा उतार-चढ़ाव।

जीवा आयुर्वेद के साथ अभिषेक जी का पहला संपर्क

एलोपैथिक दवाओं से खास फर्क न पड़ते देख अभिषेक जी के मन में आयुर्वेद को लेकर सोचना शुरू हुआ। घर में किसी ने जीवा आयुर्वेद का नाम लिया और उन्होंने एक बार आज़माने का फैसला किया। शुरुआत में मन में थोड़ा संदेह था कि क्या आयुर्वेद से सच में HbA1c जैसी चीज़ में फर्क पड़ सकता है, लेकिन जब दवाओं से राहत नहीं मिल रही थी तो एक बार कोशिश करने में क्या हर्ज़ था।

उन्होंने +91 9266714040 पर कॉल करके घर बैठे परामर्श लिया। जीवा के डॉक्टरों ने उनकी पूरी बात ध्यान से सुनी। सिर्फ रिपोर्ट नहीं देखी, बल्कि उनकी दिनचर्या, खानपान, नींद और शरीर के बाकी लक्षणों को भी समझा। अभिषेक जी को पहली बार ऐसा लगा कि डॉक्टर सिर्फ बीमारी नहीं बल्कि उन्हें एक इंसान की तरह देख रहे हैं।

वो गलतियाँ जो अभिषेक जी अनजाने में कर रहे थे

जीवा के डॉक्टरों ने जब अभिषेक जी की पूरी दिनचर्या और खानपान को ध्यान से समझा, तो कुछ ऐसी आदतें सामने आईं जो चुपचाप शर्करा को बढ़ावा दे रही थीं। अभिषेक जी को खुद नहीं पता था कि यही छोटी-छोटी चीज़ें उनकी HbA1c को ऊँचा रखे हुए थीं।

  • देर रात खाना खाना: रात को देर से खाने की आदत थी जिससे शरीर को खाना पचाने का वक्त नहीं मिलता था और शर्करा का स्तर बढ़ा रहता था।
  • शारीरिक गतिविधि न के बराबर: दिनभर बैठे रहने वाला काम और शाम को भी कोई कसरत नहीं, जिससे शरीर शर्करा को सही तरह से उपयोग नहीं कर पा रहा था।
  • सफेद चावल और मैदे का ज़्यादा सेवन: रोज़ के खाने में ऐसी चीज़ें थीं जो तेज़ी से शर्करा बढ़ाती हैं और अभिषेक जी को इसका अंदाज़ा भी नहीं था।
  • नींद पूरी न होना: रात को देर तक जागना और सुबह जल्दी उठना, यह भी शर्करा के असंतुलन की एक बड़ी वजह बन रहा था।
  • तनाव को नज़रअंदाज़ करना: काम और घर की ज़िम्मेदारियों का तनाव अंदर ही अंदर जमा होता रहा जो शर्करा को और बढ़ाता रहा।

जीवा आयुर्वेद ने डायबिटॶज और HbA1c को कैसे समझाया

अभिषेक जी के लिए सबसे पहले यह समझना ज़रूरी था कि आयुर्वेद डायबिटॶज को किस नज़र से देखता है।  आयुर्वेद में डायबिटॶज को मधुमेह कहते हैं। यह सिर्फ शर्करा बढ़ने की बीमारी नहीं है, बल्कि यह शरीर के अंदर के पाचन तंत्र और चयापचय के बिगड़ने की निशानी है। जब शरीर में कफ दोष बढ़ता है और पाचन कमज़ोर होता है, तो शर्करा सही तरह से नहीं पचती और खून में जमा होने लगती है। जीवा के डॉक्टरों ने अभिषेक जी को यह भी बताया कि आयुर्वेद सिर्फ शर्करा को काबू नहीं करता, बल्कि उस जड़ को ठीक करता है जहाँ से यह समस्या शुरू हुई है। 

जीवा आयुर्वेद में अभिषेक जी की जाँच कैसे की गई?

