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Bleeding Piles — कब डर की बात? कब आयुर्वेद से ठीक?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by

सुबह फ्रेश होते समय अगर मल के साथ खून आ जाए, तो यह ऐसा वॉर्निंग साइन है जिसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। यह सीधा इशारा है कि आपके पेट, पाचन या मल मार्ग में कुछ तो गड़बड़ चल रही है। खून देखकर बहुत से लोग घबरा जाते हैं कि कहीं कोई बड़ी बीमारी तो नहीं हो गई, वहीं कुछ लोग इसे मामूली बात समझकर टालते रहते हैं। यह दिक्कत मामूली भी हो सकती है और गंभीर भी। कई बार सिर्फ ज्यादा कब्ज होने, टॉयलेट में बहुत जोर लगाने या अंदर हल्की सी सूजन की वजह से भी ऐसा हो जाता है। इसलिए समय रहते इसे समझना बहुत जरूरी है, ताकि बात बिगड़ने से पहले ही इसे कंट्रोल किया जा सके।

पाइल्स (बवासीर) क्या होता है? 

पाइल्स यानी बवासीर एक ऐसी बीमारी है जिसमें गुदा (anus) के अंदर या बाहर की नसें सूजकर गुच्छे की तरह फूल जाती हैं। ऐसा तब होता है जब उस हिस्से पर लगातार बहुत ज्यादा प्रेशर पड़ता है। जैसे, कब्ज होने पर घंटों टॉयलेट में बैठकर जोर लगाना या एक ही जगह लगातार बैठे रहना। इसमें कभी-कभी काफी दर्द होता है, तो कभी फ्रेश होते समय खून भी आ जाता है। शुरुआत में तो ये बहुत मामूली लगता है, लेकिन अगर आपने ध्यान नहीं दिया, तो ये परेशानी काफी बढ़ सकती है। पाइल्स मुख्य रूप से दो तरह की होती है:

  • अंदरूनी पाइल्स (Internal Piles): ये गुदा के अंदर की तरफ होते हैं। इनमें दर्द बहुत कम या बिल्कुल नहीं होता, लेकिन अक्सर खून आ जाता है।
  • बाहरी पाइल्स (External Piles): ये गुदा के ठीक बाहर होते हैं। इनमें दर्द, सूजन और उठने-बैठने में बहुत ज्यादा तकलीफ होती है।

ब्लीडिंग पाइल्स और सामान्य पाइल्स में अंतर 

ये जरूरी नहीं कि हर तरह की पाइल्स में खून ही आए। हर इंसान का शरीर अलग है, तो लक्षण भी अलग होते हैं:

  • सामान्य पाइल्स: इसमें आपको दर्द, सूजन, खुजली और बैठने में भारीपन या दिक्कत महसूस होगी। लेकिन जरूरी नहीं कि इसमें खून आए।
  • ब्लीडिंग पाइल्स: इसका सबसे बड़ा लक्षण ही फ्रेश होते समय खून आना है। कई बार मरीज को जरा सा भी दर्द नहीं होता, बस अचानक खून दिख जाता है। ऐसा अक्सर अंदरूनी पाइल्स में होता है।

पाइल्स (बवासीर) होने के मुख्य कारण क्या हैं? 

जब गुदा के हिस्से की नसों पर हद से ज्यादा जोर पड़ता है, तो वो सूजकर कमजोर पड़ जाती हैं और वहीं से खून रिसने लगता है। इसके पीछे ये कुछ बड़ी वजहें होती हैं:

  • : मल बहुत सख्त होना और पेट साफ करने के लिए बहुत ज्यादा जोर लगाना नसों पर सीधा वार करता है।
  • डाइट में फाइबर की कमी: जो लोग अपनी डाइट में फल, हरी सब्जियां और पानी कम लेते हैं, उनका मल सूख जाता है और यही पाइल्स की शुरुआत है।
  • लंबे समय तक बैठे रहना: अगर आपका काम लगातार कुर्सी पर बैठे रहने का है, तो उस हिस्से पर प्रेशर बढ़ना तय है।
  • गलत खानपान: बहुत ज्यादा मिर्च-मसाले वाला और तला-भुना खाना आपके पाचन का सिस्टम बिगाड़ कर रख देता है।
  • इस दौरान पेट का आकार और वजन बढ़ने से नीचे की नसों पर काफी दबाव पड़ता है।
  • मोटापा और सुस्त लाइफस्टाइल: वजन ज्यादा होना और दिनभर कोई फिजिकल एक्टिविटी न करना भी इस बीमारी को बुलावा देता है।

