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Cataract Surgery टालना सही है? आयुर्वेदिक रोकथाम

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, आँखों के सामने एक अजीब सा धुंधलापन आने लगता है। सच कहूँ तो, हम में से ज़्यादातर लोग इसे एक बहुत ही आम सी बात मान लेते हैं। इसे हम अक्सर टालते ही रहते हैं। हम अपनी आँखों की इस बदलती हुई हालत पर तब तक कोई खास ध्यान नहीं देते, जब तक कि हमारे रोज़मर्रा के छोटे-मोटे कामों में कोई रुकावट न आने लगे। हमें बस यही लगता है कि चलो, उम्र ढल रही है, तो ऐसा होना तो स्वाभाविक ही है।लेकिन अगर थोड़ा गहराई से देखा जाए तो बात कुछ और ही है। यह धुंधलापन सिर्फ कोई आम सी कमज़ोरी नहीं होती। असल में, कभी-कभी यह हमारे शरीर के अंदर चल रही किसी तरह की गड़बड़ी या असंतुलन का एक बहुत बड़ा इशारा भी हो सकता है। और इस इशारे को सही समय पर समझना सच में बहुत ज़रूरी है।

मोतियाबिंद में शरीर और आँखों के साथ क्या होता है?

आँखों का प्राकृतिक लेंस Natural Lens जो रोशनी को रेटिना तक पहुँचाता है, वह पानी और प्रोटीन से बना होता है जब यह व्यवस्था बिगड़ने लगती है, तो कई बदलाव होते हैं

  • प्रोटीन का टूटना: उम्र या अन्य कारणों से लेंस का प्रोटीन टूटने लगता है और एक जगह इकट्ठा होकर क्लंप Clump बना लेता है, जिससे लेंस पर सफेद या पीली धुंध छा जाती है
  • रोशनी का ब्लॉक होना: यह जमा हुआ प्रोटीन रोशनी को आँखों के पिछले हिस्से Retina तक सही से नहीं पहुँचने देता, जिससे दृष्टि धुंधली हो जाती है।
  • नसों पर दबाव: लगातार धुंधलेपन के कारण आँखों को फोकस करने में ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जो ऑप्टिक नसों की कमज़ोरी का कारण बन सकता है और आँखों में भारीपन लाता है।

मोतियाबिंद किन प्रकार के हो सकते हैं?

मोतियाबिंद केवल एक तरह का नहीं होता; यह लेंस के किस हिस्से को प्रभावित कर रहा है, इसके आधार पर इसके प्रकार अलग-अलग होते हैं

न्यूक्लियर मोतियाबिंद Nuclear Cataract: यह लेंस के बिल्कुल बीच वाले हिस्से Nucleus को प्रभावित करता है। शुरुआत में इससे पास की नज़र कुछ समय के लिए साफ हो सकती है लेकिन बाद में लेंस पीला या भूरा हो जाता है।

कॉर्टिकल मोतियाबिंद Cortical Cataract: यह लेंस के बाहरी किनारे Cortex से शुरू होता है और सफेद, पच्चर Wedge के आकार की धारियों के रूप में केंद्र की ओर बढ़ता है।

पोस्टीरियर सबकैप्सुलर मोतियाबिंद Posterior Subcapsular Cataract: यह लेंस के पिछले हिस्से में तेजी से विकसित होता है और रौशनी में चकाचौंध Glare पैदा करता है। यह अक्सर टाइप 2 डायबिटीज Type 2 Diabetes के मरीज़ों या स्टेरॉयड का ज़्यादा इस्तेमाल करने वालों में देखा जाता है।

कंजेनिटल मोतियाबिंद Congenital Cataract: यह जन्म से ही बच्चों में पाया जाता है, जो किसी आनुवंशिक कारण या गर्भावस्था के दौरान संक्रमण की वजह से होता है।

इसके लक्षणों की शुरुआती जाँच कैसे करें?