आयुर्वेद में डायबिटॶज को सिर्फ शर्करा बढ़ने की समस्या नहीं माना जाता, बल्कि इसे पूरे शरीर के पाचन तंत्र, दोषों के असंतुलन और जीवनशैली के असर के रूप में देखा जाता है। अभिषेक जी के केस में भी वीडियो कंसल्टेशन के ज़रिए उनकी पूरी स्थिति को बारीकी से समझा गया, ताकि समस्या की असली जड़ तक पहुँचा जा सके।

  • पिछले कुछ सालों में ली गई दवाइयों, रिपोर्ट्स और इलाज के तरीकों का पूरा विश्लेषण किया गया
  • शर्करा का स्तर किस वक्त बढ़ता है, खाने के बाद कैसा महसूस होता है और थकान कब ज़्यादा रहती है, यह सब ध्यान से जाना गया
  • उनकी रोज़ की दिनचर्या, खानपान की आदतें और शारीरिक गतिविधि को विस्तार से समझा गया
  • उम्र से जुड़े बदलाव, शरीर की कमज़ोरी और पाचन की स्थिति का आकलन किया गया
  • काम का तनाव, नींद की कमी और मानसिक थकान को भी इलाज का हिस्सा माना गया
  • कफ और वात दोष के असंतुलन और उसके शरीर पर पड़ने वाले असर पर खास ध्यान दिया गया

इन सभी पहलुओं को जोड़कर अभिषेक जी के लिए एक अलग और व्यक्तिगत उपचार योजना तैयार की गई। 

जीवा आयुर्वेद में अभिषेक जी की व्यक्तिगत उपचार योजना

अभिषेक जी के मामले में डायबिटॶज को सिर्फ शर्करा बढ़ने की समस्या नहीं माना गया, बल्कि इसे पूरे शरीर के असंतुलन का नतीजा समझा गया। इलाज का मकसद सिर्फ HbA1c का नंबर कम करना नहीं था, बल्कि उन असली वजहों को ठीक करना था जो शर्करा को बेकाबू रखे हुए थीं।

  • पाचन को दुरुस्त करना और आम का निष्कासन: अभिषेक जी का पाचन कमज़ोर था जिसकी वजह से शरीर में आम यानी विषाक्त पदार्थ जमा हो रहे थे। आयुर्वेद के अनुसार यही आम शर्करा के असंतुलन की एक बड़ी वजह बनता है। इसलिए सबसे पहले पाचन को मज़बूत करने और आम को बाहर निकालने पर ध्यान दिया गया।
  • कफ और वात दोष को संतुलित करना: अभिषेक जी में कफ दोष की अधिकता थी जो मधुमेह की मुख्य वजह मानी जाती है। इसे संतुलित करके शरीर की शर्करा को पचाने और उपयोग करने की क्षमता को बेहतर बनाया गया।
  • अग्नि को मज़बूत करना: आयुर्वेद में अग्नि यानी पाचन शक्ति को सबसे अहम माना जाता है। अभिषेक जी की अग्नि कमज़ोर थी जिसकी वजह से शरीर खाने को सही तरह से नहीं पचा पा रहा था। इसे ठीक करने के लिए खास जड़ी-बूटियाँ और उपाय दिए गए।
  • खानपान और दिनचर्या में बदलाव: गलत खानपान और अनियमित दिनचर्या को सुधारने के लिए एक सरल और व्यावहारिक योजना दी गई। क्या खाएं, क्या न खाएं, कब खाएं और कितना खाएं, यह सब विस्तार से समझाया गया।
  • तनाव और नींद पर ध्यान: तनाव और नींद की कमी भी शर्करा बढ़ाने में बड़ा रोल निभाती हैं। इसलिए इलाज में इन्हें भी शामिल किया गया और कुछ सरल उपाय बताए गए जिससे नींद बेहतर हो और तनाव कम हो।

यह सिर्फ अभिषेक जी की कहानी नहीं है। डायबिटॶज से जूझ रहे कई लोग आयुर्वेदिक देखभाल से अच्छे नतीजे पाते हैं। जब शरीर को सही दिशा, सही खानपान और सही संतुलन मिलता है तो वह अपनी ताकत फिर से हासिल कर लेता है।

क्या आयुर्वेदिक दवाइयाँ वाकई सुरक्षित हैं?

