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Air Conditioning में रहने वालों को Joint Stiffness क्यों होती है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by
  • category-iconPublished on 11 May, 2026
  • category-iconUpdated on 13 Jun, 2026
  • category-iconJoint Health
  • blog-view-icon5057

गर्मियों की झुलसा देने वाली धूप से बचकर जैसे ही हम 18-20 डिग्री पर चल रहे एसी (AC) वाले कमरे या ऑफिस में घुसते हैं, तो शरीर को एक जादुई राहत मिलती है। पसीना सूख जाता है और हम घंटों तक अपनी कुर्सी पर बैठकर काम करते रहते हैं। लेकिन 4-5 घंटे एसी की इस ठंडी हवा में बिताने के बाद, जब आप अपनी सीट से उठने की कोशिश करते हैं, तो अचानक घुटनों, कमर और गर्दन में एक ऐसी भयंकर जकड़न (Stiffness) महसूस होती है मानो शरीर में जंग लग गया हो।

ज़्यादातर लोग इसे महज़ एक ही पोज़िशन में बैठे रहने की थकावट मानकर स्ट्रेचिंग कर लेते हैं या चाय-कॉफी पी लेते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस कृत्रिम ठंडक को आप अपना रक्षक मान रहे हैं, वह असल में आपकी हड्डियों और जोड़ों को अंदर ही अंदर कैसे सुखा रही है? एसी की यह ठंडी और नमी-रहित (Dry) हवा आपके शरीर के प्राकृतिक ब्लड सर्कुलेशन को जमा देती है, जो आगे चलकर क्रोनिक गठिया और स्लिप डिस्क का एक बहुत बड़ा कारण बन रही है।

एसी (AC) की ठंडी हवा आपके जोड़ों और मांसपेशियों को कैसे डैमेज करती है?

हमारा शरीर एक प्राकृतिक तापमान (Core Temperature) पर काम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। जब आप इसे घंटों तक कृत्रिम ठंडक में रखते हैं, तो शरीर का डिफेंस मैकेनिज़्म (Defense Mechanism) उलटा काम करने लगता है:

  • रक्त संचार (Blood Circulation) का धीमा होना: ठंड के कारण शरीर की नसें सिकुड़ जाती हैं (Vasoconstriction), ताकि शरीर की गर्मी बाहर न निकले। नसों के सिकुड़ने से जोड़ों और मांसपेशियों तक ताज़ा खून और ऑक्सीजन नहीं पहुँच पाता, जिससे वहां भयंकर जकड़न आ जाती है।
  • साइनोवियल फ्लूइड (Synovial Fluid) का गाढ़ा होना: हमारे जोड़ों के बीच एक प्राकृतिक तेल या तरल पदार्थ होता है जो उन्हें चिकनाई देता है। एसी की ठंडक से यह फ्लूइड गाढ़ा हो जाता है, जिससे हड्डियाँ आपस में रगड़ खाने लगती हैं और 'कट-कट' की आवाज़ें आती हैं।
  • मांसपेशियों में ऐंठन (Muscle Spasm): ठंडी हवा सीधे त्वचा पर लगने से मांसपेशियाँ खुद को गर्म रखने के लिए तन (Contract) जाती हैं। घंटों तक तनी हुई मांसपेशियाँ अंततः थक जाती हैं और गर्दन और कंधों की जकड़न का कारण बनती हैं।
  • नमी का छिन जाना: एसी हवा से सारी नमी (Moisture) सोख लेता है। यह रूखापन केवल आपकी त्वचा को ही नहीं, बल्कि आपके जोड़ों के अंदरूनी कार्टिलेज को भी सुखा देता है।

एसी से होने वाली जकड़न शरीर में किन प्रकारों से हावी होती है?

