Դ

Դ Search
Close Button
 
 

Diabetes के 70% मरीज़ों को Nerve Damage पहले ही शुरू हो जाती है — बिना किसी लक्षण के

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by

अक्सर लोगों को लगता है कि जब तक पैरों में तेज दर्द, सुन्नपन या जलन न हो, तब तक उनकी नसें बिल्कुल ठीक हैं। लेकिन सच तो ये है कि बीमारी शरीर के अंदर बहुत पहले ही अपनी जड़ें फैलाना शुरू कर देती है और हमें सालों तक इसका पता ही नहीं चलता।

धीरे-धीरे बढ़ी हुई शुगर आपकी नसों को खोखला करने लगती है। शुरू में इसके इशारे बहुत हल्के होते हैं, जैसे पैरों में हल्की सी झनझनाहट, बिना काम किए थकान या पैरों का सुन्न पड़ना। ये इशारे इतने मामूली लगते हैं कि हम इन्हें थकान मानकर इग्नोर कर देते हैं। इसलिए शरीर के इन छोटे-छोटे बदलावों को समय पर समझना बहुत ज़रूरी है, वरना बाद में उठना-बैठना और चलना-फिरना तक मुश्किल हो सकता है।

डायबिटॶज़ आखिर क्या है?

डायबिटॶज़ वो बीमारी है जिसमें आपके शरीर का शुगर कंट्रोल करने वाला पूरा सिस्टम बिगड़ जाता है। नॉर्मल हालत में हमारा शरीर खाने को एनर्जी (ताकत) में बदलता है, लेकिन डायबिटॶज़ में ऐसा नहीं हो पाता और खून में शुगर बढ़ने लगती है। जब यह शुगर लंबे समय तक बढ़ी रहती है, तो यह आपकी आंखों, किडनी, दिल और नसों को अंदर ही अंदर डैमेज करने लगती है। शुरू में इसके लक्षण इतने हल्के होते हैं कि कई लोगों को सालों तक अपनी बीमारी का पता ही नहीं चलता।

नसों का डैमेज होना (Nerve Damage) क्या है?

जब खून में बहुत ज़्यादा शुगर लंबे समय तक बनी रहती है, तो वह नसों को गलाने लगती है। इसी को 'नर्व डैमेज' या नसों की कमज़ोरी कहते हैं। धीरे-धीरे नसें अपना काम करना बंद कर देती हैं। इसकी वजह से पैरों या हाथों में जलन, झनझनाहट, सुन्नपन और दर्द रहने लगता है। कई बार तो पैरों में सेंसेशन (महसूस करने की ताकत) ही खत्म हो जाती है। सबसे खतरनाक बात ये है कि शुरुआत में इसका कोई बड़ा दर्द या लक्षण नहीं होता, और जब तक पता चलता है, तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है।

डायबिटॶज़ और कमज़ोर नसों का क्या कनेक्शन है?

डायबिटॶज़ सिर्फ शुगर बढ़ने की बीमारी नहीं है, यह धीरे-धीरे आपके पूरे शरीर को दीमक की तरह खाती है। इसका सबसे बुरा असर आपकी नसों और खून की नलियों पर पड़ता है।

जब शुगर लेवल कंट्रोल में नहीं रहता, तो नसों तक खून और खाना (पोषण) पहुँचाने वाली बारीक नलियां ब्लॉक होने लगती हैं। बिना खुराक के नसें कमज़ोर पड़ने लगती हैं और अपना काम ठीक से नहीं कर पातीं।

यह सब इतनी खामोशी से होता है कि मरीज को कोई खास दर्द या परेशानी महसूस ही नहीं होती। इसलिए ज़रूरी है कि आप शरीर के छोटे से छोटे इशारे को भी सीरियसली लें।

बिना दर्द या लक्षण के नसों का नुकसान कैसे शुरू हो जाता है?

हमारे शरीर की नसें बाल से भी ज़्यादा बारीक और बहुत नाजुक होती हैं। जब खून में मीठा (शुगर) बहुत ज़्यादा होता है, तो वह इन बारीक नसों को अंदर से छीलने लगता है। शरीर शुरुआत में इस नुकसान की भरपाई करने की कोशिश करता है, इसलिए हमें दर्द या जलन महसूस नहीं होती।

यही वजह है कि बीमारी सालों तक छुपकर बढ़ती रहती है। और जब पैरों में सुन्नपन या चींटियां चलने जैसा एहसास शुरू होता है, तब तक नसें 50% से ज़्यादा खराब हो चुकी होती हैं।

क्यों 70% मरीजों में नसों का नुकसान पहले ही शुरू हो जाता है?