शुरुआती संकेत जिन्हें अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है 

पाइल्स रातों-रात नहीं होती। शरीर बहुत पहले से इसके छोटे-छोटे सिग्नल देने लगता है, जिन्हें हम अक्सर मामूली समझकर छोड़ देते हैं:

  • हल्की जलन या असहजता: फ्रेश होते समय या उसके बाद उस जगह पर हल्की सी जलन या अजीब सा भारीपन लगना।
  • लगातार कब्ज रहना: पेट ठीक से साफ न होना और बार-बार कब्ज की दिक्कत होना इसका सबसे पहला अलार्म है।
  • टॉयलेट के बाद खुजली: मल त्यागने के बाद वहां हल्की खुजली या अजीब सी चुभन महसूस होना।
  • ज्यादा देर बैठने में परेशानी: अगर कुछ देर बैठने पर ही आपको वहां एक दबाव या तकलीफ महसूस होने लगे।
  • पेट साफ न होने की फीलिंग: ऐसा लगना कि पेट पूरी तरह साफ नहीं हुआ है और टॉयलेट में दोबारा जोर लगाने का मन करना।

खून क्यों आता है? अंदर क्या हो रहा होता है? 

जब मल बहुत ज्यादा टाइट हो जाता है और आप उसे बाहर निकालने के लिए जोर लगाते हैं, तो अंदर की उन सूजी हुई नसों पर भारी रगड़ लगती है।

  • इसी तेज रगड़ और दबाव के कारण वहां की कमजोर और पतली नसें छिल या फट जाती हैं। और बस, इसी वजह से आपको खून दिखाई देता है।
  • यह खून अक्सर एकदम साफ और चमकीले लाल रंग का होता है।
  • यह आपको मल के साथ या फिर टॉयलेट पेपर पर भी दिख सकता है।
  • कई बार इसमें दर्द बिल्कुल नहीं होता, लेकिन खून देखकर इंसान डर जरूर जाता है।
  • यह खून दिखना इस बात का सीधा सबूत है कि नसों पर बर्दाश्त से ज्यादा प्रेशर पड़ रहा है और अब उन्हें इलाज की जरूरत है।

कब यह स्थिति गंभीर मानी जाती है? 

पाइल्स में खून आना भले ही आम बात हो, लेकिन हमेशा इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। कुछ लक्षण चीख-चीख कर बताते हैं कि अब डॉक्टर के पास जाना ही होगा:

  • लगातार खून आना: अगर आपको कई दिनों या हफ्तों से लगातार खून आ रहा है।
  • बहुत ज्यादा खून गिरना: टॉयलेट सीट पर अगर ज्यादा मात्रा में खून दिखने लगे, तो तुरंत अलर्ट हो जाएं।
  • चक्कर या कमजोरी: ज्यादा खून बहने की वजह से अगर आपको कमजोरी, थकान या चक्कर आने लगें।
  • वजन का गिरना: बिना किसी डाइटिंग या वजह के आपका वजन तेजी से कम होने लगा।
  • असहनीय दर्द और सूजन: अगर दर्द इतना हो कि उठा-बैठा न जाए और सूजन लगातार बढ़ती रहे।

आयुर्वेद में पाइल्स (अर्श) को कैसे देखा जाता है? 

आयुर्वेद में पाइल्स को 'अर्श' का नाम दिया गया है। आयुर्वेद इसे सिर्फ एक लोकल (गुदा की) बीमारी नहीं मानता, बल्कि इसे आपके खराब पाचन और शरीर के बिगड़े हुए सिस्टम का नतीजा मानता है। जब शरीर में वात, पित्त और कफ तीनों दोष बिगड़ जाते हैं (खासकर जब आपका पाचन खराब हो और पेट साफ न हो), तो गुदा की नसों पर बुरा असर पड़ता है और सूजन आ जाती है। यहीं से अर्श यानी पाइल्स की नींव पड़ती है।

  • वात बिगड़ने से: आपको वहां तेज दर्द और बहुत ज्यादा सूखापन महसूस होता है।
  • पित्त बिगड़ने से: आपको आग जैसी जलन होती है और खून आने लगता है।
  • कफ बिगड़ने से: वहां सूजन आ जाती है और हर वक्त एक भारीपन सा लगता है।

आयुर्वेद में पाइल्स के उपचार का दृष्टिकोण 

आयुर्वेद में हमारा मानना है कि पाइल्स सिर्फ मल द्वार की बीमारी नहीं है। यह पेट की गड़बड़ी और दोषों के बिगड़ने का एक साइड इफेक्ट है। इसीलिए हमारा इलाज सिर्फ दर्द मिटाने तक सीमित नहीं रहता, हम बीमारी की जड़ को उखाड़ते हैं:

  • दोषों का बैलेंस: सबसे पहले ये देखा जाता है कि आपके शरीर में वात, पित्त और कफ में से क्या बिगड़ा है, और फिर उसे बैलेंस किया जाता है।
  • डाइजेशन (पाचन) पर पूरा फोकस: जब तक कब्ज दूर नहीं होगा, पाइल्स ठीक नहीं होंगे। इसलिए आपके पाचन को मजबूत करने वाली डाइट और रूटीन सेट किया जाता है।
  • नेचुरल जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल: शरीर को बिना नुकसान पहुंचाए, प्राकृतिक दवाइयों से अंदरूनी सूजन और दर्द को धीरे-धीरे खत्म किया जाता है।
  • लाइफस्टाइल में बदलाव: आप कब उठते हैं, क्या खाते हैं, पानी कितना पीते हैं इन सब आदतों को सुधारकर बीमारी की जड़ पर काम किया जाता है।
  • बॉडी डिटॉक्स (शरीर की सफाई): पेट और शरीर में जमा सारी गंदगी (टॉक्सिन्स) को बाहर निकालकर अंदरूनी सिस्टम को साफ किया जाता है।
  • आपके हिसाब से आपका इलाज: हर इंसान का शरीर और तासीर अलग होती है, इसलिए हर मरीज का इलाज भी उसी के हिसाब से कस्टमाइज्ड किया जाता है।

पाइल्स (बवासीर) के उपचार में उपयोग होने वाली आयुर्वेदिक औषधियां

आपके बिगड़े हुए वात-पित्त-कफ की देन है, जिसे हम अक्सर नज़रअंदाज कर देते हैं। यही वजह है कि आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां सिर्फ दर्द को सुन्न नहीं करतीं; वे आपके मल (स्टूल) को इतना मुलायम कर देती हैं कि अंदर की सूजन अपने आप घटने लगती है और आपका पाचन दोबारा से अपनी ताकत पकड़ लेता है।

  • हरड़: इसे पेट की सफाई का मास्टर माना जाता है। कितनी भी पुरानी कब्ज क्यों न हो, हरड़ उसे जड़ से उखाड़ फेंकने का दम रखती है।
  • यह आपके शरीर के अंदरूनी बैलेंस को बिगड़ने नहीं देती और पाचन तंत्र (पाचन) में एक नई जान फूंक देती है।
  • त्रिफला: यह आंतों की इतनी गहराई से सफाई कर देता है कि सुबह टॉयलेट में आपको बिल्कुल भी जोर लगाने की नौबत नहीं आती।
  • इसका सीधा काम गुदा (मल द्वार) के आसपास आई भयानक सूजन को खींचना और सूजी हुई नसों को उनकी पुरानी व सही जगह पर वापस लाना है।
  • नागरमोथा: अगर आपका पाचन पूरी तरह बिगड़ चुका है और पेट में बेतहाशा गर्मी बनी रहती है, तो नागरमोथा उसे शांत करने में गजब का काम करता है।
  • सौंफ: हमारी रसोई की यह आम सी चीज पेट को कमाल की ठंडक देती है। गैस बने या भारीपन लगे, सौंफ चबाते ही तुरंत आराम मिलने लगता है।

पाइल्स के उपचार में उपयोग होने वाली आयुर्वेदिक थेरेपी

आयुर्वेदिक पंचकर्म या थेरेपी को लेकर इनका मकसद सिर्फ बहते खून को रोकना या कुछ देर के लिए दर्द दबाना नहीं है। ये थेरेपी आपके शरीर के पूरे सिस्टम को 'रीबूट' करती हैं, ताकि पाचन वापस पटरी पर लौट आए।

  • भाप (स्टीम) चिकित्सा: जड़ी-बूटियों को पानी में उबालकर दी जाने वाली यह भाप, वहां की सूजन और चुभने वाले दर्द में जादुई तरीके से तुरंत सुकून पहुंचाती है।
  • तेल मालिश (अभ्यंग): खास हर्बल तेलों से की गई यह मालिश उस जगह के ब्लड सर्कुलेशन को खोल देती है, जिससे नसों का तनाव काफी हद तक कम हो जाता है।
  • विरेचन थेरेपी: आसान भाषा में कहें तो यह एक तगड़ा 'डिटॉक्स' है। यह पेट और शरीर में जमे सारे जहरीले तत्वों (टॉक्सिन्स) को खींचकर बाहर फेंक देता है और पित्त की गर्मी को बैलेंस कर देता है।
  • बस्ती थेरेपी: आयुर्वेद की दुनिया में इसे आंतों की सफाई का सबसे अचूक हथियार माना जाता है। यह पूरे पाचन तंत्र को ही एकदम से नया (रीसेट) कर देता है।