हर व्यक्ति का शरीर कृत्रिम ठंडक पर अलग प्रतिक्रिया देता है। आयुर्वेद के अनुसार, शरीर के बिगड़े हुए दोषों के आधार पर एसी का यह डैमेज दो मुख्य रूपों में सामने आता है:

  • वात-प्रधान जकड़न (रूखापन और दर्द): एसी की हवा ठंडी और रूखी होती है, जो सीधा वात दोष को भड़काती है। इसमें जोड़ों में भयंकर चुभने वाला दर्द होता है। घुटने और कमर बिल्कुल जाम हो जाते हैं और चलते समय घुटने का दर्द महसूस होता है। इसके लिए वात दोष कम करने के उपाय बेहद ज़रूरी हैं।
  • कफ-प्रधान जकड़न (भारीपन और सुस्ती): जो लोग एसी में लंबे समय तक बैठे रहते हैं, उनका मेटाबॉलिज़्म सुस्त पड़ जाता है। शरीर में भारीपन आ जाता है, खासकर सुबह पीठ में जकड़न इतनी ज़्यादा होती है कि बिस्तर छोड़ना मुश्किल लगता है।

क्या आपका शरीर भी एसी के कारण ये खतरनाक अलार्म बजा रहा है?

एसी में बैठने की आदत एक दिन में आपको गठिया का मरीज़ नहीं बनाती, लेकिन शरीर बहुत पहले से ही कुछ खामोश संकेत देने लगता है:

  • तेज़ सिरदर्द या माइग्रेन ट्रिगर होना: ठंडी हवा सीधे सिर या गर्दन पर लगने से नसों का सिकुड़ना, जिससे भयंकर तनाव वाला सिरदर्द शुरू हो जाता है।
  • उठते-बैठते जोड़ों से आवाज़ें आना (Crepitus): कुर्सी से उठते ही घुटनों या टखनों से 'कट-कट' की आवाज़ें आना, जो बताता है कि जोड़ों की चिकनाई सूख रही है।
  • उँगलियों और कलाई में झुनझुनी: ठंडे तापमान में घंटों कीबोर्ड पर टाइप करने से ब्लड सर्कुलेशन रुक जाता है और हाथों में सुन्नपन व चींटियाँ चलने जैसा अहसास होने लगता है।
  • असहनीय क्रोनिक फटीग: बाहर की चिलचिलाती धूप और अंदर की बर्फ जैसी ठंडक के बीच बार-बार जाने से शरीर का तापमान नियंत्रण (Thermoregulation) सिस्टम क्रैश हो जाता है, जिससे क्रोनिक फटीग (Chronic fatigue) हावी हो जाती है।

दर्द से तुरंत राहत पाने के चक्कर में लोग क्या गलतियाँ करते हैं?

एसी की ठंडक से हुई जकड़न से परेशान होकर लोग अक्सर ऐसे शॉर्टकट्स अपना लेते हैं, जो जोड़ों को हमेशा के लिए डैमेज कर देते हैं:

  • दर्द निवारक गोलियाँ (Painkillers) खाना: जकड़न महसूस होते ही रोज़ाना पेनकिलर खा लेना। यह केवल दिमाग को सुन्न करता है, लेकिन सिकुड़ी हुई नसों और सूखे हुए जोड़ों का कोई इलाज नहीं करता।
  • गलत पोश्चर की अनदेखी: एसी में ठंड लगने पर लोग अक्सर सिकुड़ कर (Hunched) बैठ जाते हैं। यह गलत पोश्चर सर्वाइकल स्पोंडिलोसिस (Cervical Spondylosis) और कमर दर्द (Lumbar Spondylosis) की सबसे बड़ी जड़ है।
  • गर्म पानी से तुरंत नहाना: एसी से निकलकर तुरंत बहुत तेज़ गर्म पानी से नहा लेना, जो मांसपेशियों को शॉक (Thermal shock) देता है और वात को और भड़का देता है।
  • भविष्य की गंभीर जटिलताएं: अगर इस रूखेपन को ठीक न किया जाए, तो यह जोड़ों की समस्याओं और हड्डियों के स्थायी डैमेज का रूप ले लेता है।

आयुर्वेद एसी की ठंडक और जॉइंट स्टिफनेस को कैसे समझता है?