अभिषेक जी के मन में भी यही सवाल था। वो पहले से ही एलोपैथिक दवाइयों के साइड इफेक्ट झेल चुके थे, तो स्वाभाविक था कि आयुर्वेदिक दवाइयों को लेकर भी थोड़ा संदेह हो। कहीं इससे शर्करा और न बढ़ जाए, कहीं कोई और तकलीफ न हो जाए।

लेकिन जीवा आयुर्वेद के डॉक्टरों ने उन्हें समझाया कि आयुर्वेदिक दवाइयाँ प्राकृतिक जड़ी-बूटियों पर आधारित होती हैं और यह शरीर पर ज़बरदस्ती असर नहीं करतीं, बल्कि शरीर की अपनी ताकत को धीरे-धीरे बढ़ाती हैं। सही जाँच और सही diagnosis के बाद दी गई दवाइयाँ शरीर के पाचन, दोषों के संतुलन और शर्करा को नियंत्रित करने पर मूल स्तर से काम करती हैं, बिना किसी अतिरिक्त नुकसान के।

अभिषेक जी के उपचार में अपनाई गई आयुर्वेदिक थेरेपीज़

अभिषेक जी के मामले में उपचार का मकसद सिर्फ शर्करा का नंबर कम करना नहीं था, बल्कि पाचन, दोषों का संतुलन और शरीर की अंदरूनी ताकत — तीनों को एक साथ ठीक करना था। इसके लिए दवाइयों के साथ कुछ असरदार आयुर्वेदिक थेरेपीज़ भी शामिल की गईं।

  • उद्वर्तन (हर्बल पाउडर मसाज): खास जड़ी-बूटियों के चूर्ण से शरीर की मालिश की गई जिससे कफ दोष कम हुआ, शरीर में जमा विषाक्त पदार्थ बाहर निकले और चयापचय बेहतर हुआ। यह थेरेपी मधुमेह के मरीज़ों के लिए खास तौर पर फायदेमंद मानी जाती है।
  • विरेचन (शोधन चिकित्सा): शरीर की अंदरूनी सफाई के लिए विरेचन अपनाया गया जिससे पाचन तंत्र में जमा आम बाहर निकला और शरीर की शर्करा को पचाने की क्षमता बेहतर हुई।
  • अभ्यंग (औषधीय तेल मालिश): विशेष जड़ी-बूटियों से बने तेलों से पूरे शरीर की मालिश की गई जिससे रक्त संचार बेहतर हुआ, तनाव कम हुआ और शरीर को अंदर से पोषण मिला।
  • स्वेदन (भाप चिकित्सा): हल्की हर्बल भाप दी गई जिससे शरीर के विषाक्त पदार्थ पसीने के ज़रिए बाहर निकले, रक्त संचार सुधरा और शरीर हल्का महसूस हुआ।

अभिषेक जी की दिनचर्या और आहार में किए गए बदलाव

डायबिटॶज को काबू करने में दवाइयों के साथ-साथ खानपान और दिनचर्या का बदलाव भी उतना ही ज़रूरी था। जीवा के डॉक्टरों ने अभिषेक जी को कुछ सरल लेकिन असरदार बदलाव बताए जिन्हें उन्होंने धीरे-धीरे अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में शामिल किया।

  • मीठे और मैदे से परहेज़: सफेद चावल, मैदे से बनी चीज़ें और मीठे को धीरे-धीरे कम किया गया और उनकी जगह मोटे अनाज जैसे जौ और बाजरा को खाने में शामिल किया गया।
  • समय पर खाना खाना: देर रात खाने की आदत बदली गई और रात का खाना सूरज ढलने के बाद जल्दी खाने की सलाह दी गई ताकि शरीर को पाचन का पूरा वक्त मिले।
  • हल्का और सुपाच्य भोजन: ऐसा आहार दिया गया जो पाचन को मज़बूत करे और शरीर में कफ न बढ़ाए। दाल, सब्ज़ियाँ और हल्के मसाले खाने में शामिल किए गए।
  • तैलीय और भारी खाने में कमी: बाहर का तला-भुना और भारी खाना बंद किया गया जो शर्करा को तेज़ी से बढ़ाता था और पाचन को कमज़ोर करता था।
  • रोज़ाना हल्की कसरत और योग: सुबह की सैर, हल्के योगासन और प्राणायाम को दिनचर्या में शामिल किया गया जिससे शरीर शर्करा को सही तरह से उपयोग करने लगा और ऊर्जा भी बढ़ी।
  • नींद और तनाव पर ध्यान: रात को समय पर सोने और सुबह जल्दी उठने की आदत बनाई गई। साथ ही तनाव कम करने के लिए ध्यान और गहरी साँस के सरल उपाय बताए गए।

अभिषेक जी को उपचार से क्या लाभ मिला?