पाइल्स के मरीजों के लिए खानपान कैसा हो? (सहायक आहार)

पाइल्स के मामले में आपकी रसोई ही आपका सबसे बड़ा अस्पताल है। आप दिन भर में जो कुछ भी निगलते हैं, उसी से तय होता है कि अगले दिन सुबह तकलीफ होगी या नहीं। अगर आपने खाने-पीने का सही रूटीन पकड़ लिया, तो समझिए आधी जंग ऐसे ही जीत ली।

  • फाइबर से भरपूर खाना: ताजे फल, ढेर सारी हरी सब्जियां और साबुत अनाज ये वो चीजें हैं जो आपके डाइजेशन को एकदम स्मूद और हल्का बनाए रखती हैं।
  • खूब पानी पीना: दिनभर में अगर आप जमकर पानी पीते हैं, तो मल अंदर सूखकर पत्थर नहीं बनता और सुबह बिना दर्द के आसानी से बाहर आ जाता है।
  • हल्का और सादा भोजन: खिचड़ी या दलिया जैसी चीजें ही खाएं। ये पचने में इतनी आसान होती हैं कि आपके थके हुए पेट पर बिल्कुल बोझ नहीं डालती हैं।
  • दही और छाछ: दिन के वक्त छाछ या दही लेना पेट के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। ये पेट को ठंडा रखते हैं और पाचन को भड़कने नहीं देते।
  • मिर्च-मसाले और तेल से परहेज: तीखा, लाल मिर्च और बाहर का तला-भुना खाना पेट में तेजाब (जलन) पैदा करता है। इससे कब्ज की समस्या और विकराल हो जाती है, इसलिए इनसे कोसों दूर रहें।

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

मेरा नाम शरवन है और मैं गुरुग्राम से हूँ। मैं काफी समय से ब्लीडिंग पाइल्स की समस्या से पीड़ित था। मैंने पहले ऑपरेशन भी करवाया था, लेकिन समस्या पूरी तरह ठीक नहीं हुई। कुछ समय बाद दोबारा ऑपरेशन की सलाह दी गई, लेकिन किसी कारणवश मैंने वह नहीं करवाया। इसके बाद मुझे जीवा आयुर्वेद के बारे में पता चला। मैंने जीवा आयुर्वेद से संपर्क किया और वहाँ डॉक्टरों से बात करके इलाज शुरू कराया। मुझे दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल से जुड़ी सही सलाह दी गई। मैंने लगभग 4–5 महीने तक नियमित दवाइयाँ लीं। धीरे-धीरे मेरी स्थिति में सुधार आने लगा और लगभग 15 दिनों में ही ब्लीडिंग बंद हो गई। अब मुझे काफी राहत महसूस हो रही है और मैं पहले से बेहतर हूँ।

डॉक्टर की सलाह कब लेना जरूरी है?

अगर आपको नीचे बताई गई बातों में से कुछ भी अपने साथ होता दिखे, तो बिना झिझक किसी अच्छे डॉक्टर या विशेषज्ञ के पास दौड़ लगाइए:

  • जब सुबह फ्रेश होते समय लगातार खून आने लगे और रुकने का नाम ही न ले।
  • दर्द और सूजन कम होने के बजाय हर गुजरते दिन के साथ भयानक रूप लेने लगे।
  • बहुत ज्यादा खून बह जाने की वजह से आपको चक्कर आने लगें या हद से ज्यादा कमजोरी लगने लगे।
  • टॉयलेट सीट पर बैठने के नाम से ही डर लगने लगे और फ्रेश होने में असहनीय तकलीफ झेलनी पड़ी।
  • आपने सारे घरेलू नुस्खे आज़मा लिए, डाइट बदल ली, फिर भी कोई आराम न मिल रहा हो।
  • जब दर्द इतना हावी हो जाए कि आपका उठना, बैठना और चलना-फिरना तक मुहाल हो जाए।