आधुनिक विज्ञान जिसे वासोकन्स्ट्रिक्शन (Vasoconstriction) कहता है, आयुर्वेद उसे 'शीत' (ठंडा) और 'रूक्ष' (सूखा) गुणों के कारण भयंकर 'वात प्रकोप' के रूप में समझता है।

  • वात दोष का सीधा बढ़ना: आयुर्वेद के अनुसार, वात दोष के गुण ही शीत (Cold) और रूक्ष (Dry) हैं। एसी की हवा बिल्कुल वैसी ही होती है। समान गुणों के मिलने से शरीर में वात तूफ़ान की तरह बढ़ता है।
  • श्लेषक कफ का सूखना: हमारे जोड़ों के बीच 'श्लेषक कफ' होता है जो उन्हें चिकनाई (Lubrication) देता है। एसी का भड़का हुआ वात इस कफ को सुखा देता है, जिससे हड्डियाँ रगड़ खाती हैं।
  • स्रोतस (Channels) का सिकुड़ना: ठंडी हवा शरीर के सूक्ष्म चैनल्स (Srotas) में 'संकोच' (Shrinkage) पैदा करती है। इससे रस और रक्त धातु का प्रवाह रुक जाता है, जो जकड़न (Stambha) पैदा करता है।

एसी के साइड-इफेक्ट्स को काटने वाली वात-शामक डाइट

एसी की ठंडी हवा को बेअसर करने के लिए आपका भोजन तासीर में गर्म और स्निग्ध (Unctuous) होना चाहिए। इस आयुर्वेदिक डाइट को अपनी रूटीन में शामिल करें।

आहार की श्रेणी क्या खाएं (फायदेमंद - शरीर को गर्माहट और चिकनाई देने वाले) क्या न खाएं (ट्रिगर फूड्स - रूखापन और ठंडक बढ़ाने वाले)
अनाज (Grains) पुराना चावल, ओट्स, दलिया, मूंग दाल की खिचड़ी, रागी। वाइट ब्रेड, मैदा, पैकेटबंद नूडल्स, रूखे बिस्कुट।
वसा (Fats) देसी गाय का शुद्ध घी (वात शामक अमृत), तिल का तेल, ऑलिव ऑयल। किसी भी प्रकार का रिफाइंड तेल, डालडा, सूखा और रूखा खाना।
सब्ज़ियाँ (Vegetables) लौकी, तरोई, कद्दू, पालक, शकरकंद (सभी गाय के घी में पकी हुई)। कच्चा सलाद, अत्यधिक गोभी, भारी कटहल, कोल्ड स्टोरेज की सब्ज़ियाँ।
फल और मेवे (Fruits & Nuts) रात भर भीगे हुए बादाम, अखरोट, अंजीर, पपीता, सेब। डिब्बाबंद और बिना मौसम के ठंडे फल, बाज़ार के रोस्टेड नमकीन नट्स।
पेय पदार्थ (Beverages) हल्दी और सोंठ (Dry ginger) का पानी, गुनगुना पानी, अश्वगंधा वाला दूध। फ्रिज का बर्फ वाला पानी, बहुत ज़्यादा कोल्ड ड्रिंक्स, आइसक्रीम।

जोड़ों की जकड़न खोलने के लिए जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें ऐसे दिव्य रसायन दिए हैं, जो बिना किसी साइड-इफेक्ट के एसी की ठंडक से सिकुड़ी नसों को खोल देते हैं और दर्द खींच लेते हैं:

  • अश्वगंधा (Ashwagandha): शरीर की अंदरूनी गर्माहट बनाए रखने और नसों को फौलादी ताकत देने के लिए अश्वगंधा (Ashwagandha) एक अद्भुत बल्य औषधि है।
  • शल्लकी (Shallaki): जोड़ों की जकड़न, सूजन और 'कट-कट' की आवाज़ को तेज़ी से घटाने व डैमेज कार्टिलेज को रिपेयर करने के लिए यह बहुत अचूक औषधि है।
  • योगराज गुग्गुलु (Yogaraj Guggulu): जोड़ों और रीढ़ की हड्डी के बीच फँसे हुए ज़िद्दी वात और ठंडक को निकालकर जकड़न को तुरंत खोलने के लिए यह एक क्लासिकल आयुर्वेदिक मिश्रण है।
  • निर्गुण्डी (Nirgundi): मांसपेशियों की भयंकर ऐंठन (Spasm) और ठंडी हवा से होने वाले दर्द को प्राकृतिक रूप से सुन्न करने में निर्गुण्डी का तेल या काढ़ा बहुत असरदार है।
  • त्रिफला (Triphala): पेट को साफ रखकर वात (गैस) को बढ़ने से रोकने के लिए रोज़ रात को त्रिफला (Triphala) का सेवन करना ऑफिस जाने वालों के लिए बेहद ज़रूरी है।

सिकुड़ी नसों को खोलने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक थेरेपीज़

जब वात और जकड़न बहुत गहराई तक जोड़ों में जम चुकी हो, तो पंचकर्म की ये बाहरी थेरेपीज़ शरीर को तुरंत गर्माहट देकर रीबूट कर देती हैं:

  • अभ्यंग (Abhyanga): गुनगुने वात-शामक तेलों (जैसे महानारायण या तिल का तेल) से की जाने वाली यह संपूर्ण शारीरिक अभ्यंग मालिश (Abhyanga massage) शरीर की जकड़न को खत्म करती है और ब्लड सर्कुलेशन तेज़ी से बढ़ाती है।
  • स्वेदन (Swedana): तेल की मालिश के बाद हर्बल जड़ी-बूटियों की भाप दी जाती है। यह स्वेदन थेरेपी (Swedana therapy) पसीने के ज़रिए नसों में जमे हुए टॉक्सिन्स को बाहर निकालती है और जोड़ों को तुरंत आराम देती है।
  • ग्रीवा और कटि बस्ती: अगर एसी के कारण गर्दन या कमर जाम हो गई है, तो दर्द वाली जगह पर गर्म औषधीय तेल रोकने की बस्ती थेरेपी सूखी हुई नसों को भारी चिकनाई देती है।

जोड़ों के प्राकृतिक रूप से रिपेयर होने में कितना समय लगता है?

लंबे समय तक एसी की ठंडक और गलत पोश्चर से सूखे हुए जोड़ों को दोबारा प्राकृतिक अवस्था में लाने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है:

  • शुरुआती 1-2 महीने: आपकी जठराग्नि सुधरेगी। कुर्सी से उठते ही होने वाली भयंकर जकड़न और मांसपेशियों के तनाव में भारी कमी आएगी।
  • 3-4 महीने: पंचकर्म और रसायनों के प्रभाव से नसों का रूखापन खत्म होने लगेगा। जोड़ों से 'कट-कट' की आवाज़ें आनी कम हो जाएंगी और आपकी मूवमेंट बिल्कुल फ्री हो जाएगी।
  • 5-6 महीने: अस्थि और मज्जा धातु पूरी तरह पोषित हो जाएगी। शरीर के अंदरूनी लुब्रिकेशन से वात दोष शांत हो जाएगा और आप बिना किसी पेनकिलर के एक ऊर्जावान जीवन जी सकेंगे।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

एसी से होने वाले जोड़ों के दर्द के इलाज को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बहुत बड़ा अंतर है।