बहुत से लोगों का शुगर लेवल बॉर्डरलाइन पर या थोड़ा ज़्यादा रहता है, पर उन्हें पता ही नहीं चलता। इस दौरान शरीर के अंदर वो खतरनाक बदलाव शुरू हो जाते हैं जो नसों को सीधा डैमेज करते हैं।

  • अंदरूनी सूजन: शरीर के अंदर लगातार रहने वाली सूजन नसों को डैमेज करती है।
  • दबाव: शुगर बढ़ने से शरीर की हर कोशिका पर भारी दबाव पड़ता है।
  • खून की कमी: नसों तक ऑक्सीजन और पोषण पहुँचाने वाला खून का दौरा सुस्त पड़ जाता है।
  • हाई शुगर: महीनों तक खून में घुली ज़्यादा शुगर नसों की परत को गला देती है।
  • इशारों को इग्नोर करना: पैरों की हल्की जलन या झनझनाहट को हम मामूली थकान समझ कर छोड़ देते हैं।
  • देर से जांच: लोग डॉक्टर के पास तब जाते हैं जब बीमारी बहुत पुरानी हो चुकी होती है।

वो शुरुआती इशारे जिन्हें हम अक्सर इग्नोर कर देते हैं

नसों की खराबी कभी भी अचानक तेज दर्द से शुरू नहीं होती। शरीर कुछ छोटे-छोटे अलार्म बजाता है, जिन्हें हम अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं:

  • पैरों में जलन: खासकर रात को सोते समय तलवों से आग सी निकलना।
  • झनझनाहट: बैठे या लेटे हुए पैरों-हाथों में चींटियां चलने जैसा एहसास होना।
  • रुई पर चलने जैसा लगना: चलते हुए ऐसा महसूस होना जैसे पैरों के नीचे कुछ मुलायम सा रखा है या जमीन महसूस न होना।
  • सुन्न पड़ना: पैरों या हाथों में सुई चुभने या किसी के छूने का पता ही न चलना।
  • ठंडे-गर्म का पता न लगना: पैर जलने या बर्फ पर रखने पर भी तापमान का एहसास न होना।
  • पैरों में भारीपन: थोड़ा सा चलने पर ही पैरों में अजीब सा भारीपन और थकावट लगना।

इन छोटे इशारों को टालना आगे चलकर बहुत भारी पड़ सकता है।

नसें कमज़ोर क्यों होने लगती हैं?

नसों का खराब होना कोई एक दिन का काम नहीं है। जब हमारा शरीर और रूटीन लंबे समय तक खराब रहता है, तब नसें जवाब दे देती हैं। इसके पीछे ये बड़े कारण होते हैं:

  • हाई शुगर: खून में लगातार ज़्यादा शुगर रहने से नसें दबने और खराब होने लगती हैं।
  • पुअर ब्लड सर्कुलेशन: नसों तक खून न पहुंचने से वो अंदर से सूखने लगती हैं।
  • खराब लाइफस्टाइल: बे-टाइम खाना, एक्सरसाइज न करना और देर रात तक जागना।
  • टेंशन और स्ट्रेस: लगातार दिमागी टेंशन लेने से शरीर का पूरा सिस्टम हिल जाता है।
  • शरीर की सूजन: अंदरूनी सूजन नसों की ताकत को खत्म कर देती है।
  • शराब और सिगरेट: ये दोनों चीजें नसों और खून की नलियों के लिए जहर हैं।
  • कमज़ोर डाइट: शरीर में विटामिन्स और असली पोषण की कमी होना।

आयुर्वेद डायबिटॶज़ और नसों की कमज़ोरी को कैसे देखता है?

आयुर्वेद में डायबिटॶज़ को सिर्फ 'खून में शुगर बढ़ने' की बीमारी नहीं माना जाता। हम इसे 'प्रमेह' कहते हैं, यानी एक ऐसी बीमारी जो आपके पाचन, शरीर के अंदरूनी पोषण और नसों के पूरे नेटवर्क को अंदर से सुस्त कर देती है। आयुर्वेद कहता है कि जब यह बीमारी पुरानी होती है, तो शरीर में 'वात' (हवा) बुरी तरह भड़क जाता है। शरीर में सारा दर्द, मूवमेंट और नसों का काम इसी 'वात' के कंट्रोल में होता है। वात बिगड़ने की वजह से ही पैरों में सुन्नपन, झनझनाहट, रूखापन और भारीपन शुरू होता है।