निष्कर्ष

पाइल्स सिर्फ आपके गुदा (मल द्वार) तक सीमित कोई बीमारी नहीं है। यह उस गलत लाइफस्टाइल और तबाह हो चुके पाचन का अलार्म है, जिसे आप शायद सालों से इग्नोर कर रहे थे। आज की एलोपैथी इसे सिर्फ 'सूजी हुई नसों' का नाम दे देती है, लेकिन आयुर्वेद इसकी गहराई में जाकर इसे शरीर के बिगड़े दोषों और कमजोर पाचन से जोड़कर जड़ से खत्म करने में यकीन रखता है।

लंबे समय तक गलत-सलत खाना, कब्ज को हल्के में लेना और शरीर को एक्टिव न रखना ये सब मिलकर पूरे सिस्टम का कबाड़ा कर देते हैं। इसीलिए, समझदारी इसी में है कि सिर्फ ऊपर से कोई क्रीम लगाकर दर्द को दबाने के बजाय, अपनी पूरी दिनचर्या और लाइफस्टाइल को अंदर से सुधारने पर फोकस किया जाए।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Դ doctor.

FAQs

कुछ हल्के मामलों में सही खानपान और जीवनशैली सुधार से पाइल्स में आराम मिल सकता है। यदि कब्ज और गलत आदतें नियंत्रित कर ली जाएं तो समस्या कम हो सकती है। लेकिन लंबे समय तक बनी रहने वाली स्थिति में अपने आप पूरी तरह ठीक होना मुश्किल हो सकता है। इसलिए शुरुआती संकेतों पर ध्यान देना जरूरी होता है। समय पर सुधार करने से आगे की परेशानी कम हो सकती है।

नहीं, हर पाइल्स में खून आना जरूरी नहीं होता। कुछ लोगों में केवल दर्द, सूजन या खुजली होती है। खून अक्सर अंदरूनी पाइल्स में ज्यादा देखा जाता है। इसलिए केवल एक लक्षण से निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। पूरी स्थिति को समझना जरूरी होता है।

पाइल्स में दर्द हर समय नहीं रहता। कुछ मामलों में मल त्याग के समय ही दर्द महसूस होता है। जबकि कुछ लोगों में लगातार असहजता या जलन रह सकती है। दर्द की तीव्रता स्थिति पर निर्भर करती है। शुरुआती अवस्था में दर्द हल्का हो सकता है।

कब्ज पाइल्स का एक प्रमुख कारण माना जाता है। जब मल सख्त होता है और बार बार जोर लगाना पड़ता है तो नसों पर दबाव बढ़ता है। यह स्थिति धीरे धीरे पाइल्स को बढ़ा सकती है। इसलिए नियमित और नरम मल त्याग बहुत जरूरी होता है।

 हां, लंबे समय तक लगातार बैठने से गुदा क्षेत्र पर दबाव बढ़ सकता है। इससे सूजन और असहजता बढ़ सकती है। खासकर जिन लोगों को पहले से पाइल्स है, उन्हें ज्यादा देर बैठने से परेशानी हो सकती है। बीच बीच में हल्की गतिविधि मदद कर सकती है।

नहीं, पाइल्स किसी भी उम्र में हो सकती है। गलत खानपान और खराब जीवनशैली के कारण युवा लोगों में भी यह समस्या देखी जाती है। लंबे समय तक कब्ज या कम शारीरिक गतिविधि इसका कारण बन सकती है। इसलिए उम्र के साथ इसका संबंध निश्चित नहीं है।

अधिकतर मामलों में पाइल्स गंभीर नहीं होती, लेकिन इसे नजरअंदाज करना सही नहीं है। समय पर ध्यान न देने से समस्या बढ़ सकती है। लगातार खून आना या कमजोरी होना चिंता का संकेत हो सकता है। इसलिए शुरुआती अवस्था में ही देखभाल जरूरी होती है।

हां, आहार का बहुत बड़ा प्रभाव होता है। कम फाइबर और कम पानी लेने से कब्ज बढ़ सकती है। वहीं सही भोजन से मल नरम रहता है और दबाव कम होता है। इसलिए संतुलित आहार बहुत जरूरी माना जाता है।

हां, यदि जीवनशैली और खानपान में सुधार न किया जाए तो पाइल्स दोबारा हो सकती है। कब्ज और गलत आदतें इसे वापस ला सकती हैं। इसलिए केवल अस्थायी राहत नहीं, बल्कि स्थायी सुधार जरूरी होता है।

हां, सुधार धीरे धीरे होता है और समय व्यक्ति की स्थिति पर निर्भर करता है। हल्के मामलों में जल्दी राहत मिल सकती है। लेकिन पुरानी स्थिति में सुधार में अधिक समय लग सकता है। नियमित देखभाल से परिणाम बेहतर हो सकते हैं।

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