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा (Symptomatic care) आयुर्वेद (Holistic care)
इलाज का मुख्य लक्ष्य दर्द के सिग्नल्स को ब्लॉक करने के लिए पेनकिलर्स, मसल रिलैक्सेंट्स (Muscle Relaxants) देना। भड़के हुए वात को शांत करना, जठराग्नि को बढ़ाना और जोड़ों को प्राकृतिक रूप से 'स्नेहन' (Lubrication) देना।
बीमारी को देखने का नज़रिया इसे केवल गलत पोश्चर या मांसपेशियों की एक स्थानीय (Local) जकड़न के रूप में देखना। इसे शीत (Cold) और रूक्ष (Dry) वातावरण के कारण शरीर में फैले भयंकर वात प्रकोप का सिंड्रोम मानना।
डाइट और लाइफस्टाइल पेनकिलर के साथ फिजियोथेरेपी की सलाह दी जाती है, लेकिन खाने की तासीर (गर्म/ठंडी) पर कोई ज़ोर नहीं। वात-शामक डाइट, सोंठ का पानी, सही पोश्चर और अभ्यंग (तेल मालिश) को ही इलाज का सबसे बड़ा आधार माना जाता है।
लंबा असर दवाइयाँ छोड़ने पर दर्द और जकड़न तुरंत वापस आ जाती है। शरीर अंदर से इतना मज़बूत और स्निग्ध हो जाता है कि बाहरी ठंडी हवा जोड़ों को आसानी से नुकसान नहीं पहुँचा पाती।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

हालांकि आयुर्वेद इस समस्या को पूरी तरह रिवर्स कर सकता है, लेकिन अगर आपको अपने शरीर में ये कुछ गंभीर और अचानक होने वाले बदलाव दिखें, तो तुरंत मेडिकल जाँच ज़रूरी हो जाती है:

  • जोड़ों का पूरी तरह लाल और गर्म हो जाना: अगर एसी में बैठने के बावजूद आपके किसी जोड़ (जैसे घुटना या टखना) में भयंकर सूजन आ जाए, वह लाल हो जाए और छूने पर आग जैसा गर्म लगे (यह गाउट या यूरिक एसिड का अटैक हो सकता है)।
  • हाथों-पैरों में लकवे (Paralysis) जैसी स्थिति: अगर उँगलियों या पंजों का कोई हिस्सा बिल्कुल ही काम करना बंद कर दे और महसूस होना पूरी तरह बंद हो जाए।
  • गर्दन से हाथों तक बिजली जैसा करंट दौड़ना: अगर गर्दन घुमाते ही हाथों की उँगलियों तक इतना भयंकर करंट जैसा दर्द दौड़े कि कोई चीज़ पकड़ना मुश्किल हो जाए।
  • असहनीय तेज़ दर्द के साथ तेज़ बुखार: अगर जोड़ों के दर्द के साथ-साथ आपको तेज़ कंपकंपी वाला बुखार आ जाए, जो गंभीर इन्फेक्शन का इशारा है।

निष्कर्ष

चिलचिलाती गर्मी में एसी (AC) का आनंद लेना हमारी सुविधा का हिस्सा बन चुका है, लेकिन 18 डिग्री के तापमान में घंटों तक एक ही पोज़िशन में बैठे रहना आपके शरीर के जोड़ों के लिए एक साइलेंट किलर (Silent Killer) है। उठते समय घुटनों से आने वाली 'कट-कट' की आवाज़ या गर्दन में फँसने वाली वह भयंकर जकड़न कोई साधारण थकावट नहीं है; यह आपके शरीर का वह अलार्म है जो बता रहा है कि कृत्रिम ठंडक ने आपके वात दोष को भड़का दिया है और जोड़ों का प्राकृतिक तेल सूख रहा है। जब आप इस अलार्म को रोज़ाना पेनकिलर्स और चाय-कॉफी से दबाते हैं, तो आप अपनी हड्डियों को हमेशा के लिए कमज़ोर कर रहे होते हैं। इस खतरनाक चक्र से बाहर निकलें। एसी का तापमान 24-26 डिग्री के बीच रखें, ठंडी हवा के सीधे संपर्क (Direct blast) से बचें और हर 45 मिनट में स्ट्रेचिंग करें। अपनी डाइट में शुद्ध गाय का घी, सोंठ का पानी और लहसुन शामिल करें। अश्वगंधा, शल्लकी और योगराज गुग्गुलु जैसी जादुई जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करें, और अभ्यंग मालिश व स्वेदन थेरेपी से अपनी सूखी हुई नसों को गर्माहट देकर नया जीवन दें। एसी को अपने जोड़ों का दुश्मन न बनने दें, और अपने शरीर को स्थायी रूप से ताक़तवर व लचीला बनाने के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Դ doctor.