साथ ही, जब पेट की आग (पाचन) कमज़ोर पड़ती है, तो शरीर को असली ताकत नहीं मिल पाती। खुराक न मिलने से नसें कमज़ोर होने लगती हैं। इसीलिए आयुर्वेद सिर्फ शुगर की गोली देने पर भरोसा नहीं करता, बल्कि वो आपके पाचन, बिगड़े हुए वात और नसों की असली खुराक (पोषण) पर काम करता है।

आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण

आयुर्वेद में शुगर और नसों की कमज़ोरी को सिर्फ एक बीमारी नहीं माना जाता। दरअसल, यह आपके शरीर के बिगड़े हुए रूटीन, मरे हुए पाचन और सूखती नसों का मिला-जुला नतीजा है। इसलिए यहाँ कोई एक गोली देकर दर्द नहीं दबाया जाता, बल्कि पूरे शरीर की अंदर से सर्विसिंग की जाती है:

  • शुगर कंट्रोल: शरीर की अपनी कुदरती घड़ी को ठीक करके शुगर लेवल को नॉर्मल पर लाना।
  • नसों की खुराक: कमज़ोर पड़ चुकी और सूख रही नसों में दोबारा जान फूंकना ताकि उन्हें असली ताकत मिल सके।
  • पाचन दुरुस्त करना: पेट की आग को इतना तेज करना कि अंदर जमा सालों पुराना कचरा (गंदगी) बाहर निकल जाए।
  • बिगड़े वात का इलाज: पैरों का सुन्न पड़ना या झनझनाहट मिटाने के लिए शरीर में भड़की हुई 'हवा' (वात) को शांत करना।
  • सही रूटीन: समय पर खाना और चैन की नींद आयुर्वेद में इसी को आधी से ज़्यादा बीमारी का इलाज माना गया है।

उपचार में उपयोग की जाने वाली आयुर्वेदिक औषधियां

इस बीमारी को जड़ से उखाड़ने के लिए कुछ कुदरती जड़ी-बूटियां अचूक काम करती हैं। बस आपकी तासीर देखकर इन्हें दिया जाता है:

  • गुडमार: जैसा नाम, वैसा काम। मीठे (गुड़) को मारने वाली यह जड़ी-बूटी शुगर को कंट्रोल करने में रामबाण है।
  • जामुन बीज: पुराने नुस्खों में शुगर को मात देने के लिए जामुन की गुठली का इस्तेमाल सबसे पक्का माना जाता है।
  • गुडूची (गिलोय): यह आपकी इम्युनिटी (लड़ने की ताकत) को इतना बढ़ा देती है कि शरीर अंदर से फौलाद बन जाता है।
  • अश्वगंधा: थकी-हारी नसों में नई एनर्जी भरने और दिनभर की सुस्ती मिटाने के लिए इसका कोई मुकाबला नहीं है।
  • ब्राह्मी: बिना बात की टेंशन को सोखने और नसों के पूरे जाल को शांत करने में यह बहुत माहिर है।
  • शिलाजीत: शरीर की खत्म हो रही ताकत को वापस लाने का यह सबसे बेहतरीन कुदरती टॉनिक है।
  • त्रिफला: पेट की सफाई करने और पाचन को वापस पटरी पर लाने की सबसे बढ़िया दवा। 

उपचार में उपयोग की जाने वाली आयुर्वेदिक थेरेपी

सिर्फ गोलियां फांकने से बात नहीं बनती। नसों की जकड़न खोलने और सुकून पाने के लिए आयुर्वेद के ये तरीके बड़े काम आते हैं:

  • अभ्यंग (ऑयल मसाज): जड़ी-बूटियों वाले गर्म तेल से की गई मालिश से बंद नसें भी खुल जाती हैं और शरीर को गजब का आराम मिलता है।
  • स्वेदन (हर्बल भाप): पसीने के जरिए शरीर का सारा भारीपन और अंदरूनी गंदगी बाहर कर दी जाती है।
  • शिरोधारा: जब माथे पर एक धार से तेल गिरता है, तो लगता है जैसे दिमाग की सारी टेंशन और बेचैनी पानी बनकर बह गई हो।
  • बस्ती कर्म: शरीर में भड़के हुए वात को शांत करने और नसों की अंदर से सफाई (डिटॉक्स) करने का यह सबसे पक्का तरीका है।