अभिषेक जी के मामले में उपचार का मकसद सिर्फ HbA1c का नंबर कम करना नहीं था, बल्कि शरीर को अंदर से बेहतर बनाना था। जीवा आयुर्वेद के इलाज, सही खानपान और दिनचर्या में बदलाव के बाद उन्हें कई स्तरों पर अच्छे बदलाव महसूस हुए।

  • HbA1c 8.5 से 5.5 पर आई: यह सबसे बड़ा और साफ नतीजा था। जो नंबर महीनों से ऊँचा था वो अब सामान्य सीमा में आ गया था और यह किसी एक दवा का नहीं बल्कि पूरे इलाज का असर था।
  • थकान में कमी और ऊर्जा में सुधार: पहले दिनभर थकान रहती थी, अब सुबह उठने पर शरीर हल्का और तरोताज़ा महसूस होने लगा। दिनभर काम करने की ताकत वापस आई।
  • प्यास और बार-बार पेशाब की समस्या में राहत: जो तकलीफें शुरुआत में सबसे ज़्यादा परेशान करती थीं वो धीरे-धीरे कम होने लगीं।
  • पाचन बेहतर हुआ: खाना सही तरह से पचने लगा, पेट हल्का रहने लगा और खाने के बाद भारीपन की शिकायत कम हुई।
  • नींद और मानसिक सुकून मिला: तनाव कम हुआ, नींद बेहतर हुई और मन में एक सकारात्मक बदलाव महसूस होने लगा।
  • आत्मविश्वास वापस आया: जब रिपोर्ट में सुधार दिखा तो अभिषेक जी को खुद पर और आयुर्वेद पर भरोसा और मज़बूत हुआ। वो अब पहले से ज़्यादा सक्रिय और खुश रहने लगे।

रिकवरी का सफर: कैसे जीवा ने अभिषेक जी को धीरे-धीरे राहत दी

आयुर्वेद में उपचार एक दिन में नतीजा नहीं देता, बल्कि धीरे-धीरे शरीर के अंदर के असंतुलन को ठीक करता है ताकि सुधार टिकाऊ हो। अभिषेक जी के मामले में भी बदलाव धीरे-धीरे आया, लेकिन हर हफ्ते कुछ न कुछ फर्क ज़रूर महसूस हुआ।

शुरुआती कुछ हफ्तों में: दवाइयाँ और खानपान में बदलाव शुरू होते ही शरीर में हल्कापन महसूस होने लगा। थकान थोड़ी कम हुई, पाचन बेहतर होने लगा और बार-बार प्यास लगने की तकलीफ में भी थोड़ी राहत मिली।

1 से 3 महीनों के दौरान: शर्करा का स्तर धीरे-धीरे नियंत्रण में आने लगा। सुबह उठने पर शरीर पहले से ज़्यादा तरोताज़ा लगने लगा। नींद बेहतर हुई और दिनभर ऊर्जा बनी रहने लगी। अभिषेक जी को खुद फर्क महसूस होने लगा था।

3 से 6 महीनों में: जब दोबारा जाँच हुई तो HbA1c 8.5 से गिरकर 5.5 पर आ गई थी। यह देखकर अभिषेक जी को यकीन नहीं हुआ। शरीर में ताकत वापस आई, मन में सकारात्मकता आई और वो पहले से कहीं ज़्यादा सक्रिय और आत्मनिर्भर महसूस करने लगे।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च और पारदर्शिता 

कई लोग सोचते हैं कि ऐसा कस्टमाइज्ड आयुर्वेद बहुत महंगा होगा। लेकिन आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है । जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें ।

  • जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है । (यह एक अनुमानित आधार है और अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।)
  • अधिक व्यापक दृष्टिकोण के लिए विशेष पैकेज प्रोटोकॉल भी हैं, जिन्हें शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है ।
  • इन पैकेज में दवा, परामर्श, मानसिक स्वास्थ्य सत्र, योग और ध्यान मार्गदर्शन, आहार योजना और थेरेपी शामिल हैं । इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • बेहतर परिणाम: 90%+ मरीजों में धीरे-धीरे स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है।
  • दवाइयों पर निर्भरता कम: 88% मरीजों ने धीरे-धीरे एलोपैथिक दवाओं और हार्मोनल सपोर्ट पर निर्भरता कम की है।

निष्कर्ष

अभिषेक जी की यह कहानी सिर्फ एक नंबर के बदलने की कहानी नहीं है। यह उस भरोसे की कहानी है जो उन्होंने अपने शरीर पर, आयुर्वेद पर और सही इलाज पर रखा।

डायबिटॶज कोई ऐसी बीमारी नहीं है जिससे डरकर बैठ जाएं। अगर सही समय पर सही दिशा मिले तो शरीर खुद को ठीक करने की ताकत रखता है। जीवा आयुर्वेद ने अभिषेक जी को सिर्फ दवाइयाँ नहीं दीं, बल्कि एक पूरी जीवनशैली दी जो उन्हें लंबे समय तक स्वस्थ रखेगी।

अगर आप भी डायबिटॶज से जूझ रहे हैं और थक चुके हैं बार-बार दवाइयाँ बदलते-बदलते, तो एक बार आयुर्वेद को मौका दीजिए। +91 9266714040 पर कॉल करें और जीवा के डॉक्टरों से घर बैठे परामर्श लें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Դ doctor.

FAQs

हाँ, आयुर्वेद सिर्फ शर्करा को काबू नहीं करता बल्कि पाचन और दोषों के असंतुलन को ठीक करके शरीर की शर्करा को नियंत्रित करने की क्षमता को बेहतर बनाता है। अभिषेक जी की HbA1c 8.5 से 5.5 पर आना इसका जीता-जागता उदाहरण है।

यह हर व्यक्ति की स्थिति पर निर्भर करता है। आमतौर पर शुरुआती बदलाव कुछ हफ्तों में महसूस होने लगते हैं और 3 से 6 महीनों में अच्छे नतीजे सामने आते हैं।

जीवा के डॉक्टर पहले आपकी पूरी स्थिति समझते हैं और उसी के हिसाब से इलाज तय करते हैं। दवाइयों में कोई भी बदलाव डॉक्टर की सलाह से ही किया जाता है।

आयुर्वेद में दवाइयों के साथ-साथ खानपान और दिनचर्या में बदलाव भी उतना ही ज़रूरी है। दोनों मिलकर ही असरदार नतीजे देते हैं।

आयुर्वेदिक दवाइयाँ प्राकृतिक जड़ी-बूटियों पर आधारित होती हैं और सही जाँच के बाद दी जाती हैं। इसलिए इनके साइड इफेक्ट न के बराबर होते हैं।

आयुर्वेद का लक्ष्य डायबिटॶज को जड़ से काबू करना और शरीर को इतना मज़बूत बनाना है कि शर्करा का स्तर सामान्य बना रहे। सही इलाज और जीवनशैली से इसे पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है।

बिल्कुल। आयुर्वेद में हर उम्र के मरीज़ के लिए अलग और व्यक्तिगत इलाज तैयार किया जाता है। उम्र के हिसाब से दवाइयाँ और थेरेपी तय की जाती हैं।

सबसे पहले मीठा, मैदा और तला-भुना खाना कम करें। समय पर खाएं, रात का खाना जल्दी खाएं और खाने में मोटे अनाज और हरी सब्ज़ियाँ शामिल करें।

 योग और सही खानपान बहुत ज़रूरी हैं लेकिन अकेले काफी नहीं होते। इनके साथ सही आयुर्वेदिक दवाइयाँ और डॉक्टर की निगरानी भी उतनी ही ज़रूरी है।

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