FAQs

एसी का तापमान कभी भी बाहर के तापमान से बहुत ज़्यादा अलग नहीं होना चाहिए। स्वास्थ्य के लिहाज़ से 24°C से 26°C के बीच का तापमान सबसे सुरक्षित माना जाता है। इससे शरीर को ठंडक भी मिलती है और नसें सिकुड़ती भी नहीं हैं।

हाँ। एसी के ब्लोअर (Blower) की हवा अगर सीधे आपकी गर्दन, पीठ या घुटनों पर लगातार लग रही है, तो वह उन मांसपेशियों को सुन्न कर देती है और भयंकर ऐंठन (Spasm) पैदा करती है। हवा का फ्लो हमेशा छत या ऊपर की तरफ होना चाहिए।

बिल्कुल। एसी हवा से नमी सोख लेता है, जिससे आपको प्यास कम लगती है (डिहाइड्रेशन)। एसी में बैठे हुए हमेशा हल्का गुनगुना पानी (या सोंठ/अदरक का पानी) घूंट-घूंट करके पिएं। यह जठराग्नि को बुझने नहीं देगा और शरीर में गर्माहट बनाए रखेगा।

शत-प्रतिशत। तिल का तेल तासीर में गर्म और भारी होता है, जो वात दोष का सबसे बड़ा दुश्मन है। नहाने से 15 मिनट पहले अगर आप अपने जोड़ों पर गुनगुने तिल के तेल या महानारायण तेल की हल्की मालिश करते हैं, तो एसी की ठंडक हड्डियों तक नहीं पहुँच पाती।

नहीं, यह एक बहुत बड़ा भ्रम है। लोग एसी में ठंड लगने पर बार-बार कॉफी पीते हैं। कैफीन शरीर में वात (रूखापन) को भड़काता है और शरीर से पानी सोख (Diuretic) लेता है, जिससे जोड़ों की प्राकृतिक चिकनाई और ज़्यादा सूख जाती है और जकड़न बढ़ जाती है।

हाँ। ठंडी हवा में गर्दन की मांसपेशियाँ सिकुड़ जाती हैं। अगर आप उसी सिकुड़ी हुई अवस्था में लगातार आगे झुककर (Forward Head Posture) लैपटॉप पर काम कर रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर सर्वाइकल की नसों को कुचल देता है।

हमेशा लेयर्स (Layers) में कपड़े पहनें। अगर ऑफिस का एसी बहुत तेज़ है, तो अपने साथ एक हल्का शॉल, स्कार्फ या जैकेट रखें और उसे अपनी गर्दन व कंधों पर डाल लें। जोड़ों को ठंडी हवा के सीधे संपर्क से बचाना ही सबसे पहला इलाज है।

लगातार बैठने से बचें। हर 45-60 मिनट में उठकर माइक्रो-स्ट्रेचिंग (Micro-stretching) करें। अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे ही गर्दन को घुमाएं, कलाई रोटेट करें और पंजों को ऊपर-नीचे (Ankle pumps) करें। इससे ब्लड सर्कुलेशन बना रहेगा और वात इकट्ठा नहीं होगा।

बिल्कुल। अश्वगंधा शरीर में ओजस (प्राकृतिक ऊर्जा और गर्माहट) का निर्माण करता है। एसी के कारण जो शारीरिक थकावट और नसों का रूखापन आता है, उसे दूर करने के लिए अश्वगंधा को रात में गुनगुने दूध और घी के साथ लेना एक बेहतरीन रसायन चिकित्सा है।

यह बहुत भयंकर भूल है। इसे थर्मल शॉक (Thermal Shock) कहते हैं। पसीने के कारण शरीर के पोर्स (Pores) खुले होते हैं; ठंडी हवा सीधा अंदर घुसकर मांसपेशियों को जमा देती है और वात-कफ को ट्रिगर करके तुरंत बुखार, सिरदर्द या गंभीर जॉइंट पेन पैदा कर देती है। बाहर से आकर पहले सामान्य तापमान में बैठें और पसीना सूखने दें।

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