इस समस्या के पनपने पर शरीर और आँखें कई संकेत देती हैं, जिन्हें समय पर पहचानना ज़रूरी है:

  • नज़र का धुंधला होना: ऐसा महसूस होना जैसे आप किसी धुंधले या गंदे शीशे के आर-पार देख रहे हैं।
  • रात में देखने में परेशानी: कम रौशनी में या रात के समय गाड़ी चलाते वक्त सामने की चीज़ें स्पष्ट नज़र नहीं आतीं।
  • रौशनी के चारों ओर घेरे Halos: जब आप किसी बल्ब या स्ट्रीट लाइट को देखते हैं, तो उसके चारों ओर गोल रंगीन या सफेद घेरे दिखाई देते हैं।
  • रंगों का फीका पड़ना: दुनिया के रंग उतने चमकदार नहीं लगते; सब कुछ थोड़ा पीलापन Yellowish tint लिए हुए दिखाई देता है।
  • चश्मे के नंबर का बार-बार बदलना: बहुत कम अंतराल में आँखों के चश्मे या कॉन्टैक्ट लेंस का नंबर तेज़ी से बदलना।

इस परेशानी में होने वाली गलतियाँ और जटिलताएँ क्या हैं?

मोतियाबिंद होने पर या आँखों में कमज़ोरी आने पर लोग अक्सर ऐसी गलतियाँ करते हैं जो समस्या को और बढ़ा देती हैं|

  • लक्षणों को नज़रअंदाज़ करना: शुरुआती धुंधलेपन को सामान्य थकान मानकर छोड़ देना और डॉक्टर से सही जाँच न करवाना।
  • लगातार स्क्रीन का दबाव: आँखों की कमज़ोरी के बावजूद बिना ब्रेक लिए सुबह उठकर मोबाइल का इस्तेमाल करना या कंप्यूटर पर काम करना, जो आँखों के लचीलेपन को खत्म करता है।
  • गलत खानपान और तनाव: अत्यधिक मानसिक तनाव और ऐसा भोजन करना जो शरीर में क्रोनिक कब्ज़ पैदा करता है। आयुर्वेद के अनुसार, पेट की गर्मी और गैस सीधा आँखों की नसों को नुकसान पहुँचाती है।
  • बिना सलाह आई ड्रॉप्स Eye Drops का प्रयोग: मेडिकल स्टोर से अपनी मर्जी से कोई भी स्टेरॉयड या केमिकल वाली ड्रॉप्स डालना, जो लेंस को और ज़्यादा अपारदर्शी Opaque बना देती है।

आयुर्वेद इस धुंधलेपन के विज्ञान को कैसे समझता है?

आधुनिक विज्ञान जिसे कैटरेक्ट Cataract कहता है, आयुर्वेद में उसे दृष्टि पटल Lens और दोषों की विकृति से जोड़कर तिमिर और इसके उन्नत रूप लिंगनाश के रूप में समझा जाता है:

  • दोषों का लेंस पर जमाव: जब शरीर में वात दोष और कफ दोष असंतुलित होते हैं, तो वे आँखों के प्राकृतिक पानी Aqueous humor को सुखा देते हैं और कफ लेंस पर एक सफेद पर्त के रूप में जम जाता है।
  • अग्निमांद्य का प्रभाव: अगर शरीर की जठराग्नि कमज़ोर है, तो खाया हुआ भोजन सही से पचकर रस और रक्त नहीं बनाता, जिससे आँखों को पोषण नहीं मिल पाता।
  • आलोचक पित्त का कमज़ोर होना: आँखों की रौशनी और रंग पहचानने की क्षमता आलोचक पित्त पर निर्भर करती है। इसके बिगड़ने पर ही नज़र धुंधली पड़ती है।

आँखों को प्राकृतिक रूप से स्वस्थ रखने वाली आयुर्वेदिक डाइट

अपने शरीर और आँखों के लेंस को स्वस्थ रखने के लिए आपको अपने खानपान में ये बदलाव करने होंगे:

आहार की श्रेणी क्या खाएं (फायदेमंद - आँखों को पोषण देने वाले) क्या न खाएं (ट्रिगर फूड्स - दोष बढ़ाने वाले)
अनाज (Grains) पुराना चावल, मूंग की दाल, जौ, दलिया। मैदा, सफेद ब्रेड, बासी और पैकेटबंद भोजन।
वसा (Fats) देसी गाय का शुद्ध घी (आँखों के लिए महा-अमृत), बादाम का तेल। बहुत ज़्यादा रिफाइंड तेल, डालडा या ट्रांस फैट्स।
सब्ज़ियाँ (Vegetables) गाजर, पालक, लौकी, परवल, शकरकंद (विटामिन ए से भरपूर)। बहुत ज़्यादा खट्टी, तीखी या भारी सब्ज़ियाँ, कच्चा प्याज।
फल (Fruits) आँवला (सबसे बेहतरीन), पपीता, मीठे अंगूर, सेब। बेमौसम के फल, अत्यधिक खट्टे फल।
पेय पदार्थ (Beverages) त्रिफला का पानी, सौंफ और मिश्री का पानी, गुनगुना दूध। बहुत ज़्यादा चाय/कॉफी, कोल्ड ड्रिंक्स, शराब।

आँखों का स्वास्थ्य सुधारने वाली चमत्कारी जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें ऐसे कई रसायन दिए हैं, जो बिना किसी दुष्प्रभाव के दृष्टि को मज़बूत करते हैं:

  • त्रिफला Triphala: यह आँखों के लिए एक जादुई रसायन है। त्रिफला का सेवन या इसके पानी से आँखों को धोना नेत्र प्रक्षालन आलोचक पित्त को संतुलित करता है और लेंस की सफेदी को बढ़ने से रोकता है।
  • अश्वगंधा Ashwagandha: जब दृष्टि कमज़ोर होने के साथ आँखों की मांसपेशियाँ और नसें कमज़ोर पड़ जाएं, तो अश्वगंधा उन्हें प्राकृतिक ताकत देता है।
  • गिलोय Giloy: शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस Oxidative stress ही मोतियाबिंद का बड़ा कारण है। गिलोय एक पावरफुल एंटीऑक्सीडेंट है जो इस डैमेज को रोकता है।
  • ब्राह्मी Brahmi: यह दिमाग और ऑप्टिक नसों के बीच के कनेक्शन को मज़बूत करती है और आँखों के तनाव को दूर करने में मदद करती है।

दृष्टि और नसों को रीबूट करने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक थेरेपीज़

आयुर्वेदिक पंचकर्म की बाहरी थेरेपीज़ आँखों के आस-पास के ब्लड सर्कुलेशन को खोलकर उन्हें तुरंत पोषण देती हैं:

  • नेत्र तर्पण Netra Tarpana: आँखों के चारों ओर उड़द की दाल का घेरा बनाकर उसमें औषधीय शुद्ध घी भरा जाता है। यह लेंस को चिकनाई देता है, वात के रूखेपन को खत्म करता है और नज़र की कमज़ोरी दूर करता है।
  • नस्य थेरेपी Nasya Therapy: नाक के ज़रिए औषधीय तेल या घी की बूँदें डाली जाती हैं, जो सीधा सिर और आँखों की नसों Urdhvajatrugata तक पहुँचकर उन्हें ताक़त देती हैं।
  • शिरोधारा Shirodhara: माथे पर लगातार गिरती औषधीय तेल या मट्ठे की धार नर्वस सिस्टम को रिलैक्स करती है और आँखों पर पड़ रहे अत्यधिक तनाव को शांत करती है।
  • अभ्यंग मालिश Abhyanga: पैरों के तलवों Padabhyanga पर शुद्ध तेल या कांसे की कटोरी से मालिश करने से शरीर की गर्मी बाहर निकलती है, जो सीधा आँखों को फायदा पहुँचाती है।
  • विरेचन थेरेपी Virechana therapy: शरीर से अतिरिक्त पित्त और खून में घुले टॉक्सिन्स को बाहर निकालने के लिए यह डीप-क्लीनिंग थेरेपी बहुत कारगर है।

आँखों और शरीर के प्राकृतिक रूप से रिपेयर होने में कितना समय लगता है?