डायबिटॶज़ और नसों की कमज़ोरी में सहायक आहार

आपकी अपनी रसोई ही सबसे बड़ा अस्पताल है। सही खाना खाएंगे तो नसें कभी नहीं सूखेंगी:

  • ताजा और घर का खाना: सीधा चूल्हे से उतरा हल्का गर्म खाना खाइए। फ्रिज का रखा बासी खाना पाचन का दुश्मन है।
  • हरी सब्जियां और फाइबर: ये पेट को एकदम साफ रखती हैं और शुगर को झटके से खून में मिलने नहीं देतीं।
  • साबुत अनाज: मैदे को दूर से ही नमस्कार कर लें। चोकर वाला आटा या ओट्स खाइए, जो आराम से पचते हैं और दिनभर चुस्ती देते हैं।
  • मीठे और तले-भुने से तौबा: ज़्यादा मीठा और बाहर का तला-भुना नसों के लिए जहर के बराबर है, इनसे सख्त परहेज करें।
  • पानी खूब पिएं: शरीर की अंदरूनी धुलाई करने और टॉक्सिन्स को पेशाब के रास्ते बाहर निकालने के लिए भरपूर पानी पीना बहुत ज़रूरी है।
  • मेवे और बीज: लिमिट में खाए गए नट्स शरीर की बैटरी चार्ज रखते हैं और नसों को असली खुराक देते हैं।
  • खाने का टाइम फिक्स करें: कभी भी कुछ भी खा लेने से पूरा सिस्टम हिल जाता है, इसलिए खाने का एक टाइम ज़रूर बांध लें।

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

मेरा नाम ध्रुव दत्ता है और मैं फरीदाबाद का रहने वाला हूँ। लगभग 6 महीने पहले मुझे डायबिटीज डायग्नोज हुई थी, जिससे मैं काफी चिंतित हो गया था। तभी मुझे डॉ. प्रताप चौहान के बारे में ऑनलाइन जानकारी मिली और मैंने जीवा आयुर्वेद से संपर्क किया। क्लिनिक विजिट के दौरान मेरी मुलाकात डॉ. जयश्री से हुई, जिन्होंने मुझे डायबिटीज मैनेजमेंट प्रोग्राम के बारे में बताया। इस प्रोग्राम में डाइट, योग, हेल्थ कोचिंग और नियमित मॉनिटरिंग शामिल थी। मैंने पूरी तरह से इसे फॉलो किया और सिर्फ 6 महीनों में मेरा HbA1c 10.6 से घटकर 6.2 हो गया। इस दौरान मेरा वजन भी लगभग 10 किलो कम हुआ और मैं पहले से ज्यादा स्वस्थ और एनर्जेटिक महसूस करता हूँ।

कब डॉक्टर से सलाह लें?

अगर शरीर आपको ये इशारे दे रहा है, तो अब टालमटोल न करें और तुरंत डॉक्टर या वैद्य जी से मिलें:

  • पैरों में लगातार सुन्नपन या चींटियां चलने (झनझनाहट) का एहसास रहना।
  • तलवों में तेज जलन या चुभने वाला दर्द होना।
  • शरीर पर लगा कोई भी घाव जल्दी न भरें।
  • चलने-फिरने में लड़खड़ाहट या पैरों का भारी पड़ना।
  • आंखों के आगे अचानक धुंधलापन आना।
  • तमाम कोशिशों के बाद भी शुगर का लेवल लगातार हाई रहता है।

निष्कर्ष

डायबिटॶज़ और नसों की कमज़ोरी सिर्फ 'शुगर' बढ़ने की बीमारी नहीं है। यह आपके बिगड़े हुए लाइफस्टाइल, कमज़ोर पाचन और नसों तक खुराक न पहुंचने का एक बहुत बड़ा अलार्म है। मॉडर्न साइंस इसे इंसुलिन की दिक्कत मानता है, जबकि आयुर्वेद इसे भड़के हुए वात-कफ, बुझती हुई पेट की आग और शरीर की कुदरती घड़ी के खराब होने का नतीजा मानता है।

जब आप सालों तक टेंशन पालते हैं, बे-टाइम खाते हैं और सोने-जागने का कोई रूटीन नहीं रखते, तो नसें अंदर से हारने लगती हैं। यही हार सुन्नपन, थकान और जलन के रूप में बाहर आती है।

इसलिए, सिर्फ शुगर कम करने वाली गोलियों के सहारे मत बैठिए। असली इलाज आपकी रसोई और आपके रूटीन में छिपा है। सही खाना, टेंशन फ्री लाइफ, अच्छी नींद और एक पक्का रूटीन बस यही वो चाबी है जिससे आप अपनी नसों में दोबारा जान फूंक सकते हैं और हमेशा के लिए एक फिट जिंदगी जी सकते हैं!

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Դ doctor.

FAQs

 नसों की कमजोरी केवल मधुमेह के कारण नहीं होती। यह लंबे समय तक खराब जीवनशैली, पोषण की कमी, तनाव और शरीर में रक्त प्रवाह की कमी से भी हो सकती है। कई बार अन्य शारीरिक असंतुलन भी इसका कारण बन सकते हैं। इसलिए केवल एक कारण पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। सही जांच से वास्तविक कारण समझा जा सकता है।

हर बार हल्की झनझनाहट गंभीर समस्या का संकेत नहीं होती। कभी-कभी यह अस्थायी दबाव या थकान के कारण भी हो सकती है। लेकिन यदि यह बार-बार या लंबे समय तक बनी रहे तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय के साथ यह नसों की कमजोरी का संकेत बन सकती है।

 नसों की स्थिति व्यक्ति के कारण और समय पर ध्यान देने पर निर्भर करती है। शुरुआती अवस्था में सुधार की संभावना अधिक होती है। लेकिन लंबे समय तक अनदेखा करने पर सुधार धीमा हो सकता है। सही देखभाल से स्थिति को बेहतर किया जा सकता है।

दवाएं लक्षणों को नियंत्रित करने में मदद कर सकती हैं, लेकिन जीवनशैली का प्रभाव भी बहुत महत्वपूर्ण होता है। यदि खानपान और दिनचर्या असंतुलित रहे तो समस्या दोबारा बढ़ सकती है। इसलिए केवल दवा पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होता। संतुलित जीवनशैली जरूरी होती है।

हां, लंबे समय तक तनाव शरीर की कई प्रणालियों को प्रभावित कर सकता है। यह रक्त प्रवाह और नसों की संवेदनशीलता पर भी असर डाल सकता है। तनाव के कारण शरीर में थकान और कमजोरी बढ़ सकती है। मानसिक संतुलन भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।

जब नसों पर असर बढ़ता है तो पैरों की संवेदना कम हो सकती है। इससे चलने में असंतुलन या भारीपन महसूस हो सकता है। यह स्थिति धीरे-धीरे विकसित हो सकती है। इसलिए शुरुआती संकेतों पर ध्यान देना जरूरी होता है।

उम्र बढ़ने के साथ शरीर में बदलाव आना सामान्य है, लेकिन नसों की कमजोरी केवल उम्र पर निर्भर नहीं होती। जीवनशैली और स्वास्थ्य आदतें भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती हैं। सही देखभाल से इस प्रक्रिया को धीमा किया जा सकता है।

झनझनाहट पैरों के अलावा हाथों में भी महसूस हो सकती है। यह नसों की संवेदनशीलता में बदलाव का संकेत हो सकता है। हर व्यक्ति में इसका अनुभव अलग हो सकता है। इसे लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

 हर सुन्नपन स्थायी नुकसान का संकेत नहीं होता। कभी-कभी यह अस्थायी कारणों से भी हो सकता है। लेकिन यदि यह बार-बार या लगातार हो तो यह नसों पर असर का संकेत हो सकता है। सही समय पर जांच जरूरी होती है।

संतुलित दिनचर्या शरीर के स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। नियमित भोजन, पर्याप्त नींद और हल्की शारीरिक गतिविधि से शरीर बेहतर काम कर सकता है। इससे नसों पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। निरंतरता बहुत जरूरी होती है।

Top Ayurveda Doctors

Social Timeline

Our Happy Patients

  • Sunita Malik - Knee Pain
  • Abhishek Mal - Diabetes
  • Vidit Aggarwal - Psoriasis
  • Shanti - Sleeping Disorder
  • Ranjana - Arthritis
  • Jyoti - Migraine
  • Renu Lamba - Diabetes
  • Kamla Singh - Bulging Disc
  • Rajesh Kumar - Psoriasis
  • Dhruv Dutta - Diabetes
  • Atharva - Respiratory Disease
  • Amey - Skin Problem
  • Asha - Joint Problem
  • Sanjeeta - Joint Pain
  • A B Mukherjee - Acidity
  • Deepak Sharma - Lower Back Pain
  • Vyjayanti - Pcod
  • Sunil Singh - Thyroid
  • Sarla Gupta - Post Surgery Challenges
  • Syed Masood Ahmed - Osteoarthritis & Bp
Book Free Consultation Call Us