आँखों की नसों और लेंस की विकृति को प्राकृतिक अवस्था में वापस रोकने के लिए थोड़ा अनुशासित समय लगता है:

  • शुरुआती 1-2 महीने: औषधियों और सही आहार के सेवन से आपकी जठराग्नि सुधरेगी। आँखों की थकान और भारीपन कम होने लगेगा।
  • 3-4 महीने: रसायन और नेत्र तर्पण के प्रभाव से धुंधलेपन के बढ़ने की गति धीमी हो जाएगी और आँखों में एक प्राकृतिक नमी Lubrication आने लगेगी।
  • 5-6 महीने: आपका नर्वस सिस्टम पूरी तरह पोषित हो जाएगा। शरीर से क्रोनिक फटीग Chronic fatigue गायब हो जाएगी और आप अपनी दृष्टि में एक स्थिरता महसूस करेंगे।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

आँखों के इस धुंधलेपन के इलाज को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है।

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा (Symptomatic care) आयुर्वेद (Holistic care)
इलाज का मुख्य लक्ष्य लेंस को काटकर निकालना और कृत्रिम लेंस (Artificial Lens) लगाना। वात-कफ को शांत करना, आँखों को पोषण देना और मोतियाबिंद की गति को प्राकृतिक रूप से रोकना या धीमा करना।
बीमारी को देखने का नज़रिया इसे केवल आँख के लेंस की एक स्थानीय (Local) उम्र-संबंधित समस्या मानना। इसे कमज़ोर पाचन, बिगड़े हुए दोषों और शरीर में फैले 'आम' का एक संपूर्ण सिंड्रोम मानना।
डाइट और लाइफस्टाइल खाने-पीने पर कोई विशेष पाबंदी या सलाह नहीं दी जाती। खाने में 'स्नेहन' (घी), योग (त्राटक), और जठराग्नि के अनुसार आहार पर पूरा ज़ोर दिया जाता है।
लंबा असर सर्जरी के बाद भी कई बार चश्मे की ज़रूरत पड़ती है और अगर जड़ (शुगर आदि) ठीक नहीं है तो रेटिना पर असर पड़ सकता है। शरीर की जठराग्नि और नसें अंदर से इतनी मज़बूत हो जाती हैं कि समग्र स्वास्थ्य में सुधार होता है और आँखों को लंबी उम्र मिलती है।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

हालांकि आयुर्वेद जीवनशैली में बदलाव करके इसके बढ़ने की गति को बहुत धीमा कर सकता है, लेकिन अगर आपको अपनी आँखों में ये कुछ गंभीर और अचानक होने वाले बदलाव दिखें, तो तुरंत मेडिकल जाँच ज़रूरी हो जाती है:

  • अचानक नज़र पूरी तरह गायब होना: अगर आँखों के आगे अचानक बिल्कुल अंधेरा छा जाए या एक आँख से दिखना पूरी तरह बंद हो जाए।
  • आँखों में भयंकर दर्द और लालिमा: मोतियाबिंद में आमतौर पर दर्द नहीं होता। अगर तेज़ दर्द और लालिमा हो, तो यह ग्लूकोमा काला मोतिया का अटैक हो सकता है।
  • रौशनी के प्रति असहनीय संवेदनशीलता: अगर सामान्य कमरे की लाइट भी आँखों में चुभने लगे और आप आँखें बिल्कुल न खोल पाएं।
  • तेज़ सिरदर्द और उल्टियाँ: आँखों में प्रेशर बढ़ने के साथ अगर भयंकर सिरदर्द या उल्टी होने लगे, तो यह एक मेडिकल इमरजेंसी है।

निष्कर्ष

अपनी आँखों को शरीर की खिड़कियाँ मानें, जो केवल तभी साफ़ देख सकती हैं जब शरीर के अंदर का वातावरण शुद्ध हो। मोतियाबिंद केवल ढलती उम्र का एक अनिवार्य हिस्सा नहीं है, बल्कि यह एक संकेत है कि आपकी जीवनशैली, आपका आहार और आपका नर्वस सिस्टम कहीं न कहीं अपनी प्राकृतिक लय खो चुका है। सर्जरी हर चीज़ का पहला और अंतिम समाधान नहीं हो सकती। आयुर्वेद की शक्ति से आप अपनी आँखों को भीतर से पोषण दे सकते हैं, दोषों को संतुलित कर सकते हैं और इस धुंधलेपन के सफर को धीमा करके अपनी दृष्टि की रक्षा कर सकते हैं। अपनी आँखों की चमक को फिर से वापस लाने और एक स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए, इस परेशानी से हमेशा के लिए बचने और इसे प्राकृतिक रूप से मैनेज करने के उपाय जानने के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Դ doctor.

FAQs

आयुर्वेदिक आई ड्रॉप्स और पारंपरिक उपचार आँखों को आराम देने और मोतियाबिंद की प्रगति को धीमा करने में मदद कर सकते हैं, लेकिन पूरी तरह पके हुए (Mature) मोतियाबिंद को केवल ड्रॉप्स से साफ़ नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों में सर्जरी सबसे प्रभावी उपचार मानी जाती है।

शुद्ध गुलाब जल आँखों को ठंडक और आराम दे सकता है, लेकिन यह मोतियाबिंद को रोकने या खत्म करने का प्रमाणित इलाज नहीं है। आँखों की देखभाल के साथ संतुलित आहार और नियमित जांच भी जरूरी है।

नहीं, चश्मा केवल धुंधली दृष्टि को बेहतर देखने में मदद करता है। यह लेंस में होने वाले बदलाव या मोतियाबिंद की प्रगति को नहीं रोकता।

त्राटक आँखों की एकाग्रता और मांसपेशियों के नियंत्रण में मदद कर सकता है। शुरुआती आँखों की थकान में यह लाभकारी हो सकता है, लेकिन मोतियाबिंद के एडवांस स्टेज में इसे डॉक्टर की सलाह के बाद ही करना चाहिए।

आयुर्वेद में शुद्ध देसी घी को आँखों के लिए लाभकारी माना गया है। यह आँखों के सूखेपन को कम करने और पोषण देने में मदद कर सकता है, लेकिन इसे मोतियाबिंद का इलाज नहीं माना जाता।

हाँ, लंबे समय तक UV किरणों के संपर्क में रहने से आँखों के लेंस को नुकसान पहुँच सकता है। इसलिए धूप में UV-protected sunglasses पहनना फायदेमंद माना जाता है।

नहीं, यह बढ़ती उम्र में अधिक आम है, लेकिन डायबिटीज, स्टेरॉयड दवाओं, चोट, रेडिएशन या जन्मजात कारणों से युवाओं और बच्चों में भी हो सकता है।

मोतियाबिंद में आँख का लेंस धुंधला हो जाता है, जबकि ग्लूकोमा में आँख का प्रेशर बढ़कर ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुँचाता है। ग्लूकोमा समय पर इलाज न होने पर दृष्टि के लिए अधिक खतरनाक हो सकता है।


बहुत ज्यादा ठंडे पानी से आँखों को धोने से कुछ लोगों को असहजता या irritation हो सकती है। सामान्य तापमान के साफ पानी से आँखें धोना अधिक सुरक्षित माना जाता है।

नहीं, मोतियाबिंद कोई संक्रमण नहीं है। लेकिन उम्र और स्वास्थ्य संबंधी कारणों से यह अक्सर दोनों आँखों में अलग-अलग समय पर विकसित हो सकता है।

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